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पेरिस जलवायु समझौता और ट्रंप की हठधर्मिता

Author राजकुमार कुम्भज|

 

 
अमेरिका के राष्ट्रपति ने रोकने की बराक ओबामा द्वारा जारी की गई नीतियों को रद्द कर देने के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देने के बाद कहा है कि वे अमेरिकियों को अब और अधिक मूर्ख नहीं बनने देंगे। जलवायु परिवर्तन संबंधित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह आदेश पेरिस जलवायु समझौते को निष्प्रभावी कर सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने राजकोषीय बजट वर्ष 2018 में की वह व्यवस्था भी रद्द कर दी है जिसके माध्यम से में एक मोटी धनराशि दी जाती थी। 
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते पर जल्द ही एकतरफा बड़ा फैसला लेने का अपना चुनावी वादा भी दोहराया है। ट्रंप का यह फैसला एक गैरजिम्मेदाराना कदम ही कहा जाएगा। पेरिस जलवायु समझौते के संदर्भ में ट्रंप की हठधर्मिता अदूरदर्शी, अमानवीय और असंवेदनशील है। वर्ष 2015 में जिस पेरिस जलवायु समझौते पर दुनिया के तकरीबन 200 देशों ने अपनी सहमति जताते हुए हस्ताक्षर किए थे, डोनाल्ड ट्रंप उस समझौते से जल्द ही बाहर निकल आना चाहते हैं। 
 
उनका कहना है कि पेरिस जलवायु समझौता 'बढ़िया सौदा' नहीं है, इसके मानक 'बाध्यकारी' नहीं हैं और इसके नाम पर कुछ भी निवेश करना 'मूर्खता की खदान' में पैसा झोंकना है। उनके ये मारक तंज न सिर्फ हैरानीभरे हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक मानवीय समस्या के संदर्भ में बेहद घातक भी हैं। डोनाल्ड ट्रंप अपने जिदभरे वैयक्तिक स्वभाव की वजह से समूचे विश्व के समक्ष एक नया संकट खड़ा करने जा रहे हैं। इस समस्या को सुलझाने के लिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कठिन, अथक और बेहद सकारात्मक प्रयास किए थे।
 
पेरिस जलवायु समझौते में तय हुआ था कि दुनिया को से बचाने के लिए कॉर्बन डाई ऑक्साइड और जीवाश्म ईंधनों के जलाने से उत्सर्जित होने वाली अन्य गैसों की मात्रा में कमी लाई जाएगी। इस संदर्भ में भारत के प्रयास न सिर्फ सकारात्मक व प्रशंसनीय रहे हैं, बल्कि विश्व के लिए पर्याप्त अनुकरणीय भी साबित हुए हैं। उधर अमेरिका ने भी पूर्व में वर्ष 2005 को आधार मानकर वर्ष 2025 तक अपने यहां कॉर्बन उत्सर्जन में 26 से 28 फीसदी के बीच तक कमी लाने की अपनी प्रतिबद्धता जताई थी किंतु अब अमेरिका में सत्ता परिवर्तन हो जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की जलवायु परिवर्तन नीति को आमूलचूल बदल देने पर आमादा हैं, जैसा कि उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान अपने देशवासियों से अमेरिका को पेरिस समझौते से बाहर निकाल लेने का वादा किया था। ट्रंप अब अपने उसी वादे को अमल में ले आने की नादानीभरी जिद कर रहे हैं।
 
डोनाल्ड ट्रंप आरोप लगा रहे हैं कि अमेरिका के पेरिस जलवायु समझौते के लिए एकतरफा अरबों डॉलर दिए हैं जबकि चीन, रूस और भारत प्रदूषण विस्तार में तो पर्याप्त योगदान करते हैं, लेकिन धन उपलब्ध करवाने में जरा भी दिलचस्पी नहीं लेते हैं। पेरिस जलवायु समझौते को 'एकतरफा' बताते हुए ट्रंप दावा करते हैं कि इस समझौते के अनुपालन से अमेरिकी जीडीपी अगले 10 बरस में 2500 अरब डॉलर घटकर कमजोर हो जाएगी, जो कि अमेरिका के लिए हितकारी नहीं है इसलिए पेरिस जलवायु समझौता अमेरिका के लिए लाभकारी और बाध्यकारी भी नहीं है। ट्रंप और ट्रंप प्रशासन का यह आकलन संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क संधि के तहत संपन्न पेरिस जलवायु समझौते के लिए नई परेशानियां पैदा कर सकता हैं। 
 
