देवभूमि उत्तराखंड स्थित पंचबद्री, पंचकेदार, पंचप्रयागों का जानें महात्म्य

Author ललित भट्‌ट|
उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। पंचबद्री, पंचकेदार, यहां की भूमि को देवतुल्य बनाते हैं। हर शिखर पर कोई न कोई मंदिर है तो हर नदी का संगम स्थल धार्मिक मान्यताओं का केन्द्र है, जिसे प्रयाग कहते हैं। पंचप्रयाग भी इस धरती पर लोगों की आस्था का केन्द्र है। के अलावा भी चार और मंदिर बद्रीनाथ के नाम से पंचबद्री मंदिर के रूप में यहां मौजूद हैं। भगवान विष्णु का यह धाम बद्रीनाथ बैकुंठधाम के नाम से भी प्रसिद्ध है, जबकि अन्य मंदिर ध्यान बद्री, योगबद्री, वृद्ध बद्री और भविष्यबद्री के नाम से यहां अलग-अलग मान्यताओं के लिए मशहूर हैं। इन सबमें आजकल दर्शनार्थियों के आने से धर्म और अध्यात्म का माहौल लोगों की आस्था में बढ़ोतरी कर रहा है। 
बद्रीनाथ : यह मंदिर हिमालय के केदारखंड में है। इसमें भगवान विष्णु तपस्या के लिए आए ऐसा माना जाता है। तपस्यारत भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी ने तपस्या के दौरान वर्षा धूप और अन्य प्राकृतिक प्रकोप से बचाने के लिए बेर के वृक्ष का रूप धारण कर उनको छाया दी जिस कारण यह स्थान बद्रीनाथ कहलाया। पहले यहां बद्रीवन में बद्री वृक्ष होते थे, लेकिन अब ये नहीं दिखते। भगवान विष्णु ने इस बद्रीघाटी को तपस्या के लिए चुना। यहां भगवान विष्णु की पूजा दो रूप में योगध्यान और श्रृंगारिक रूप में होती है। कहा जाता है कि 6 माह यहां भगवान की पूजा मनुष्यों द्वारा श्रृंगारिक रूप में और 6 माह देवताओं द्वारा योगरूप में की जाती है। योगध्यान मुद्रा में भगवान के साथ महालक्ष्मी बायीं ओर बैठती हैं तो श्रृंगारिक मुद्रा में पूजा के दौरान महालक्ष्मी दायीं ओर बैठती हैं। बद्रीनाथ में पूजा कराने वाले रावल को पूजा करने के दौरान अविवाहित ही रहना पड़ता है। शादी करने के बाद रावल की गद्दी से उन्हें हटना पड़ता है। यहां के बारे में यह प्रसिद्ध है कि मनुष्य को जो फल, तप, योग, समाधि और सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान दर्शन से प्राप्त होता है वह सब बद्रीनाथजी के दर्शन मात्र से ही मिल जाता है। बद्रीनाथ का मंदिर यहां कब से है यह ठीक नहीं मालूम लेकिन जो मंदिर वर्तमान में हैं उसका निर्माण पन्द्रहवीं शताब्दी में रामानुजीय संप्रदाय के स्वामी बदराचार्य के कहने पर गढ़वाल के तत्कालीन नरेश ने कराया। मंदिर के बन जाने के बाद इंदौर की सुप्रसिद्ध महारानी अहिल्याबाई ने यहां स्वर्ण कलश और छत्री को चढ़ाया। अलकनंदा नदी तट पर स्थापित यह मंदिर 50 फीट ऊंचा है। भगवान के इस क्षेत्र में अनेक गुप्त एवं प्रकट तीर्थ माने जाते हैं।
 
ध्यान बद्री : इस मंदिर में हरिद्वार से हेलंग तक राष्ट्रीय राजमार्ग से पहुंचा जा सकता है। हेलंग से कल्पेश्वर को जाने वाले मार्ग द्वारा हल्के वाहनों से यहां जाने के लिए उर्गम आया जाता है। इसी उर्गम घाटी में हेलंग से 10 किलोमीटर ग्राम बडगिंडा पर यह मंदिर है। भव्य पाषाण शिलाओं से निर्मित इस मंदिर का निर्माण कटुवा पत्थरों से कत्यूरी शैली में किया गया है। यहां पर भगवान विष्णु और शिव, ब्रह्मा ने ध्यान रूप में तप किया। यहां शालिग्राम शिला में निर्मित स्वयंभू मूर्ति की पूजा की जाती है। भगवान विष्णु के बायीं ओर महालक्ष्मीजी की मूर्ति भी यहां मौजूद है। दाहिनी ओर गणेश-नारद विराजमान हैं। मंदिर के बारे में प्रचलित है कि महर्षि दुर्वासा द्वारा देवराज इन्द्र को दी गई पुष्पमाला को देवराज इन्द्र द्वारा हाथी के सर के ऊपर रख देने से महर्षि दुर्वासा नाराज हो गए और उन्होंने देवराज इन्द्र की त्रिलोकी से लक्ष्मी के लुप्त होने का श्राप दे डाला। इसके चलते शिव और ब्रह्मा ने भगवान विष्णु की पूजा की, भगवान विष्णु ने प्रकट होकर दर्शन दिए। इस मंदिर के परिक्रमा स्थल पर पश्चिममुखी शिवालय है। विष्णु एवं शिव एक-दूसरे के पूरक हैं, यहां दर्शन स्थल पर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की भव्य पाषाण प्रतिमा भी है। भगवान श्री ध्यान बद्री के दर्शन से रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। शिव की आराधना से विष्णु के इस क्षेत्र में प्राकट्य के कारण इस क्षेत्र का महत्व है। आदि शंकराचार्य ने यहां का भी मंदिर स्थापित किया। पंचबद्री एवं पंचकेदार का संगम स्थल भी इसी क्षेत्र को माना जाता है। 

 

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