तब लुप्त नहीं होगी कोई सरस्वती


 
 
- सुरेन्द्र बांसल
 
नदियां हमारे जनमानस की स्वच्छता और निर्मलता का प्रतीक हैं, लेकिन आज हमारी गैरजिम्मेदाराना और संवेदनहीन जीवनशैली के कारण नदियां समेत तमाम प्राकृतिक न केवल दूषित होते जा रहे हैं बल्कि भौतिक लोलुपता के कारण दम भी तोड़ रहे हैं। अगर हम जल संस्कृति के वारिस रहना चाहते हैं तो हमें आज से और अभी से नदियों, तालाबों, जोहड़ों, डबरों, बावड़ियों, कुओं और अन्य जलस्रोतों को पुन: सजीव करने के लिए युद्धस्तर पर जुटना होगा, क्योंकि नदियों को खत्म करने का मतलब है धीरे-धीरे सभ्यताओं और संस्कृतियों को खत्म करने का सामान तैयार करना। 
 
अब क्या व्यक्ति, क्या समाज और क्या सरकार, सभी को अपना दायित्व समझकर जलस्रोतों और नदियों को बचाने की मुहिम में जुटना होगा तभी हम काल के अभिशाप से बचेंगे, क्योंकि अगर हम आज नहीं चेते तो कल हमें अभिशाप देगा और रसूल हमजातोव के शब्दों में कहें तो 'अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा और जब भविष्य तोप से गोले बरसाएगा तो हमें बचाने शायद ही कोई आएगा।'
 
नदियों से ओत-प्रोत जैसा भूगोल अपने देश का है, वैसा विश्व में कोई दूसरा नहीं। हमारे उत्तरी क्षेत्र को गंगा और यमुना ने ही संसार का सबसे विस्तृत उर्वर क्षेत्र बनाया है। पश्चिम अपनी 5 नदियों के कारण 'पंचनद प्रदेश' कहलाता है। ये पांचों नदियां वैदिक और पौराणिक काल की हैं। इनमें से सतलुज नदी वेदों-पुराणों में जहां 'शतद्रू' के नाम से विख्यात थी, वहीं ब्यास बिपाशा के नाम से जानी जाती थी। 
 
नर्मदा, महानदी, ताप्ती और सोन नदियां जहां मध्यभारत का गौरव हैं, वहीं दक्षिण भारत कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के कारण धन-धान्य से भरपूर रहा है। उतर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र और तीस्ता के उपकारों को भला कौन भूल सकता है। इन सबके बीच भी सैकड़ों नदियां ऐसी हैं, जो सदियों से देश के जन-गण के लिए प्राकृतिक नीति आयोग का काम करती आ रही हैं। न तो हम भगवान राम के जीवन चरित की साक्षी सरयू को भूल सकते हैं, न गौतम बुद्ध, महावीर के बिहार में विहार करती गंडक नदी को भूल सकते हैं और न ही लाखों भारतीयों के आध्यात्मिक समागम कुंभ को अनदेखा कर सकते हैं।
 
पुण्यदायिनी इन नदियों का ही प्रताप है कि जितनी विविधताभरी और उपजाऊ भूमि भारत में है, उतनी दुनिया में और कहीं नहीं। लेकिन अफसोस की बात है कि पिछले 200 वर्षों की अंग्रेजी शिक्षा और 60 वर्षों की वामपंथी कुशिक्षा ने हमारे लहलहाते कालबोध को कमजोर कर दिया है। अगर हमारे राजनेताओं की जमात ने अंग्रेजी शिक्षा के कारण देश के भूगोल को उपेक्षित न बनाया होता तो आज पाठ्यक्रमों से मिट चुके देश को बच्चे ठीक से पढ़ पाते। वे जान पाते कि अपने देश की नदियों और पहाड़ों के कितने सुंदर नाम और कितना महत्व था। हमारे बच्चे अपने पुरखों की कमाई नेकियों से रू-ब-रू होते। लेकिन भारत का मूल मिटाने वाली वोटजुटाऊ राजनीति और मार्क्सवादी अफीम के नशे में धुत बुद्धिजीवियों ने योजनाबद्ध तरीके से स्कूली पाठ्यक्रमों से देश लगभग मिटा ही डाला है।
 
हमारा वैदिक और पौराणिक साहित्य नदियों की स्तुतियों और पूजा-अर्चना से भरा पड़ा है। प्रत्येक नदी के स्रोत हैं, आरती-पूजा का विधान है लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो-सा गया लगता है तभी तो सरस्वती लुप्त हुई और कई 'सरस्वतियां' विलुप्ति की कगार पर हैं। 
 
प्राकृतिक जलस्रोतों और प्रकृति को मात्र भौतिक दृष्टि से देखना पश्चिम का भोगवादी नजरिया है। हमारी नदियों को किसी भौतिक ऊहापोह में नहीं बांधा जा सकता। आज हमने अपने सारे सरल काम जटिल कर लिए हैं। हम अपने अनेकानेक सामाजिक दायित्व बिसरा चुके हैं। नदियों के प्रति भी हमारे कर्तव्य बाधित और भ्रमित हो चले हैं।
 
