बुझ कर लगी हुई कहीं लग कर बुझी हुई --------------------------------------------- इक आग है ज़मीं से फ़लक तक लगी हुई -----------------------------------------
लगता है तुमसे कुछ मेरा रिश्ता ज़रूर है-------------------------------------- काँटा मुझे लगा तो तुम्हें क्यों ख़ुशी हुई ...
वो हमें जब भी बुलाएँगे चले जाएँगे -------------------------------------------------------------------
उससे मिलना हो तो मौसम नहीं देखा जाता - मुनव्वर राना
ऐसा लगता है मानो हम बीते वर्ष के साथ अभी पूरी तरह जी भी नहीं कह पाए थे कि वह हाथ से निकल गया। कितना कीमती था वह हर पल, हर लम्हा, हर दिन, हर सप्ताह और हर महीना! आज उसकी अहमियत समझ में आ रही है।