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सिनेमा के 60 बरस
आजादी के बाद हिंदी फिल्‍मों का सफर
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वैश्विक हुआ भारतीय सिनेमा
वर्ष 1957 में भारतीय सिनेमा को अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर बहुत सराहा गया। इसी वर्ष राजकपूर की फिल्‍म ‘जागते रहो’ ने कार्लोवी वारी फिल्‍म समारोह में पुरस्‍कार जीता। सेन फ्रांसिस्‍को में पाथेर पाँचाली को सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का खिताब मिला। फिल्‍म ‘मदर इंडिया’ को ऑस्‍कर पुरस्‍कार के लिए नामांकित किया गया।

मनोज कुमार का देशप्रे
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साठ के दशक की सुपरहिट फिल्‍म ‘उपकार’ में मनोज कुमार जब सिल्‍वर स्‍क्रीन पर ‘मेरे देश की धरती’ गुनगुनाते हुए दिखे तो आम भारतीय दर्शकों ने टिकट खिड़की पर रुपयों की बरसात कर दी। मनोज कुमार ने अपने समय में बॉलीवुड को देशभक्ति के रंग से रंग दिया। ‘शहीद’, ‘उपकार’ और ‘पूरब और पश्चिम’ के बाद से मनोज कुमार की छवि भारत कुमार की बन गई।

महाकाव्‍यात्‍मक फिल्‍मों की शुरुआत:
साठ के दशक में 15 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद के. आसिफ का ख्‍वाब ‘मुगल-ए-आजम’ सिनेमा के पर्दे पर साकार हुआ। उस समय इस फिल्‍म की लागत डेढ़ करोड़ रुपए आई थी। इसे सिनेमा में भव्‍यता की शुरुआत कहा जा सकता है। यह फिल्‍म सुप‍रहिट हुई और आज भी हिंदी सिनेमा में मील का पत्‍थर मानी जाती है।

समांतर सिनेमा की नई धार
भारत में यथार्थवादी सिनेमा के खाते में आम दर्शकों की तालियाँ और सीटियाँ भले ही न लिखी हों, फिर भी कुछ समर्पित फिल्‍मकार कला सिनेमा में अपना अद्वितीय योगदान जरूर देते रहे। श्‍याम बेनेगल और गोविंद निहलानी सरीखे फिल्‍मकारों ने समांतर सिनेमा की नई धारा की शुरुआत की। श्‍याम बेनेगल ने कुछ नए और यथार्थवादी सिनेमा के साथ फिल्‍म जगत में प्रवेश किया। बेनेगल ने ‘अंकुर’, ‘निशांत’ और ‘मंथन’ जैसी बेहतरीन कृतियाँ हिंदी फिल्‍म उद्योग को दीं। वहीं गोविंद निहलानी ने ‘आक्रोश’ और ‘दृष्टि’ जैसी फिल्‍में बनाकर सिनेमा को नए रूप में परि‍भाषित किया।

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सुपर स्‍टार बने काक
वर्ष 1966 में अपने पुश्‍तैनी व्‍यवसाय को छोड़कर राजेश खन्‍ना फिल्‍म उद्योग में दाखिल हुए। उनकी पहली फिल्‍म ‘आखिरी खत’ को विशेष सफलता नहीं मिली। लेकिन इस फिल्‍म ने बॉलीवुड को एक नया सितारा जरूर दे दिया था। उसके बाद का पूरा दौर सुपर स्‍टार राजेश खन्‍ना का दौर है। 1969 में ‘आराधना’, 1970 में ‘आनंद’, 1971 में ‘अमरप्रेम’ और इसके बाद ‘अंदाज’, ‘बावर्ची’ जैसी सुपरहिट फिल्‍में देकर राजेश खन्‍ना लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गए। राजेश खन्‍ना का जादू युवाओं पर कुछ इस तरह चला कि कपड़ों से लेकर बालों को सँवारने तक में लोग उन्‍हीं की नकल करने लगे। राजेश खन्‍ना के बाद ऐसी लोकप्रियता कम ही सितारों को नसीब हुई।
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