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ग़ज़लें
WD
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कौसर सिद्दीक़ी की ग़ज़लें
बुझ कर लगी हुई कहीं लग कर बुझी हुई --------------------------------------------- इक आग है ज़मीं से फ़लक तक लगी हुई ----------------------------------------- लगता है तुमसे कुछ मेरा रिश्ता ज़रूर है-------------------------------------- काँटा मुझे लगा तो तुम्हें क्यों ख़ुशी हुई ...
राही
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वो हमें जब भी बुलाएँगे
वो हमें जब भी बुलाएँगे चले जाएँगे ------------------------------------------------------------------- उससे मिलना हो तो मौसम नहीं देखा जाता - मुनव्वर राना
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रोमांस
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नए वर्ष में खुशी का पैगाम
ऐसा लगता है मानो हम बीते वर्ष के साथ अभी पूरी तरह जी भी नहीं कह पाए थे कि वह हाथ से निकल गया। कितना कीमती था वह हर पल, हर लम्हा, हर दिन, हर सप्ताह और हर महीना! आज उसकी अहमियत समझ में आ रही है।
• तेरे-मेरे बीच जरा फासिला भी हो • 65 वर्ष से बगैर भोजन जिंदा हैं
• तुम्हारे साथ प्यार की बातें • प्यार करना चाहता हूँ तुम्हें
• किसी का जहां में सहारा नहीं है • साधु और मदारियों के चमत्कार एक जैसे