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट ने डोनाल्ड ट्रंप की आकलन नीतियों से अपनी असहमति जताते हुए स्पष्ट किया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के इस कदम ने एक बेहद ही गलत उदाहरण पेश किया है। ट्रंप की इन सनकभरी नीतियों से अमेरिका में पेट्रोल-डीजल उपभोग सीमित करने और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए शुरू की गई ज्यादातर कोशिशें अब खत्म हो जाएंगी जबकि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा कार्यकाल की आधा दर्जन से अधिक पर्यावरण संदर्भित नीतियां रद्द करते हुए ट्रंप दोहरा रहे हैं कि वे एक 'ऐतिहासिक कदम' उठा रहे हैं।
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी ऊर्जा परियोजनाओं से प्रतिबंध हटाने, सरकारी हस्तक्षेप समाप्त करने और नौकरियां खत्म करने वाली नीतियों को रद्द करने का कारनामा कर ही दिया है। उनके इस फैसले से पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल बढ़ेगा, जो वायु प्रदूषण बढ़ाने में सहायक होगा। यही नहीं, ट्रंप सरकार ने कोयले को लेकर जारी लड़ाई का भी अंत कर दिया है। कुछ इस कारण भी जलवायु संकट में वृद्धि दिखाई देगी। दुनियाभर के पर्यावरणीय समूहों ने ट्रंप के इस तथाकथित 'ऐतिहासिक कदम' की घोर निंदा की है, क्योंकि तब स्वच्छ जल और स्वच्छ वायु की उपलब्धता को कैसे सुनिश्चित किया जा सकेगा?
 
स्मरण रखा जा सकता है कि ट्रंप प्रशासन पेरिस जलवायु समझौते की गंभीर समीक्षा कर रहा है और उम्मीद है कि बहुत जल्द ही उक्त समीक्षा का निर्णय समूचे विश्व के सामने आ जाएगा किंतु आशंका यही है कि ट्रंप की हठधर्मिता के कारण अमेरिका, पेरिस जलवायु समझौते से अपने हाथ खींच सकता है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप दोहराते रहे हैं कि वे इस अंतरराष्ट्रीय समझौते में तभी बने रह सकेंगे जबकि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिले और रोजगार के अवसर पैदा हों। 
 
जाहिर है कि ट्रंप ग्लोबल वॉर्मिंग के विरुद्ध जारी की गई एक वैश्विक लड़ाई का अंत कर देने पर आमादा हैं। दुनियाभर के पर्यावरण प्रेमियों, पर्यावरण हितैषियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं सहित कांग्रेस के भारतीय अमेरिकी सदस्य अमी बेरा और डेमोक्रेटिक नेता नैंसी पेलोसी समेत डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप के इस कदम की निंदा करते हुए इसे ट्रंप की हठधर्मिता कहा है जबकि ग्लोबल वॉर्मिंग के संभावित खतरों से मनुष्य जाति के संरक्षण की चिंता वाजिब विस्तार और समर्थन पाती जा रही है।
 
यह देखना बेहद दिलचस्प हो सकता है कि आर्कटिक महासागर की सतह पर तैरते प्लास्टिक के तकरीबन 300 अरब टुकड़े किस तरह से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ाने में सहायक बनते जा रहे हैं? यहीं नहीं, यह भी कोई कम आकस्मिक नहीं है कि अब से लगभग 50 बरस पूर्व अमेरिका में मनाए गए पहले 'पृथ्वी दिवस' को आधुनिक पर्यावरण आंदोलन का प्रारंभ कहा गया था और अभी-अभी ही हमने फिर 'पृथ्वी दिवस' मनाया है। इसी पृथ्वी दिवस के संदर्भ में समूचा विश्व पेरिस जलवायु समझौते का भी सम्मान करता है इसलिए जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एक वैश्विक सहमति बनना चाहिए और उस पर अमल भी किया जाना चाहिए।
 
विश्व के तमाम देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपनी-अपनी तरह से काम भी कर ही रहे हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप? डोनाल्ड ट्रंप जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल प्रतिबंधित करने की बराक ओबामा की नीतियों के उलट जाते हुए कह रहे हैं कि पर्यावरण की रक्षा और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के विकास का आपस में कोई भी पारस्परिक संबंध नहीं है। उनकी इस उलटबाजी से अमेरिका के प्रति वैश्विक चिंता में सहज ही इजाफा देखा जा सकता है। अब यह आशंका भी अन्यथा नहीं रह गई है कि पेरिस जलवायु समझौते के प्रति अमेरिकी संभावना क्या रहेगी? 
 
