धर्म के बारे में महावीर स्वामी के उपदेश-
धम्मो मंगल-मुक्किट्ठं अहिंसा संजमो तवो। देवा वि तं नमंसंति जस्स धम्मे सया मणो॥ धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। महावीरजी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
पाणे य नाइवाएज्ज अदिन्नं पि य नायए। साइयं न मुसं बूया एस धम्मे वुसीमओ॥ महावीरजी का मानना था छोटे-बड़े किसी प्राणी को न मारना, बिना दी हुई चीज न लेना, विश्वासघात रूपी असत्य व्यवहार न करना, यही है आत्मनिग्रही लोगों का धर्म। साधु लोग इसी धर्म का पालन करते हैं।
समया सव्व भूएसु सत्तुमित्तेसु वा जगे। पाणाइवायविरई जावज्जीवाए दुक्करं॥ चाहे शत्रु हो या मित्र, वैरी हो या मीत सभी जीवों पर, सभी प्राणियों पर समभाव रखना, सभी को अपने जैसे समझने को ही महावीरजी ने अहिंसा कहा है। जीवनभर किसी भी प्राणी को मन, वचन और काया से न सताना, किसी की हिंसा न करना सचमुच बहुत कठिन है।
संयम : संयम के बारे में महावीर स्वामी के उपदेश-
तमाहु लोए पडिबुद्ध जीवी। सो जीयइ संजम जीविएण॥ इस लोक में सदा जागने वाला वही है, जो संयमी जीवन बिताता है। |