लेकिन जिस दौर में केवल अधिकारों की छीना-झपटी मची हो, उस दौर में कर्तव्यों की चिंता भला किसे है? हमारे पुरखों ने नदियों से जुड़े विधि-विधान अपनी जीवनचर्या से जोड़ रखे थे। लेकिन उद्योग बनते सियासी तंत्र में 'अधिकार हमारे, कर्तव्य तुम्हारे' का खेल चल पड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट ही सरकारों की मुख्य नीतियों में शुमार हो चुकी है। हालांकि इसी देश में कुछ बरस पहले ऋषि विनोबा ने कहा था 'सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालकी'। लेकिन इस बात को आज कौन समझ रहा है?
 
इसी बीच 'नमामि गंगे' के संकल्प के साथ हरियाणा सरकार को अपने तमाम जलस्रोतों और छोटी-मोटी सभी नदियों को निर्मल बनाने की सार्थक और व्यावहारिक योजना बनानी चाहिए। जब-तब जलस्रोतों को बचाने के ऐसे अभियान व्यावहारिक नहीं होंगे, तब तक 'सरस्वतियां' यों ही लुप्त होती रहेंगी। आदिबद्री माना जाता है लेकिन हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में प्लाईवुड उद्योग धड़ल्ले से जंगलों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। लगभग 400 लाइसेंस पहले से जारी हैं तथा अभी 200 लाइसेंस और देने की बात चल रही है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि बचा-खुचा भूजल भी सिमटता जाएगा। 
 
इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन को चलाने के लिए कारोबार भी फलने-फूलने चाहिए लेकिन जिम्मेदारी और नियमों के साथ क्या ऐसा संभव नहीं कि प्रत्येक प्लाईवुड लाइसेंसधारक प्रतिवर्ष अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने से पूर्व कम से कम 500 पेड़ अवश्य लगाए? ऐसा संभव है। सरकार को ऐसे नियमों को संभव बनाना चाहिए ताकि भूजल स्रोतों का खजाना बचा रहे। यमुनानगर के पूरे क्षेत्र में सफेदा और पोपलर वृक्ष अपार संख्या में रोपे गए हैं। प्लाईवुड के लिए तो ये वृक्ष काम आ सकते हैं लेकिन भूजल स्तर को ये कितना नुकसान देंगे इसका अंदाजा होते हुए भी आंखें मूंदना बेहद घातक होगा।
 
हरियाणा आज अपनी भूजल संपदा के मामले में बहुत बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है। हरियाणा में कुल जलसंभर क्षेत्र 108 हैं जिनमें से 82 डार्क जोन में बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के अपने क्षेत्र करनाल के सभी 6 ब्लॉक डार्क जोन में बदल चुके हैं। हरियाणा देश का एकमात्र राज्य है जिसमें मात्र 6 फीसदी वन बचे हैं। जिस प्रदेश में वन इतने कम हों वहां कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। हरियाणा की नई सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को श्रद्धा से सींचना होगा। सभी नदियों के किनारों पर युद्धस्तर पर देशज पेड़ रोपने होंगे। पेड़ों से बड़ा जल संरक्षक कोई नहीं होता।
 
ऐसे हालात में भी हरियाणा सरकार सौभाग्यशाली है कि प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार को मात्र नारियल फोड़कर, चार चावल चढ़ाकर और तिलक लगाकर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ना होगा बल्कि उसे सरस्वती के ऐसे स्रोत से प्रेरणा लेकर प्रदेश के सभी पुरातन जलस्रोत की सार-संभाल का जिम्मा उठाना होगा। सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है, जब हरियाणा की नदियां, तालाब, जोहड़, डबरे, बावड़ियों और कुएं संभाले जाएं। अन्यथा देखा जाता रहा है कि ऐसी संस्थाएं कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के 'पेट' की भेंट चढ़ जाती हैं। 
 
अगर प्रदेश सरकार प्रेमियों, जल का महत्व समझने वालों, पंचायतों और युवकों को साथ लेकर अपने जलस्रोतों को बचाने में सफल होती है तो यकीन मानें इससे न केवल दिन-प्रतिदिन विलुप्ति की कंदरा की ओर बढ़ती यमुना बच पाएगी बल्कि कोई 'सरस्वती' कभी लुप्त नहीं होगी। आइए, प्रदेश में फूटे सरस्वती के स्रोत से प्रेरणा लेकर हम सब सुखद भविष्य की रचना में जुटें।
 
(सुरेन्द्र बांसल ने शिक्षा में नवाचार विषय पर शोध किया है। पंजाब-हरियाणा की कुछ पत्र-पत्रिकाओं से भी वे जुड़े रहे एवं सामाजिक कामों से अपनी ऊर्जा पाते हैं।)  साभार- सर्वोदय प्रेस सर्विस 

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