'माँ' के लिए जारी रहेगी ऑनलाइन मुहिम

- दिनेश ''दर्द''

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'माँ'...माथे पर चाँद-सी बिंदी सजाए ये छोटा-सा लफ़्ज़ अपने आप में ही कितना सुंदर लगता है। जैसे इस एक ही लफ़्ज़ में सारी काइनात समा गई हो, इससे बाहर कहीं कुछ भी नहीं। दुनिया के दीगर सारे लफ़्ज़ भी इसी एक लफ़्ज़ में निहाँ हो गए हों जैसे। समझा जा सकता है कि जिसने ये दुनिया बनाई, उसी के ईजाद किए इस लफ़्ज़ में इतना कुछ समाया है, तो फिर हू-ब-हू माँ से इतर इस दुनिया में बचा ही क्या होगा। इंसान की शक्ल में अगर माँ को देखें, तो ये आँसू, दुआ, दया और मुहब्बत से सरशार कोई मूरत नज़र आती है, जिसकी रहमत की कोई इंतिहा नहीं।

जहाँ मग़्रिबी दुनिया के लोगों ने ममता की इस मूरत को याद करने के लिए साल में महज़ एक दिन मुअय्यन (निश्चित) किया है। वहीं एक शख़्स है, जो कहता है कि, 'माँ का एक दिन नहीं होता, सदी होती है।' और इसी के तहत आने वाले कई दिनों तक 'माँ' के लिए एक ऑनलाइन मुहिम जारी रहेगी, जिसमें दुनिया का हर बेटा अपनी माँ के लिए अपने जज्बात ज़ाहिर कर सकता है।
माँ के पैरों की ख़ाक को बनाया संदल : दुनिया में अगर कहीं 'माँ' का ज़िक्र हो, तो बहुत लाज़मी है कि वहाँ शायर मुनव्वर राना का ज़िक्र भी आए। जी हाँ, मुनव्वर राना, जिन्होंने माँ को एक रिश्ते से बहुत ऊँचा उठाकर, इबादत के काबिल बना दिया। उन्होंने अपनी शायरी से माँ के पैरों की ख़ाक में वो सिफ़त पैदा कर दी, जिसे माथे से लगाकर सारा जिस्म संदल की तरह महकाया जा सकता है। अपनी शायरी में उन्होंने माँ के इतने पहलुओं को उभारा है कि आज उनकी शायरी एक सरमाया बन पड़ी है। और लगता है, जैसे माँ पर लिक्खी उनकी तमाम शायरी के एक-इक हर्फ़ में जज्बात के कई-कई समंदर उमड़ रहे हों। शायद, तभी तो जब-जब माँ के लिए लिक्खा मुनव्वर का कोई शेर पढ़ा जाता है, आँखें बेसाख्ता ही छलछला उठती हैं।
माँ के नाम दिन नहीं, सदी होती है : इस साल मुनव्वर राना ने 'मदर्स डे' पर दुनियाभर की माँओं के लिए 'मदर्स डे विद मुनव्वर राना' नाम की एक अजब-सी सौगात पेश की। इससे दो दिन पहले ही उन्होंने एक वीडियो रिलीज़ कर सोशल मीडिया पर जुड़े तमाम लोगों से इस इवेंट में शामिल होने की अपील की थी।

तारीख़ बदलकर जब मदर्स डे शुरू होने का ऐलान करने वाली थी, उसी रात ठीक 12 बजे राना साहब ने एक शेर कहकर, मुहिम का आगाज़ किया। उन्होंने कहा कि-
ऐसे तो उससे मोहब्बत में कमी होती है,
माँ का एक दिन नहीं होता है, सदी होती है

