अमिताभ बने शहंशाह 1969 में सात हिंदुस्तानी फिल्म से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले अमिताभ बच्चन ने अस्सी के दशक तक बॉलीवुड के सिंहासन पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित कर लिया। ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘त्रिशूल’ ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘डॉन’ जैसी हिट फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता के सबसे ऊँचे पायदान पर पहुँचा दि'या। 1975 में आपातकाल के बाद आम भारतीयों के आक्रोश को अमिताभ ने फिल्मों में बेहतरीन अभिव्यक्ति दी और अमिताभ की छवि एक एंग्री यंग मैन की बन गई।
रूमानियत और हास्य का दौर नब्बे के दशक की शुरुआती फिल्मों में प्यार और मोहब्बत का रंग छाया रहा। लेकिन इस वक्त तक बॉलीवुड एक ऐसे कैनवास का रूप ले चुका था , जिस पर हर रंग की तूलिका चलाने की छूट फिल्मकारों के पास थी। इस दशक में खान सितारों ने दर्शकों का दिल जीता। गोविंदा और डेविड धवन की जोड़ी ने दर्शकों को खूब हँसाया। वहीं मणिरत्नम और रामगोपाल वर्मा नए विचारों के साथ बॉलीवुड की जमीन को सींचते रहे।
एक बार फिर चढ़ा वसंती रंग वर्ष 2000 के दशक में आशुतोष गोवारीकर की फिल्म लगान ने देशभक्ति की खुशबू से बॉलीवुड को महकाया। इसी दशक में आशुतोष गोवारीकर, करण जौहर, मधुर भंडारकर, विशाल भारद्वाज और संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशकों का उदय हुआ, जिनके पास एक नई दृष्टि, विचार और आधुनिक तकनीक है। इसी दौर में राकेश मेहरा ने ‘रंग दे बसंती’ बनाकर नवीनतम संदर्भों में देशभक्ति का सवाल उठाया और बॉलीवुड को नए वसंती रंग में रंग दिया।
प्रयोगधर्मी सिनेमा की शुरुआत समय के साथ हिंदी सिनेमा में प्रयोगधर्मिता का विकास हुआ है। जो विषय अब तक संवाद से भी अछूते थे, वे अब सिनेमा का विषय बनने लगे हैं। ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘ऊप्स’, ‘फायर’ और ‘माय ब्रदर निखिल’ इसी कड़ी की फिल्में हैं। विवाहेतर रिश्तों और समलैंगिक संबंधों पर बन रही फिल्में संबंधों को नए नजरिए से परिभाषित कर रही हैं।
प्रस्तुति : नूपुर दीक्षित
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