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विश्व सरोवर में कतर बना एक गंदी मछली

शरद सिंगी|
अरब देशों के परिवार में एक छोटा-सा देश है कतर, जो इस समय विश्व के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। इस देश की जनसंख्या मात्र 27 लाख है और क्षेत्रफल के हिसाब से यह देश हमारे देश के त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य के क्षेत्रफल के बराबर है यानी केरल के क्षेत्रफल से भी एक तिहाई है का क्षेत्रफल। किसी समय सबसे गरीब देशों की गिनती में आने वाला यह देश आज विश्व के सबसे धनाढ्य राष्ट्रों की गिनती में है।
 
पेट्रोल और गैस के अकूत भंडारों ने आज इसे अमीर राष्ट्रों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया है। किंतु धन आने के साथ ही इसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पर लग गए। इसने अपनी चादर से अधिक पैर फैलाने का प्रयास किया। धन सर पर चढ़कर बोलने लगा। अपनी हैसियत से अधिक क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में स्वयं की भूमिका को निर्धारित करने की कोशिश की।
 
खाड़ी के देशों में आपस में रोटी-बेटी का व्यवहार है अर्थात वे एक परिवार की तरह आपस में बंधे हुए हैं किंतु कतर का चरित्र एक पथभ्रष्ट औलाद की तरह हो गया है, जो अपने ही परिवार के हितों के विरुद्ध जाने से नहीं हिचकता। पड़ोसी राज्यों की कानून व्यवस्था में निरंतर छेड़खानी करना उसके लिए एक सामान्य बात हो गई थी। पड़ोसी देशों के शासन विरोधी उग्रवादी संगठनों को सहायता देने में उसे कुछ अनुचित नहीं लगता।
 
सन् 2022 के फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी हासिल करने के लिए कतर पर विश्व फुटबॉल संस्था फीफा और उसके पदाधिकारियों पर बेतहाशा धन लुटाने का आरोप है। गलत तरीकों से विश्व कप फुटबॉल की मेजबानी हासिल कर कतर दुनिया के कई प्रतिद्वंद्वी देशों की आंखों की किरकिरी बन चुका है, जो फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी चाहते थे और सच्चे हकदार भी थे। 
 
इन सबके अतिरिक्त कतर पर आतंकवादियों के वित्तपोषण के जो आरोप लगे हैं, वे बहुत गंभीर हैं। फिलिस्तीन के उग्रवादी संगठन हमास और मिस्र के उग्रवादी संगठन मुस्लिम ब्रदरहूड को कतर अनवरत समर्थन, सहयोग और धन देता रहा है जबकि ये संगठन पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा प्रतिबंधित हैं। कतर का तर्क है कि ये आतंकी संगठन नहीं अपितु ये संगठन कभी अपने धर्म तो कभी तानाशाहों से आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।
 
किंतु सऊदी अरब और बहरीन में हुई कुछ आतंकी घटनाओं ने अरब देशों को चौकन्ना कर दिया है और इन देशों द्वारा कई बार समझाने के बावजूद कतर इन संगठनों को सहायता देना नहीं छोड़ रहा था। आखिर हारकर पिछले सप्ताह खाड़ी के देशों ने कतर से राजनयिक संबंधों के साथ-साथ व्यापारिक संबंध भी तोड़ लिए। सड़क, वायु और जल यातायात पर भी रोक लगा दी है। 
 
कतर इस समय तन्हा हो गया है और आपदा की स्थिति में है। इसके बावजूद उसने अभी तक अपनी जिद नहीं छोड़ी है। विडंबना है कि जब किसी बिगड़ैल को यदि समर्थन करने वाले साथी और मिल जाएं तो फिर उसका जिद पर अड़ा रहना तय है। ईरान और तुर्की ने इस बिगड़ी स्थिति का लाभ उठाने में देर नहीं की और तुरंत ही कतर को समर्थन दे डाला। सच तो यह है कि कतर इस समय आग से खेल रहा है और उसे शायद जब तक कोई बड़ी क्षति नहीं पहुंचेगी तब तक वह जिद पर अड़ा ही रहेगा। 
 
उधर यूरोप में निरंतर हो रहे आतंकी हमलों के बाद यूरोप भी को लेकर बहुत संवेदनशील हो गया है। अब क्योंकि कतर का निवेश कई देशों के स्टॉक मार्केट, रियल एस्टेट और उद्योगों आदि में होने के कारण वहां की सरकारों के समक्ष समस्या हो गई है कि वे उस देश का निवेश अपने देश में कैसे स्वीकार कर सकते हैं, जो आतंकी संगठनों के वित्त पोषण में शामिल है। यदि यूरोप की जनता का दबाव आया तो यूरोप की सरकारों को कतर के निवेश खातों को सील करना पड़ेगा। जाहिर है, कतर इस समय अपनी हैसियत से अधिक जोखिम ले रहा है। यहां तक कि उसकी फुटबॉल की मेजबानी पर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
 
अत: कतर सहित पूरे खाड़ी के क्षेत्र के लिए बेहतर है कि कतर सही मार्ग पर आ जाए अन्यथा इसका प्रभाव खाड़ी ही नहीं, पूरे विश्व में पड़ेगा। 'एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर सकती है' वाली कहावत यहां चरितार्थ हो रही है। अब यहां देखने और समझने वाली बात यह है कि एक इतना छोटा देश जिसे मानचित्र में ढूंढने में भी समय लगता है, वह भी यदि सीधे मार्ग से हट जाए तो वैश्वीकरण की वजह से आपस में गुंथी आधुनिक दुनिया को कितना मुश्किल में डाल सकता है।
 
भारत के लिए चिंता की बात इसलिए है कि कतर में भारत के 5 लाख से अधिक लोग विभिन्न क्षेत्रो में कार्यरत हैं। यद्यपि उन्हें किसी समस्या का सामना न करना पड़े इसके लिए भारत का विदेश मंत्रालय कतर के घटनाक्रम पर पैनी नजरें रखे हुए है। 
 
हम तो यही चाहेंगे कि कतर को अतिशीघ्र सदबुद्धि मिले और वह पुन: सही मार्ग पर लौटे। इसी में सभी का हित है। 

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