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बंधन प्रेम का
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पूज्य पांडुरंग शास्त्री आठवलेरक्षाबंधन- रक्षाबंधन अर्थात् प्रेमबंधन। आज के दिन बहन भाई के हाथ पर राखी बाँधती है और साथ-साथ भाई के हृदय को प्रेम से बाँधती है। भाई-बहन का मिलन यानी पराक्रम, प्रेम, साहस तथा संयम का सहयोग। भोग और स्वार्थ की छाया से अंकित जगत् के सभी संबंधों में निःस्वार्थ और पवित्र ऐसा भाई-बहन का सच्चा प्रेम संबंध मानो खारे समुद्र के बीच मिलने वाली एक मधुर तलैया जैसी आश्चर्यकारक घटना है। भारतीय संस्कृति और उसके प्रवर्तक ऋषियों ने इस संबंध की निःस्पृहता और पवित्रता का महिमागान किया है। भारतीय संस्कृति मानव जीवन की महानता के दर्शन कराने वाली संस्कृति है। वह स्त्री को भोगदासी न समझकर उसका पूजन करने वाली संस्कृति है।अपने आपको सुधारक मानने वाले तथा पाश्चात्यों का अंधानुकरण करके, स्त्री समानता की खोखली भाषा बोलने वालों को नम्रतापूर्वक कहना चाहिए कि भारतीय संस्कृति ने तो स्त्री का पूजन किया है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। जहाँ स्त्री पूजी जाती है, उसका सम्मान होता है, वहाँ देव रमते हैं- वहाँ देवों का निवास होता है।' ऐसा भगवान मनु का वचन है। स्त्री की ओर भोग की दृष्टि से न देखकर पवित्र दृष्टि से, माँ की भावना से देखने का आदेश देने वाली भारतीय संस्कृति ही है।रक्षाबंधन का उत्सव अर्थात् दृष्टि परिवर्तन का उत्सव। बहन की राखी हाथ पर बंधते ही भाई की दृष्टि बदल जाती है। राखी बाँधने वाली बहन की ओर वह विकृत दृष्टि देखता ही नहीं, बल्कि उसके रक्षण की जिम्मेदारी भी वह स्वयं उठाता है, ताकि बहन समाज में निर्भय होकर घूम सके। उसका मजाक उड़ाकर पशुतुल्य वृत्ति वाले भाइयों को आज समझाकर या दंड देकर पाठ सिखाने की जरूरत है। उन लोगों को यह मालूम नहीं है कि जिस समाज में बहन निर्भय नहीं है, वह समाज धीरे-धीरे अपना पौरुष खोकर पतन को प्राप्त होता है।भाई को राखी बाँधने से पहले बहन उसके मस्तिष्क पर तिलक करती है। यह केवल भाई के मस्तिष्क की पूजा नहीं अपितु भाई के विचार और बुद्धि पर विश्वास का दर्शन है। बहन जब भाई के ललाट पर तिलक करती है, तब सामान्य लगने वाली इस क्रिया में दृष्टि परिवर्तन की महान प्रक्रिया समाई हुई होती है। सामान्य दृष्टि से जगत् को देखने वाली दो आँखों के अलावा भोग को भूलकर भाव दृष्टि से जगत् को देखने के लिए मानो एक तीसरी पवित्र आँख देकर बहन ने अपने भाई को त्रिलोचन बनाया हो, ऐसा संकेत इस क्रिया में दिखाई देता है। भगवान शंकर ने तीसरी आँख खोलकर काम को भस्म किया था। बहन भी भाई का तीसरा नेत्र बुद्धि का लोचन खोलकर उसे विकार, वासना इत्यादि को भस्म करने का सूचन करती है।
भाई के हाथ पर राखी बाँधकर बहन उससे केवल अपना रक्षण नहीं चाहती, परंतु समस्त स्त्री जाति के रक्षण की कामना रखती है, साथ-साथ बाह्य शत्रुओं और अंतर्विकारों पर अपना भाई विजय प्राप्त करे या उससे सुरक्षित रहे, यह भावना भी उसमें छिपी होती हैं।देवासुर संग्राम में देवों की विजय के निमित्त इंद्राणी ने हिम्मत हारे हुए इंद्र के हाथ में राखी बाँधी थी, ऐसा वेदों में उल्लेख है। अभिमन्यु की रक्षा के निमित्त कुंतामाता ने उसे राखी बाँधी थी। राखी में उभय पक्ष के रक्षण की भावना समाई हुई होती है, परन्तु इतनी ही उसकी मर्यादा नहीं है।रक्षाबंधन तो बंधन रक्षा का स्मारक है। बंधन रक्षा यानी ध्येय रक्षा, जिसने जीवन में कुछ बंधन मान्य किए हैं, जो जीवन में किसी ध्येय के साथ बँधा हुआ है, वही जीवन विकास कर सकता है। राखी बाँधते समय बहन भाई के बंधन का तथा ध्येय का रक्षण करने का सूचन करती है। 'स्त्री की ओर विकृत दृष्टि से न देखकर उसकी ओर पवित्र दृष्टि रखो।' ऐसा महान् संदेश देने वाली भारतीय संस्कृति के इस श्रेष्ठ पर्व को हमने कुटुम्ब तक ही मर्यादित बना दिया है। ऐसे सुन्दर प्रेम और भावबंधन के पर्व को कुटुम्ब तक सीमित रखना योग्य नहीं है। ऐसे पर्व का तो समाजीकरण और वैश्वीकरण चाहिए। सगे भाई की ओर किसी भी बहन की दृष्टि निर्मल, प्रेमपूर्ण ही रहेगी। जरूरत है समाज में स्त्री की ओर देखने वाली विकार दृष्टि को बदलने की। सगी बहन सगे भाई को रक्षा बाँधे इससे अच्छा समवयस्क कोई दूसरी बहन दूसरे भाई को राखी बाँधे तो उसमें शील बुद्धि की पराकाष्ठा है।संक्षेप में, रक्षाबंधन यानी स्त्री की ओर देखने की दृष्टि बदलना, रक्षाबंधन यानी भाई के द्वारा बहन के रक्षण की जिम्मेदारी, रक्षाबंधन यानी भाई-बहन के विशुद्ध प्रेम का अस्खलित बहता निर्झर! भाई और बहन परस्पर प्रेरक, पोषक और पूरक हैं, यह संदेश देने वाला यह उत्सव भारतीय संस्कृति की अमूल्य देन है।