भारत के प्राचीन विशिष्ट गुरुकुल जानिए...


 
 
 
* जानिए भारत के अतिविशिष्ट प्राचीन गुरुकुल...
 
संकलन : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
 
भारत में शिक्षा पद्धति की बहुत लंबी परंपरा रही है। गुरुकुल में विद्यार्थी विद्या अध्ययन करते थे। तपोस्थली में सभा, सम्मेलन और प्रवचन होते थे जबकि परिषद में विशेषज्ञों द्वारा शिक्षा दी जाती थी। 
 
प्राचीनकाल में धौम्य, च्यवन ऋषि, द्रोणाचार्य, सांदीपनि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि, गौतम, आदि ऋषियों के आश्रम प्रसिद्ध रहे। बौद्धकाल में बुद्ध, महावीर और शंकराचार्य की परंपरा से जुड़े गुरुकुल जगप्रसिद्ध थे, जहां विश्वभर से मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करने आते थे और जहां गणित, ज्योतिष, खगोल, विज्ञान, भौतिक आदि सभी तरह की शिक्षा दी जाती थी।
 
प्रत्येक गुरुकुल अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध था। कोई धनुर्विद्या सिखाने में कुशल था तो कोई वैदिक ज्ञान देने में। कोई अस्त्र-शस्त्र सिखाने में तो कोई ज्योतिष और खगोल विज्ञान में दक्ष था। जैसा कि आजकल होता है कि इंजीनियरिंग कॉलेज अलग और कॉमर्स कॉलेज अलग।
पहला आश्रम-   
वाल्मीकि आश्रम : ऋषि वाल्मीकि का आश्रम भी देश में प्रसिद्ध था। वाल्मीकि की आदिकवि के रूप में भी प्रसिद्धि थी। श्रीराम के काल में हुए वाल्मीकि ने ही 'रामायण' लिखी थी। वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि ने श्लोक संख्या 7/93/16, 7/96/18 और 7/1111/11 में लिखा है कि वे प्रचेता के पुत्र हैं।> > मनुस्मृति में प्रचेता को वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है। बताया जाता है कि प्रचेता का एक नाम वरुण भी है। महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे।
 
तमसा नदी के तट पर व्याध द्वारा कोंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डालने पर वाल्मीकि के मुंह से व्याध के लिए शाप के जो उद्गार निकले, वे लौकिक छंद में एक श्लोक के रूप में थे। इसी छंद में उन्होंने नारद से सुनी राम की कथा के आधार पर रामायण की रचना की। 
 
सीताजी ने अपने वनवास का अंतिम काल इनके आश्रम पर व्यतीत किया था, वहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मीकि आदिवासियों और वनवासियों के गुरु थे। इनका आश्रम वर्तमान के तुरतुरिया स्थान पर था। तुरतुरिया जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ से लगभग 150 किमी दूर वारंगा की पहाड़ियों के बीच बहने वाली बालमदेई नदी के किनारे पर स्थित है। यह सिरपुर से 15 मील घोर वन प्रदेश के अंतर्गत स्थित है। यहीं पर मातागढ़ में एक स्थान पर वाल्मीकि आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में जानकी कुटिया है।
 
वाल्मीकि डाकू नहीं थे : जिस वाल्मीकि को दस्यु बताया जाता है वे नागा प्रजाति के थे। उनका ही एक नाम रत्नाकर था। वे परिवार के पालन-पोषण हेतु दस्यु कर्म करते थे। नारद मुनि से मिलने के बाद उनका हृदय बदल गया था और वे 'राम' नाम का जप करने लगे थे। घोर तपस्या के कारण उनके शरीर को दीमकों ने ढंक लिया था जिसके कारण वे 'वाल्मीकि' के नाम से प्रसिद्ध हुए।
एक अन्य विवरण के अनुसार इनका नाम अग्निशर्मा था और इन्हें हर बात उलटकर कहने में रस आता था इसलिए ऋषियों ने डाकू जीवन में इन्हें 'मरा' शब्द का जाप करने की राय दी। 13 वर्ष तक 'मरा', 'मरा' रटते-रटते यही 'राम' हो गया। बिहार के चंपारण जिले का भैंसा लोटन गांव वाल्मीकि का आश्रम था, जो अब वाल्मीकि नगर कहलाता है।
 
दूसरा गुरुकुल...
 
का आश्रम : राम और लक्ष्मण ने ऋषि विश्वामित्र के यहां रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। विश्वामित्र गायत्री के बहुत बड़े उपासक थे। माना जाता है कि महर्षि विश्वामित्र का आश्रम बक्सर (बिहार) में स्थित था। इस स्थान को गंगा-सरयू संगम के निकट बताया गया है। विश्वामित्र के आश्रम को 'सिद्धाश्रम' भी कहा जाता था।
 
रामायण के अनुसार राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र के आश्रम में रहकर ही ताड़का, सुबाहु आदि राक्षसों को मारा था। हालांकि यदि हम उनकी तपोभूमि की बात करें तो वह हरिद्वार में थी, जहां आज शांति निकेतन बना है।
 
विश्वामित्र वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। उनके ही काल में ऋषि थे जिसने उनकी अड़ी चलती रहती थी, अड़ी अर्थात प्रतिद्वंद्विता। विश्वामित्र के जीवन के प्रसंगों में मेनका और त्रिशंकु का प्रसंग भी बड़ा ही महत्वपूर्ण है। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। विश्वामित्रजी उन्हीं गाधि के पुत्र थे।
 
ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।
 
माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज है, उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ट होकर एक अलग ही स्वर्गलोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मंत्र की रचना की, जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। 
 
अगले पन्ने पर तीसरा और चौथा गुरुकुल...

 

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