बचपन, एक ऐसा मधुर शब्द जिसे सुनते ही लगता है मानो शहद की मीठी बूँद जुबान पर रख ली हो। जिसकी कोमल कच्ची यादें जब दिल में उमड़ती है तो मुस्कान का गुलाबी छींटा होंठों पर सज उठता है। जब भी इन महकते हरियाले पन्नों को फुरसत में बैठकर खोला और इन पर जमी धूल की परतों पर यादों की फुहारें डाली, भीनी-भीनी सुगंध की बयार ने उठकर मन को भावुक बना दिया।
जब बच्चों का ही दिन है तो क्यों न उन बच्चों के बारे में भी सोचा जाए जो न तो सुविधासंपन्न है और न ही शिक्षित, जिनके पास न तो खाने को पेट भर रोटी है और न ही तन ढँकने को कपड़े।
दुनिया के सात अजूबे कोई भी हों लेकिन आठवाँ अजूबा हमेशा बच्चे ही रहेंगे, ऐसा मुझे लगता है। देखा जाए तो बच्चे ईश्वर की सबसे अद्भुत कृति हैं। विश्व में अगर सबसे ज्यादा संज्ञाएँ किसी को दी जा सकती हैं तो वे बच्चे हैं दूसरा कोई नहीं। निडरता, सच्चाई, मासूमियत, तत्परता, स्फूर्ती, तुरंत निर्णय लेने की क्षमता और न जाने क्या-क्या।