परंपराओं से स्थापित प्रकृत‍ि व पर्यावरण का परस्पर संबंध


10 पत्तियां बड़ी, चमड़े जैसी मजबूत व चमकदार होती हैं जिन्हें कृष्ण की जन्मस्थली माना जाता है।
11 इससे निकलने वाला दूध जैसा स्त्राव दर्द निवारक (दांत के दर्द) होता है।
12 इससे प्राप्त ल्यूकोसाइनाड्स - डायबिटीज (मधुमेह) की दवा में प्रयुक्त होता है।
13 इसकी लकड़ी पानी से जल्दी खराब नहीं होती अतः फर्निचर में काम आती है।
14 तने व जड़ों से प्राप्त रेशा, पेपर व रस्सी बनाने के काम आता है।
15 ताजे फल सुखाकर खाए जाते हैं।
16 पुष्पक्रम विशिष्ठ प्रकार - हाइपेन्थोडियम कहलाता है।
17 यह इण्डोनेशिया में एकता का प्रतीक माना जाता है।
18 इसका आकर्षक बोन्साई सुंदरता के कारण बहुमूल्य व महंगा होता है।
 
भारत के देहातों में इसके आसपास ट्रैफिक सर्कल, बस स्टैंड होते हैं व रात में चौपाल लगती है। अतः यह सामाजिक संस्कृति का परिचायक है।
प्रकृति की इस अप्रतीम अद्भुत देन सुहाग की लंबी उम्र की कामना व परिवार के हित के लिए इसके संरक्षण को परंपराओं की आड़ में ही सही, विकसित करने का आधार वैज्ञानिक व आधुनिक है।
 
ऐसी स्वस्थ परंपराओं को नए स्वरूप में अधिक से अधिक लगाकर सहेजने की जरूरत है। आज के युग में प्रदूषण के प्रकोप से, प्राकृतिक विपदाओं से निपटने की पूर्व तैयारी के रूप में इन्हें पुनर्स्थापित करना सामयिक सार्थक है।

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