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इश़्क पे ज़ोर नहीं
इश़्क पे ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब' ---------- कि लगाये न लगे और बुझाये न बने ...
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मुनव्वर राना के मुनफ़रिद अशआर
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ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ...
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अशआर : (मजरूह सुलतानपुरी)
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इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
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आज का शेर
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नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए--------------------------------- पंखुड़ी इक गुलाब की सी है----------------- मीर
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शादी को बनाएँ अफेयर प्रूफ
कहते हैं इश्क कब, कहाँ और किससे हो जाए यह कोई नहीं जानता। शादीशुदा स्त्री और पुरुष जब इश्क के चक्कर में पड़ते हैं तो कई जिंदगियाँ दाँव पर लग जाती हैं और हाथ आती है बदनामी...बदनामी... और सिर्फ बदनामी।
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प्यार के लिए विवश करना प्रेम नहीं
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हाथ नहीं मिल जाएँ दिल भी
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प्रेम से महकाएँ दांपत्य
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मि. हसबैंड के रोमांटिक मूड