6 लाख लोगों तक पहुँचे 'माँ' के शेर : अभी मुहिम शुरू हुई ही थी कि इसी के साथ जैसे एक और नई तारीख़ का पन्ना भी लिक्खा जाने लगा। सोशल मीडिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी शायर के 'माँ' पर कहे बेशतर अशआर शेयर किए जा रहे हों। ट्विटर पर MothersDayWithMunawwarRana शीर्ष रुझानों (टॉप ट्रेंड्स) में शामिल रहा। नतीजा ये रहा कि ऑनलाइन ही उनके शेर तक़रीबन 6 लाख लोगों तक पहुंच गए। एक चाहने वाले कादिर मंसूरी साहब ने तो क़रीब 7 घंटे की मेहनत के बाद फेसबुक पर मुनव्वर राना के 'माँ' पर कहे क़रीब-क़रीब सभी शेर पोस्ट कर दिए। कुछ लोगों ने अपनी दीवानगी का मुज़ाहरा राना साहब के अशआर को मुख्तलिफ़ डिज़ाइन में सजाकर किया, जिन्हें राना साहब ने अपने ऑफीशियल फेसबुक पेज और ट्विटर पर उनके और शहर के नाम सहित पोस्ट भी किया।
राना ने सबके सर बांधा कामयाबी का सेहरा : मुहिम की अब तक की कामयाबी के लिए मुनव्वर राना साहब ने इस ऑनलाइन इवेंट के ऑर्गेनाइज़र और उनके वेब एंड सोशल मीडिया ऑफीशियल रेप्रेज़ेन्टेटिव, सॉफ्टवेयर इंजीनियर ज़ियाउल इस्लाम के साथ उनकी टीम की भी जमकर सराहना की। वहीं इस मुहिम में शामिल अतिया ज़ैदी, राअना सफ़वी, आबिद ज़ैदी, गौरव शर्मा, आनंद पांडे, विजेंद्र शर्मा, भोलानाथ गुप्ता, इमराना-शाहीन, मुक्ता राठौर, मुस्तेजाब खान, सैफुल इस्लाम के साथ दम-ब-दम हमक़दम रहे तमाम शैदाई का भी शुक्र अदा किया।
ख़ुद भी रोए, माँ को भी रुला दिया : ऐसा नहीं कि इस मुहिम में उनके दीवानों की दीवानगी छाई रही, ख़ुद राना साहब भी शनिवार रात 11:30 बजे से सुबह 6 बजे तक ट्‍विटर और फेसबुक पर लोगों के दरमियान रहे। इसके बाद रविवार सुबह 10 बजे से रात 2 बजे तक फिर ऑनलाइन रहे। इस दौरान राना साहब को कई संदेश मिले, जिनमें लिखा था कि, 'राना साहब! आपने आज हमें माँ की मोहब्बत का एहसास दिला दिया।' कई लोगों ने अपनी माँ को राना साहब के शेर सुनाए। और ऐसा करके उन्होंने न केवल अपनी माँ को ही जज्बाती किया, बल्कि ख़ुद भी जज्बाती हो गए। जज्बात का ये सैलाब जब हदें तोड़ गया, तो मुनव्वर साहब की आखों से भी दरिया बह निकला। और ऐसे वक्त के लिए उन्होंने कहा कि-
मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं,
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

8 दिन से भूखी माँ के लिए लिक्खा शेर : इसी शाम एक अख़बार से किसी रिपोर्टर ने दिल दहला देने वाली हक़ीक़त सुनाई और तड़पा दिया। उसने राना साहब को बताया कि लखनऊ में 8 दिन पहले एक लड़के का अपहरण हुआ था। इसके बाद से ही उसकी माँ के हलक़ में एक निवाला तक नहीं उतरा, उन्होंने 8 दिन से कुछ भी नहीं खाया। और इत्तिफ़ाक़ ये है कि उस दिन 'मदर्स डे' भी था। इस मौके पर उस बेबस माँ के लिए एक शेर तो बनता है। इस पर राना साहब ने फौरन उस भूखी-प्यासी माँ के नाम एक शेर कर दिया। उन्होंने कहा कि -
मेरी ममता को बुढ़ापे का सहारा चाहिए,
मुझको बेटा चाहिए और वो भी ज़िंदा चाहिए

किताबों पर ख़ास छूट, माँ एल्बम का प्रोमो लांच : मदर्स डे पर वाणी प्रकाशन ने मुनव्वर राना की किताबों, 'माँ' और 'मुहाजिर नामा' पर ख़ास छूट देने का भी फैसला किया। इसी रात 12.30 बजे 'माँ' पर लिक्खे मुनव्वर राना के गीतों के एलबम का प्रोमो भी लांच किया गया, जिसे कोलकाता के गायक तारिक ने कम्पोज़ किया है।
आप भी कर सकते हैं पोस्ट : बक़ौल मुनव्वर राना, 'माँ का एक दिन नहीं होता है, सदी होती है।' लिहाज़ा, 'मदर्स डे' की मुहिम को फिल्हाल बंद न किया जाकर और आगे बढ़ा दिया गया है। इसके चलते ऑनलाइन यूज़र्स इस ईवेंट के ज़रिए अपनी-अपनी माँ की ख़िदमत में राना साहब द्वारा 'माँ' पर कहे शेर और इमेज पोस्ट कर सकते हैं।

आईए, चलते-चलते माँ की मोहब्बत पर कहे मुनव्वर राना के चंद शेर पढ़ते चलें :
ख़ुदा ने ये सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख्शी है,
कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं।

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,
माँ बहुत गुस्से में होती है, तो रो देती है।

तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक,
मुझको अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी।
मुझसे दो क़तरे भी आंसू के छुपाए ना गए,
माँ तो आँखों में समन्दर को छुपा लेती है।

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।

कल अपनेआप को देखा था माँ की आँखों में,
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है।
मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं,
सिर्फ़ एक काग़ज़ पे लिक्खा शब्द माँ रहने दिया।

ये ऐसा क़र्ज़ है, जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर ना लौटूं, मेरी माँ सजदे में रहती है।

क़ुबूलियत की घड़ी है अगर मेरे मौला,
तो माँ के चेहरे से ये सारी झुर्रियां उड़ जाए।
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई,
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई।

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