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महाशक्तियों की जिद से उलझी सीरिया की पहेली

Author शरद सिंगी|

पिछले पखवाड़े सीरिया की सरकार ने अपने ही नागरिकों पर रासायनिक हथियार से हमला कर, अस्‍सी से अधिक लोगों, जिनमें कई बच्चे भी शामिल थे, को मौत के घाट उतार दिया। रासायनिक शस्त्र वे शस्त्र हैं जिनके द्वारा जहरीले रासायनिक पदार्थों को किसी बम या खोल में भरकर विस्फोट के माध्यम से हवा में फैला दिया जाता है। 
  
रासायनिक शस्त्र मनुष्य की वीभत्स खोजों में से एक है। साधारण विस्फोटों से संपत्ति और जानमाल की हानि होती है। रासायनिक हथियारों से संपत्ति को नुकसान नहीं होता किन्तु पूरी मानवता का विलोप हो जाता है। एक बार चला देने पर बचने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि कोई बच गया तो प्रभावित व्यक्ति की जिंदगी नारकीय हो जाती है। रासायनिक हथियारों में जो पांच जहरीली गैसें सबसे अधिक प्रचलित हैं वे हैं सरीन गैस, रिसिन गैस, मस्टर्ड गैस, एजेंट 15 और क्लोरीन गैस। टर्की के अनुसार, सीरिया ने सरीन गैस का उपयोग किया था। 
 
सरीन एक मानव निर्मित घातक विष है, जिसका कोई रंग, स्वाद या गंध नहीं है। उत्पादन के समय वह तरल के रूप में होता है, किन्तु हवा के संपर्क में आते ही यह तरल वाष्पीकृत हो जाता है। यह दुनिया का सबसे घातक और तेज़ असर करने वाला विष है, जिसके संपर्क में आते ही मनुष्य अपनी शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण खो देते हैं और उनकी श्वसन प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। तुरंत उपचार न मिलने की दशा में पहले व्यक्ति कोमा में चले जाते हैं और फिर मृत्यु अवश्यम्भावी है।
 
संयुक्त राष्ट्रसंघ और अमेरिका, सीरिया के राष्ट्रपति बशर को रासायनिक हथियारों के उपयोग के विरुद्ध कई बार चेतावनी दे चुके हैं, किन्तु सीरिया पर आरोप है कि वह इन चेतावनियों और धमकियों की परवाह किए बगैर निरंतर इन हथियारों का इस्तेमाल अपनी जनता पर कर रहा है। इस बार जब इसका उपयोग किया तो ट्रंप ने तुरंत मिसाइलें दागने की अनुमति दे डाली। 59 आधुनिकतम टॉम हॉक मिसाइलें कुछ ही घंटों में सीरिया के उस एयरपोर्ट पर दाग दी गईं, जहां से रासायनिक हथियारों को ढोया गया था। एक मिसाइल की कीमत लगभग 10 करोड़ रुपए आंकी गई है अर्थात 590 करोड़ कुछ ही मिनटों में स्वाहा हो गए। ट्रंप के आने के बाद ट्रंप और पुतिन के निकट आने की जो संभावना बनी थी, वह भी इन धमाकों के धुंए में उड़ गई। 
 
इस तरह ट्रंप सरकार ने कड़े संकेत दिए हैं कि अब और पुतिन, अमेरिकी धमकियों को आसानी से नहीं ले सकते। सीरिया पर अभी तक अमेरिकी नीति ढुलमुल रही है। पहले तो रूस के मैदान में आने से अमेरिका ने कुछ कदम पीछे खींच लिए थे, लेकिन मिसाइल के इस आक्रमण से अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि मध्य पूर्व में चल रही वर्चस्व की जंग में अब उसे निष्क्रिय भागीदार नहीं समझा जा सकता।  
 
विडम्बना यह है कि अमेरिका द्वारा किया गया हर हमला, सीरिया को रूस के और अधिक नज़दीक ले जाता है और रूस को अमेरिका से दूर। यद्यपि इस समय जो मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है वह है इसिस। लेकिन इसकी आड़ में सीरिया और तुर्की की सरकारें अपने-अपने दुश्मनों के सफाए में लगी हैं। दुनिया के देशों को मोहरा बनाकर उन्हें अपने हितों के लिए सीधे या छद्म युद्ध में धकेलने वाली महाशक्तियां अपने-अपने प्रभुत्व और अहंकार की लड़ाई में आज स्वयं सीरिया के हाथों मोहरा बन चुकी हैं। 
 
दुर्भाग्य की बात है कि दुनिया के सामने इसिस आतंकियों से जो खतरा पैदा हो गया था उनके साथ लड़ाई तो नेपथ्य में चली गई और इस अहम् की लड़ाई में आम नागरिकों को जानें गंवानी पड़ रही है। इसमें संदेह नहीं कि सीरिया का हल तभी निकल सकता है, जब वर्तमान सरकार अपना पद छोड़े और एक राष्ट्रीय सरकार बने, किंतु यह दूर की कौड़ी है, क्योंकि यहां की राजनीति धार्मिक वर्चस्व पर केंद्रित हो गई है। 
 
धार्मिक वर्चस्व की लड़ाइयों के जिस मार्ग को दशकों पूर्व त्यागकर मानवता आगे बढ़ चुकी थी, दुःख की बात तो यह है कि चंद कट्टरपंथी सरकारों की वजह से दुनिया पुनः उसी मार्ग की ओर अग्रसर है। सच तो यह है कि महाशक्तियां जिस दिन अपनी सोच में एक हो गईं, उसी दिन हल निकल जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि वे साथ मिलकर बैठें और मानवता को विनाश से बचाएं अन्यथा दोष सबके के सिर पर होगा।  
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