मत छेड़ कि यार से जुदा हूँ
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मौ. मुस्तफ़ा खाँ 'शेफ्ता' मत छेड़ कि यार से जुदा हूँ,ऐ मर्ग मैं आप मर रहा हूँ।लैला कहने से बिगड़ गए थे,दीवाना मैं जान कर बना हूँ।कहता हूँ जो ग़ैर से न मिलिए, कहता है कि क्या मैं बेवफ़ा हूँ। बेगाना-वशी, सितम है उनकी, ग़ैरों को भी यार जानता हूँ। हमदम! न सही मुहब्बत उसको, इस बात पे क्या उसे न चाहूँ।मैं 'शेफ़्ता' हूँ अज़ीजे-दिलहा, शीरीं गुफ़्तार, खुश-नवा हूँ।