बुद्ध जयंती : धन्य हुई वैशाख पूर्णिमा ...


वैशाख पूर्णिमा बुद्ध जयंती परम पावन अवसर पर

आज से 2600 वर्ष पहले की वैशाख पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ गौतम ने परम सत्य की खोज की थी। परम सत्य जिसकी खोज से सिद्धार्थ गौतम ने अपनी स्वयं की बोधि को ही जागृत नहीं किया अपितु जीवन के अंतिम क्षण तक उस परम सत्य को जनसाधारण के बीच अत्यंत करुण चित्त से बांटते ही रहे। परम सत्य जिस पर चलकर फिर उस समय के भारत के और अनेक पड़ोसी देशों के करोड़ों-करोड़ों लोगों का प्रत्यक्ष मंगल सधा। लोगों का वास्तविक कल्याण हुआ।

भगवान बुद्ध के जीवन में पूर्णिमा का बड़ा महत्व रहा है। जिसमें वैशाख पूर्णिमा का तो त्रिविध दुर्लभ महत्त्व है। वैशाख पूर्णिमा के ही दिन सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ। वैशाख पूर्णिमा के ही दिन सिद्धार्थ गौतम को बोधि वृक्ष के नीचे परम सत्य का बोध जागा और वे बुद्ध कहलाए।

और फिर वैशाख पूर्णिमा के ही दिन स्वयं की पूर्व घोषणा के अनुसार उन्हें महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ। भगवान बुद्ध और प्रकृति का गहन नाता रहा। भगवान बुद्ध प्रकृति के परम रहस्य को जान गए थे और आजीवन वे प्रकृति के निकट ही रहे।

राजकुमार होते हुए भी उनका जन्म महलों में नहीं अपितु प्रकृति की गोद में, जंगल में शाल-वृक्ष की छाया में हुआ। बोधी की खोज में छः सालों तक प्रकृति के अति निकट रहकर तप करते रहे।


और फिर बोधी मिली तो वह भी प्रकृति की छाया में बोधी वृक्ष के तले ...


80 वर्षों की पकी हुए आयु में जब जीवन की बिदा घड़ी आई तो वह भी वैशाख पूर्णिमा का ही दिन था और थी प्रकृति की गोद, जुड़वां शाल वृक्षों की छाया तले/जीवन की तीनों बड़ी घटनाओं का वैशाख पूर्णिमा को ही घटित होना बड़ा विलक्षण और अप्रतिम संयोग है।

आजकल हर कोई सत्य की बात करता है। सत्य की तरफदारी में कई बड़े और भरी-भरकम जुमले भी सुनता और सुनाता है। 'सत्य परेशान हो सकता हैं पराजित
नहीं', सांच को आंच नहीं, सत्य की हमेशा विजय होती है, सत्य बड़ा बलवान है, सत्य ही ईश्वर हैं,आदि आदि परन्तु आदमी लौकिक सत्य की भी केवल बातें ही करके रह जाता हैं असल में मानव सत्य की राह से दूरी बनाकर चलना ही ज्यादातर पसंद करता है।

लौकिक सत्य अक्सर विवाद का कारण भी बन जाते हैं क्योंकि लौकिक सत्य को हम आंखों से देखकर, कानों से सुनकर, चखकर, छूकर या सूंघकर जान पाते हैं और इस उहापोह में हर इन्सान का अपना-अपना नजरिया सत्य को भिन्नता प्रदान कर देता हैं फिर तो हर इन्सान को उसका कहा सत्य पत्थर की लकीर सदृश लगने लगता है। लौकिक सत्य की भिन्न भिन्न परिभाषाएं हमेशा विवादों को जन्म देती है। हर कोई अपने अपने सत्य की जानकारी को दुसरे की जानकारी से जोड़कर नहीं अपितु तोड़ मरोड़कर ही पेश करता है इसीलिए सिद्धार्थ गौतम ने उस समय के उपलब्ध ज्ञान से असंतुष्ट होकर परम सत्य की खोज आरम्भ कर दी। वे कुदरत के हर नियम को जानना चाहते थे। वे जानना चाहते थे मानव दुखी क्यों होता हैं?
दुखों से नितांत विमुक्त होने की क्या राह हैं?

सिद्धार्थ गौतम की सत्य की खोज पूर्ण हुई वैशाख पूर्णिमा की उस रात जब वे यह दृड़ संकल्प के साथ बोधि वृक्ष के तले बैठे कि अब प्रकृति के सारे रहस्यों को जानकर ही उठूंगा...उनकी खोज आखिर पूरी हुई और भगवान ने पाया कि लौकिक सत्य की जानकारी और उसके व्यवहार से कहीं अधिक कल्याणकारी होता हैं परमार्थ सत्य को जानना

उन्होंने अनुभव किया की परमार्थ सत्य हमेशा एक सा रहता है ... और जिसने परमार्थ सत्य के दर्शन कर लिए उसका चित्त शांत हो जाता है। उसके दुःख दूर हो जाते हैं। सिद्धार्थ गौतम बस इसी खोज में थे कि कोई ऐसा मार्ग मिले जिसपर चलकर हम दुखों से परम मुक्त हो सके। उन्होंने
अनुभव किया कि सत्य को वस्तुतः लौकिक क्षेत्र से कहीं अधिक अपने अंतर्मन की गहराइयों में खोजने की जरुरत है। सही मायनों में इस दिन वैशाख पूर्णिमा धन्य हुई।


भगवान की यह खोज की दुःख है दुखों का कारण है, दुखों का निवारण है। और दुखों से नितान्त विमुक्ति का उपाय है। अध्यात्म के क्षेत्र की सर्वोच्च खोज है। भगवान को बोधि की प्राप्ति के उपरांत उनके प्रथम उद्गार बड़े प्रेरणादायक हैं। अनेक जन्मों तक बिना रुके संसार में दौड़ता रहा। इस काया रूपी घर बनाए वाले की खोज करते हुए पुनः पुनः दुखमय जन्म में पड़ता रहा। हे गृह्कारक, अब तू देख लिया गया है। अब तू पुनः घर नहीं बना सकेगा। तेरी सारी कड़ियां भग्न हो गयी हैं। घर का शिखर भी विश्रंखलित हो गया है। चित्त संस्कार रहित हो गया है। तृष्णा का समूल नाश हो गया है। सारे जीवन भगवान जन साधारण के बीच इस विद्या को बांटते रहे कि कैसे कोई दुखों से पार पा सकता है। दुःख कहां बनता है और जहां बनता हैं वहीं हमें रोक लगाना होगी अन्यथा अज्ञानवश दुखों का पहाड़ सा हम अपने आगे खड़ा करते ही जा रहे हैं।

भगवान ने सिखाया कि जो घटना जैसे हो रही हैं उसे ठीक उसी रूप में बिना प्रतिक्रिया किये देखना होगा तभी नये संस्कार नहीं बनेगे ... और पुराने भव संस्कारों की उदीरणा होगी और उनकी यही शिक्षा
विपश्यना कहलाई।

सौभाग्य से पूज्य आचार्य श्री सत्यनारायण गोयनका जी के सद्प्रयनों से विपश्यना (Vipassana) आज फिर हमें उसी पुरातन और मौलिक रूप में उपलब्ध है और ठीक उसी तरह सिखाई जा रही है जिस तरह आज से 2600 वर्ष पहले सिखाई जाती थी
... और आज भी विपश्यना के अभ्यास से वही कल्याणकारी परिणाम आते हैं जैसे उस समय आते थे।

बुद्ध पूर्णिमा का यह पावन अवसर सभी के मंगल का कारण बने ... सबका मंगल हो।




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