उपचुनाव के नतीजे बानगी हैं 2019 की

Author अनिल जैन| पुनः संशोधित शनिवार, 2 जून 2018 (17:34 IST)
पिछले 4 वर्षों के दौरान देश में लोकसभा चुनाव समेत जितने भी चुनाव-उपचुनाव हुए हैं, सभी के नतीजों में प्राय: सत्ताविरोधी साफ दिखा है। इसी रुझान के चलते भाजपा ने न सिर्फ केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई बल्कि वह उन सभी राज्यों में भी अपनी या अपने सहयोगी दलों की मदद से गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रही है, जहां पहले या अन्य दलों की सरकारें थीं।
इसी रुझान के चलते पिछले 4 वर्षों के दौरान लोकसभा और विधानसभा के जितने भी उपचुनाव हुए, उनमें भी इक्का-दुक्का सीटों को छोड़कर सभी के नतीजे भाजपा के खिलाफ गए हैं। यही रुझान हाल ही में 10 राज्यों में विधानसभा की 11 और लोकसभा की 4 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भी भाजपा की हार के रूप में साफतौर पर देखने को मिला है। भाजपा अपनी महज 1 लोकसभा और 1 विधानसभा सीट किसी तरह बचाने में कामयाब रही है।
पिछले 4 सालों के दौरान उपचुनावों में भाजपा की हार का यह सिलसिला नया नहीं है, खासकर लोकसभा के उपचुनावों में। केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद लोकसभा की 27 सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं जिनमें से भाजपा सिर्फ 5 सीटें ही जीत सकी है। 2 सीटों पर उसके सहयोगी दल तथा बाकी 20 सीटों पर विपक्षी दल विजयी रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा के ताजा उपचुनाव जिन राज्यों में हुए, उनमें पश्चिम बंगाल, पंजाब और केरल के अलावा बाकी सभी राज्यों में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें हैं।
उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इन उपचुनावों में सत्ताविरोधी रुझान का सामना सिर्फ भाजपा और उसके सहयोगी दलों को ही करना पड़ा है, जबकि पश्चिम बंगाल, पंजाब और केरल में सत्तारूढ़ दल अपनी सीटें बचाने में कामयाब रहे हैं। सरसरी तौर पर देखा जाए तो इन उपचुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मिली पराजय उनके विरोधी दलों की तात्कालिक एकता का परिणाम है। भाजपा के प्रवक्ता भी अपनी हार का विश्लेषण यही कहते हुए कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता से भयभीत होकर विपक्ष एकजुट हो रहा है।
पंचायत और नगर पालिका तक के चुनाव में अपनी पार्टी की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देने के लिए आतुर रहने वाले भाजपा के प्रवक्ता और कई केंद्रीय मंत्री यह भी कह रहे हैं कि इन नतीजों को मोदी सरकार के कामकाज से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उपचुनाव में आमतौर पर मतदाता स्थानीय मुद्दों के आधार पर मतदान करते हैं। भाजपा प्रवक्ता अपना और अपने पार्टी कॉडर का दिल बहलाने के लिए जो भी कहे, लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और उसके गठबंधन के लिए आगे की राह अब आसान नहीं है। यह सच है कि उपचुनावों में विपक्ष को जो जीत हासिल हुई, उसके पीछे एक बड़ी वजह भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रुकना भी रहा है।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली कामयाबी के पीछे भी अन्यान्य वजहों के अलावा एक बड़ी वजह यही थी कि गैरभाजपा दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे। ऐसी स्थिति में भाजपा विरोधी वोट बंट गया था और भाजपा महज 31 फीसदी वोटों के सहारे 282 सीटें पाने में कामयाब हो गई थी। ताजा उपचुनावों के नतीजे बेशक विपक्षी दलों की एकजुटता का दंभ दिखाते हैं, लेकिन साथ ही ये मोदी सरकार के कामकाज को लेकर लोगों में पैदा हो रहे असंतोष की ओर भी इशारा करते हैं।
मोदी सरकार अपने 5 साला कार्यकाल के 4 साल पूरे कर 5वें अंतिम साल में दाखिल हो चुकी है लेकिन इन 4 सालों के दौरान उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किए गए तमाम वादों में से एक भी पूरा नहीं किया है। भाजपा के घोषणापत्र का सूत्र वाक्य था- भाजपा की नीतियों और उसके क्रियान्वयन का पहला लक्ष्य होगा- 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' और रास्ता होगा- 'सबका साथ-सबका विकास।' इसी सूत्र वाक्य पर आधारित तमाम वादों के जरिए देश की जनता में 'अच्छे दिन' आने की उम्मीद जगाई गई थी।
भाजपा के घोषणा पत्र में जो वादे किए गए थे उनमें हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोजगार, किसानों को उनकी उपज का समर्थन मूल्य लागत से दोगुना, कर नीति में जनता को राहत देने वाले सुधार, विदेशों में जमा कालेधन की 100 दिनों के भीतर वापसी, भ्रष्टाचार के आरोपी सांसदों-विधायकों के मुकदमों का विशेष अदालतों के जरिए 1 साल में निबटारा, महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण, गंगा तथा अन्य नदियों की सफाई, देश के प्रमुख शहरों के बीच बुलेट ट्रेन का परिचालन, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 का खात्मा, कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी, आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति, सुरक्षाबलों को आतंकवादी और माओवादी हिंसा से निबटने के लिए पूरी तरह छूट, सेना की कार्यस्थितियों में सुधार, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, समान नागरिक संहिता, गुलाबी क्रांति यानी गोकशी और गोमांस के निर्यात पर प्रतिबंध, देश में 100 शहरों को स्मार्टसिटी के रूप में तैयार करना आदि प्रमुख वादे थे, जो पिछले 4 साल के दौरान सिर्फ छलावा ही साबित हुए हैं।
इनमें से कई वादे तो ऐसे हैं जिनका जिक्र तक सरकार की ओर से पिछले 4 सालों के दौरान नहीं किया गया है। इसके अलावा खुद नरेन्द्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर अपनी चुनावी रैलियों में हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपए जैसे तरह-तरह के लोक-लुभावन वादे देश से किए थे। लेकिन चूंकि चुनावी रैलियों में किए गए वादों को भाजपा अध्यक्ष ही 'चुनावी जुमलेबाजी' करार दे चुके हैं, लिहाजा उनकी चर्चा करना बेमतलब है।
हकीकत यह है कि इन 4 वर्षों के दौरान मोदी सरकार ने जो भी काम किए, वे या तो अपने घोषणा पत्र से परे हैं या फिर ठीक उसके उलट। उसने कई ऐसे कामों को भी जोर-शोर से आगे बढाया है, जो यूपीए सरकार ने शुरू किए थे और विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने उनका तीव्र विरोध किया था। मनरेगा के बजट में बढ़ोतरी, आधार कार्ड की हर जगह अनिवार्यता, जीएसटी के रूप में नई कर व्यवस्था पर अमल, विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी आदि ऐसे ही कामों में शुमार हैं।
कुल मिलाकर मोदी सरकार का 4 साल का कार्यकाल अपने घोषणा पत्र से विमुख होकर काम करने का यानी वादाखिलाफी का रहा है जिसके चलते हर मोर्चे पर उसके खाते में नाकामी दर्ज हुई है तो आम आदमी के हिस्से में दुख, निराशा और दुश्वारियां आई हैं जिसका सांकेतिक प्रतिफलन उपचुनाव के नतीजों में साफ दिखाई देता है।

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