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क्या विरोधाभासिक है हिंदू धर्म?
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

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अकसर यह आरोप लगाया जाता है कि हिंदू धर्म में भ्रम और विरोधाभास ज्यादा है। इससे समाज में बिखराव और जातिवाद पनपता है। मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ता है। मनमाने रिवाज और नियम जन्म लेते हैं। ईश्वर तो एक ही है फिर 33 करोड़ को पूजने का तुक क्या? और उक्त 33 करोड़ के प्रति भी लोगों की आस्था ज्योतिषियों की सलाह पर टिकी है। क्या आस्थाएँ किसी की सलाह पर होती हैं?

हिंदुओं को ईश्वर से ज्यादा डर शनि और मंगल से लगता है। ईश्वर का तो कोई ध्यान ही नहीं करता। उस पर तो कोई विश्वास ही नहीं करता। नए-नए संतों और व्यक्तियों के मंदिर बनने लगे हैं। रामलीला और कृष्णलीला का व्यावसायिकरण होने लगा है। कोई कहता है शिव ही सत्य है, कोई विष्णु को परम शक्ति मानता है। कृष्ण को सृष्टि का रचियता बताया जाता है तो कोई कहता है कि राम को ही पूजना चाहिए।

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वर्तमान में लोग सबकुछ छोड़कर साँई की शरण में होते जा रहे हैं। यदि इनसे कहो कि तुम भटक गए हो तो कोई भी मानने को तैयार नहीं होगा क्योंकि सभी अपने-अपने दुःखों के निष्कासन में लगे हैं। दरअसल ये लोग खुद नहीं भटके हैं, ‍इन्हें धर्म के तथा‍कथित ठेकेदारों ने भटकाया है। लोगों के दुःखों का शोषण करने के लिए तथाकथित संतजन और ज्योतिषी धर्म का इस्तेमाल करना सीख गए हैं।

दूसरी ओर कुछ लोग कहते हैं कि यह सनातन धर्म है, कुछ इसे आर्य धर्म कहते हैं तो कुछ ने इसे वैदिक धर्म मान रखा है। और सभी अपनी बात ठोंक- बजाकर कहते हैं। इन ठोंक-बजाकर कहने वालों से जरा पूछो कि तुमने कितना जाना है हिंदू धर्म को? आखिर है क्या यह धर्म? सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएँ हैं।

यदि आप कुछ समझाने गए तो ये सभी लोग भड़क जाएँगे। इन्हें माथा-फोड़ी करते अच्छी तरह से आती है। ये सभी चालाक हो चले हैं क्योंकि सभी के व्यावसायिक हित जुड़े हैं, सभी मठाधीश होना चाहते हैं, सभी मीडिया की सुर्खियाँ बनना चाहते हैं और सभी रुपया कमाना चाहते हैं, इसीलिए सभी शामिल हैं हिंदू धर्म का अपने-अपने तरीके से दोहन करने में और अपने-अपने साँचे में ढालने में। इनके पास तथाकथित राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और छुटभैयाओं की फौज है, इसीलिए आप इनका विरोध नहीं कर सकते।

फिर भी यह सोचा जाना चाहिए ही आखिर यह धार्मिक व्यवसाय क्यों शुरू हुआ और क्यों धर्म में विरोधाभासिक विचारों का जन्म हो गया। धर्म के बारे में क्यों विरोधाभास की स्थिति में जीकर हिंदूजन निर्णयहीन हो गए हैं। क्या धर्म में ही कुछ ऐसे तत्व या सूत्र हैं जो व्यक्ति को भटकाने के कार्य करते हैं? व्यक्ति को एक स्पष्ट मार्ग नहीं बताते?

यह शोध का विषय हो सकता है कि कितने हिंदुओं ने वेद, उपनिषद और गीता पढ़ी है। यह भी कि क्या ज्यादातर हिंदुओं ने कथावाचक और पुराणिकों के माध्यम से धर्म को जाना है। बुढ़ापे में गीता भवन में बैठकर प्रवचन सुनें और प्रवचनों में भी ज्यादातर कथाएँ, कहानियाँ या रोचक किस्से जिससे आपका मनोरंजन होता है, हँसी आती है। प्रवचन सुनकर सभी समझते हैं कि बुढ़ापा सुधर गया। वैकुंठ का द्वार खुल गया। हरि ओम तत्सत्।

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