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हर तरफ, हर जगह बेशुमार है कतार........

Author स्मृति आदित्य|
लंबी लाइन, खूब लंबी लाइन..लगातार बढ़ती लाइन.....नोटबंदी की वजह से हर तरफ चर्चा है इस की लेकिन अपने दिल से पूछें जरा क्या यह पहली बार लगी है.....देश में बरसों से हर कहीं किसी न किसी वजह से लगी लाइनें हैं.. बरसों से अपनी बारी का इतंजार करती थकती और डबडबाई आंखें हैं....


जरा गौर कीजिएगा... न जाने कितने साल से चल रहे हैं कोर्ट के केस, न जाने कितने सालों से लंबित पड़े हैं फैसले.... न जाने कितने सालों से हो रहा है न्याय का इंतजार... तारीख पर तारीख लगती है और लाइन है कि कभी कम नहीं होती.... जमीन, जायदाद, आपसी रंजिश, दहेज, प्रताड़ना, तलाक, बलात्कार, अपहरण यह एक अंतहीन सूची है उन विषयों की जो कोर्ट कचहरी में लंबी कतार में है ...एक-एक विषय पर अदालत में कतारबद्ध हैं मामले और हर विषय की लंबी कतार में है....इनके पीडित..... जिन गरीबों, किसानों और छोटे व्यापारियों की दुहाई दी जा रही है उनकी दुर्दशा देखनी है तो इन्हीं कतारों में ही मिलेगी... उन्हें तो अब लगभग आदत सी हो चली है इन लाइनों की...कभी बैंक में, कभी सूदखोरों के यहां, तो कभी कचहरी में.... कभी सरकारी योजनाओं का हितग्राही बनने के लिए तो कभी अपने ही किसी निजी मामले में..... 
 
एक गरीब नोटबंदी होने से पहले भी महीनों परेशान रहता था तब किसी की नजर नहीं पड़ी, एक गरीब नोटबंदी से पहले भी भूख से मरता था तब किसी की आह नहीं निकली, एक गरीब नोटबंदी से पहले भी अपनी बेटी की शादी के लिए धन जुटाने का प्रयत्न करता किसी लाइन में लगा रहता था पर तब किसी को फुरसत नहीं थी क्योंकि तब वह किसी राजनीति का मोहरा बनने के काम का नहीं था.... 
 
राशन की लाइन, कर्जे की लाइन, दवाई की लाइन, अस्पताल की लाइन, महंगी जांचों के लिए लाइन, बीजों के लिए लाइन, भोजन के लिए लाइन, मुफ्त‍ बंटते कपड़ों के लिए लाइन....कहीं यह लाइन दिखाई देती है कहीं नजर नहीं आती पर होती तो है...जैसे रोजगार के लिए लाइन, करियर के लिए लाइन, कोचिंग के लिए लाइन, प्रतिक्षित परिणामों के लिए लाइन .... आवेदन के लिए लाइन, फिर भर्ती के लिए लाइन....‍‍फिर आशानुरूप परिणामों के लिए लाइन... शिक्षा से लेकर हर तरह की नौकरी में भर्ती के लिए लाइन...  पुलिस की भर्ती की लाइन तो हमेशा अखबारों में कैप्शन के साथ प्रकाशित होती है। वहां भी धूप और कड़ी मेहनत से कुछ लोग दम तोड़ देते हैं और फिर उन पर आने वाले फैसले कतार में ही रहते हैं। दम सिर्फ रुपयों की लाइन की वजह से ही नहीं टूटता दम रुपयों के लिए भी टूटता है। 
 
दया करने वाले नेता जरा बताएं कि उनसे मिलने आने वाले आम जन की लंबी कतार पर कभी उन्हें दया आई है? किसी भी नेता के घर पर लगा मजमा देखें कि सिफारिश की लालसा में कितनी लंबी लाइन सजी होती है और कितने लोग राजधानी से निराश हो कर जाते हैं....  रसूखदार नेता कितनी सिफारिशें करते हैं और कितनों को उल्टे पैर लौटाते हैं जरा रजिस्टर में हिसाब देखिएगा.... 
 
देश में हर कहीं हर  तरह की 'टिकटों' के लिए लाइन है, हर कहीं कुछ पा लेने की लाइन है, कहीं कुछ देने की लाइन है... दर्शन के लिए भक्तों की लाइन है तो कहीं भक्तों के लिए चैनलों पर बाबाओं की लाइन है  ... तो यह लाइन तो हम आम जन की जिंदगी का हिस्सा है, रोजमर्रा का काम है। फिर भला लाइन से कैसा घबराना..... यहां नहीं लगे तो कहीं और किसी और मकसद से लगना होगा लाइन में, पर लगना तो होगा.... क्यों न एक बार अपने देश के लिए, देश की आर्थिक स्वच्छता के लिए यूं भी लगकर देखें लाइन में....लग कर देखिए अच्छा लगता है।      

  

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