जमीन की उत्पादकता में निरंतर कमी आ रही है। जल, जमीन, जंगल पर बड़े पैमाने पर खतरा मंडरा रहा है। जल गायब हो रहा है, जमीन सूखे की चपेट में आ रही है और जंगल नष्ट हो रहे हैं। ओजोन परत में क्षरण हो रहा है। तूफान, चक्रवात, बाढ़ और सूखा आदि जोर पकड़ते जा रहे हैं। औद्योगिकीकरण की अति के कारण पृथ्वी की पारिस्थितिकी असंतुलित हो रही है। जंगल और जल-जीवों की हजारों प्रजातियां या तो विलुप्त हो गई हैं या फिर विलुप्त होने की कगार पर हैं। सिर्फ यही नहीं, जलवायु परिवर्तन से मानवीय आनुवांशिकी भी प्रभावित हुए बिना सुरक्षित नहीं रह गई है और इसका असर बतौर कई-कई घातक बीमारियां हमारे सामने हैं। इस अर्थ और संदर्भ में देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन की समस्या मानव सभ्यता के अस्तित्व की समस्या भी बनती जा रही है इसलिए यह वैश्विक लड़ाई जारी रहना चाहिए। ट्रंप की हठधर्मिता नितांत अप्रासंगिक है।
 
वर्ष 2016 के नवंबर में लागू पेरिस जलवायु समझौते के मुताबिक एक हरित जलवायु कोष बनाया जाना तय हुआ था जिसकी मार्फत प्रतिवर्ष दुनिया के गरीब और विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर की सहायता राशि दी जाना थी किंतु आश्चर्य का विषय है कि उक्त कोष में अभी तक सिर्फ नाममात्र का ही धन सुलभ हो सका है। जिन विकसित देशों को पृथ्वी के अधिकतम दोहन की अधिकतम कीमत अदा करना चाहिए, वे कॉर्बन क्रेडिट का एक नया उपनिवेशवाद फैला रहे हैं। वे गरीब, अविकसित और अल्पविकसित देशों से कॉर्बन क्रेडिट खरीदकर अपना अंधाधुंध कथित विकास कर रहे हैं।
 
पेरिस जलवायु समझौते के बाद पिछले बरस मोरक्को में तय तो यही हुआ था कि पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने की नियमावली वर्ष 2018 तक आकार ले लेगी लेकिन अमेरिकी ट्रंप प्रशासन अपनी हठधर्मिता के चलते 'अपनी ढपली अपना राग अलाप' रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच वैश्विक पर्यावरण के संदर्भ में संकुचित होती जा रही है। अगर वे पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को बाहर खींच लाने में सफल हो जाते हैं तो यह इस सदी की सबसे खतरनाक खबर होगी जबकि पोप फ्रांसिस और अन्य धर्मगुरु जलवायु परिवर्तन की लड़ाई को पहली प्राथमिकता मान रहे हैं।
 
ईश्वर डोनाल्ड ट्रंप को सद्बुद्धि दे। इधर यह कहना जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वाकई सद्बुद्धि पाने के असल हकदार हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन की नीतियों में वे जो और जैसा मनचाहा किंतु विश्व परिप्रेक्ष्य में अनचाहा परिवर्तन कर रहे हैं, वह बेहद विनाशकारी ही साबित होने वाला है।
 
अब जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को एक 'जिम्मेदार अमेरिका' बनाने से पीछे घसीट लेने का फैसला कर ही लिया है, तो शेष दुनिया को क्या करना चाहिए? अमेरिकारहित शेष दुनिया को पेरिस जलवायु समझौते के लिए कमर कसते हुए दृढ़ संकल्प के साथ एकजुटता दिखाकर आगे बढ़ जाना चाहिए।
 
याद रखा जा सकता है कि भारत सहित चीन और फ्रांस, पेरिस समझौते की रक्षा करते रहने की प्रतिज्ञा दोहराते हुए इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यूरोपीय संघ ने भी पेरिस जलवायु समझौते पर टिके रहने की दृढ़ता दिखाई है। यहां तक कि 9 अमेरिकी राज्यों के प्रशासकों ने भी पेरिस जलवायु समझौते से अलग होने पर अपनी आपत्ति दर्ज करवाई है और कहा है कि पेरिस समझौते से अलग होने से अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ेगी किंतु डोनाल्ड ट्रंप इन सभी की अनदेखी करते हुए अपनी हठधर्मिता दिखा रहे हैं। 
 
शेष दुनिया को चाहिए कि वह ट्रंप की हठधर्मिता को नजरअंदाज करते हुए पेरिस जलवायु समझौता लागू करने की ऐतिहासिक साहसिकता दिखाए।  
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