सड़ता शिक्षा तंत्र- उभरते सवाल


शिक्षा पर बात करने से पहले एक सरल-सा किंतु महत्वपूर्ण आंकड़ा आपसे शेयर करना चाहूंगा। भारत की जनसंख्या करीब 1 अरब 25 करोड़ है एवं विश्व की जनसंख्या करीब 7 अरब है इसका मतलब है कि पूरे विश्व की 18% जनसंख्या भारतीय है। औसत रूप से विश्व की कंपनियों में करीब 20% कर्मचारी भारतीय हैं।
 
> नासा में करीब 36% भारतीय वैज्ञानिक हैं। ये गर्व की बात हो सकती है लेकिन इनमें से शायद ही कोई की देन हो, यह एक राष्ट्रीय शर्म का विषय माना जा सकता है। भारतीय होना गर्व की बात है लेकिन वर्तमान भारतीय शिक्षा एक शर्म और चिंता का विषय बनकर रह गई है।
 
स्वतंत्रता के पश्चात भारत में शिक्षा का क्षेत्र पूर्णत: उपेक्षित हो गया। शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ। शिक्षा को अधिक से अधिक धनोपार्जन का माध्यम बनाने का प्रयास हुआ। बेकारी, बेरोजगारी को रोकने के लिए सतत प्रतियोगी परीक्षाओं की बाढ़-सी आ गई। उच्च शिक्षा के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। सुप्रसिद्ध शिक्षाविदों ने एकमत से इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा, 'भारत की वर्तमान प्रशासनिक-शैक्षिक व्यवस्था औपनिवेशिक तंत्र की अनुकृति है जिसे एक विशेष शोषणकारी उद्देश्य से बनाया गया है। इससे गांव व समाज टूटा है, नि:स्वत्व हुआ है। उसी तंत्र का विकास शोषण जारी रखने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यूरोपीय लोगों की पूरी दृष्टि ही शोषणकारी, उपभोगवादी, प्रकृति-प्रतिरोध और भारतीय अर्थ में धर्मविरोधी है।'
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इस तंत्र के जनक मैकाले ने ब्रिटिश संसद में एक भाषण के दौरान कहा था कि मैंने पूरे भारत की चतुर्दिक यात्राएं की हैं और पाया कि वहां पर कोई भी भिखारी या चोर नहीं है। वहां सभी उच्च नैतिक आदर्श वाले धनाढ्य लोग बसते हैं। मुझे नहीं लगता कि हम कभी उस देश को जीत सकते हैं, जब तक कि हम उस देश की रीढ़ की हड्डी यानी उसकी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत पर कुठाराघात नहीं करेंगे। मैं प्रस्तावित करता हूं कि हमें भारत का पुराना सुदृढ़ शिक्षा तंत्र बदलना होगा। हमें भारत के जनमानस को यह सोचने पर मजबूर करना होगा कि विदेशी एवं अंग्रेज उनसे श्रेष्ठ हैं तब ये अपना स्वाभिमान एवं संस्कृति भूल जाएंगे तब हम जैसा चाहेंगे वैसे भारत पर शासन कर सकेंगे।' 
 
वस्तुत: मैकालेवाद एक ऐसी योजना थी, जो शिक्षा प्रणाली के जरिए स्वदेशी संस्कृति को विदेशी औपनिवेशिक संस्कृति से स्थानापन्न करने के लिए प्रयासरत थी। मैकालेवाद का मुख्य उद्देश्य था भारतीयों की एक ऐसी जमात तैयार करना, जो रंग से भारतीय हो किंतु मिजाज, मतों एवं नैतिकताओं एवं तर्क में अंग्रेजीयत लिए हुए हो। 
 
 

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