कर्नाटक का बहाना, 2019 पर निशाना

Author विभूति शर्मा| Last Updated: रविवार, 27 मई 2018 (00:16 IST)
इस वर्ष के मई माह में अगले वर्ष के मई माह की तैयारियों की स्पष्ट झलक देखी गई। चुनाव भले ही दक्षिण के राज्य का हो, लेकिन विपक्षी पार्टियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का खौफ इस कदर व्याप्त हो गया है कि वे येन-केन-प्रकारेण आपस में एका को मजबूर हो रही हैं। कर्नाटक चुनाव के दौरान एक-दूसरे पर आरोप लगाने वाली और जद (एस) ने जब देखा कि मोदी की भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, तो आनन-फानन में गठबंधन कर डाला! इसके लिए कांग्रेस ने अपनी दशकों पुरानी रणनीति अपनाई और सबसे छोटे दल को नेतृत्व सौंपकर उसका पिछलग्गू बनना स्वीकार कर लिया। वह भली-भांति जानती है कि ऐसी सरकार को वह कभी भी गिरा सकती है। चरणसिंह, चन्द्रशेखर, देवेगौड़ा और गुजराल की केंद्रीय सरकारों पर कांग्रेस यह फॉर्मूला आजमा चुकी है।

दरअसल, पिछले 4 साल के मोदी काल में कांग्रेस समेत सभी क्षेत्रीय या विपक्षी दलों को आभास हो गया है कि एक हुए बिना मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो गया है। मोदी को हराने का यह फॉर्मूला उप्र के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में आजमाया जा चुका है, जहां धुर विरोधी सपा और बसपा एक हो गए थे। अब इसी फॉर्मूले को केंद्रीय स्तर पर आजमाने के लिए कर्नाटक में कुमारस्वामी की मुख्यमंत्री पद की शपथ के दौरान कांग्रेस समेत 11 दलों के शीर्ष नेता एक मंच पर आ जुटे। हालांकि अंदरुनी तौर पर ये सभी जानते हैं कि इन सभी का एक बने रहना टेढ़ी खीर ही साबित होगा। कुछ तो यह कहते भी सुने गए कि कर्नाटक में कुमारस्वामी की सरकार 3 महीने भी नहीं चल पाएगी। कर्नाटक के कांग्रेस नेता और डिप्टी सीएम जी. परमेश्वर ने कुमारस्वामी के विश्वास मत हासिल करने वाले दिन ही साफ कर दिया कि यह जरूरी नहीं है कि उनकी पार्टी 5 सालों तक कुमारस्वामी की जेडीएस का समर्थन करे।
यह स्थापित तथ्य है कि किसी भी छोटे दल की सरकार को कांग्रेस ने 1 साल भी नहीं टिकने दिया। इसीलिए सोनिया गांधी ने कर्नाटक में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरते देख जद-एस को तत्काल समर्थन देने के निर्देश अपने प्रतिनिधियों को दे दिए। हालांकि राज्यपाल ने बड़ी पार्टी के नाते भाजपा के येदियुरप्पा को मौका दिया, लेकिन वे बहुमत हासिल नहीं कर सके और दूसरे दिन ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया। इसके बाद मौका मिलने पर मुख्यमंत्री बने एचडी कुमारस्वामी ने सदन में बहुमत साबित कर दिया। विश्वासमत से पहले भाजपा ने स्पीकर पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया था। भाजपा ने पूर्व कानून मंत्री सुरेश कुमार को इस पद के लिए खड़ा किया था, वहीं जेडीएस-कांग्रेस की तरफ से पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रमेश कुमार को उम्मीदवार बनाया गया था। विधानसभा की शुरुआती कार्रवाई में ही भाजपा ने स्पीकर पद पर दावेदारी छोड़ दी जिससे कांग्रेस का रास्ता साफ हो गया। अब देखना दिलचस्प होगा कि ये सरकार कितने समय तक चल पाती है।
मोदी का जलवा बरकरार

साल 2014 में सत्ता पर काबिज होने के बाद से उत्तर से लेकर दक्षिण, पूर्व से लेकर पश्चिम तक मोदी का जलवा बना हुआ है। पिछले में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर जिस तरह मोदी देश के प्रधानमंत्री बने और उसके बाद एक-एक कर लगभग हर राज्य से कांग्रेस को बेदखल कर प्रधानमंत्री ने साबित कर दिया कि अब भाजपा का राजनीतिक सफर दूर तक जाएगा। मोदी के मैजिक का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि चुनाव जीतने के बाद तक किसी को यकीन नहीं हुआ कि पूर्वोत्तर पर भी अब भाजपा का रंग चढ़ चुका है।
4 साल, 26 राज्य और सिर्फ 2 में जीत पाई कांग्रेस

देश में कांग्रेस की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है। 4 दिन की चांदनी, 4 दिन की जिंदगी और 4 राज्यों में कांग्रेस। ऐसी ही स्थिति हो गई है देशभर में कांग्रेस की। पिछले 4 सालों की बात करें तो कुल 26 राज्यों में चुनाव हुए जिनमें से कांग्रेस के हाथ सिर्फ 2 राज्य ही आए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लंबे समय से कांग्रेसमुक्त भारत की बात करते आए हैं। जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा है, देशभर से कांग्रेस का सफाया होता जा रहा है। उत्तर-पूर्व के 3 राज्यों में चुनाव से पहले देश के 5 राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन अब वो भी नहीं है। पिछले 4 सालों में कांग्रेस के पास उत्तर भारत में पंजाब, दक्षिण भारत में कर्नाटक और पुडुचेरी व उत्तर-पूर्व में मिजोरम के रूप में कुल 4 ही राज्य हैं।
23 राज्यों में NDA की सरकार

भाजपा की बात करें तो केंद्र में तो उसकी सरकार है ही, देश के 14 राज्यों में भाजपा की सरकार थी और त्रिपुरा जीतने के बाद यह आंकड़ा 15 तक पहुंच गया है। इसके अलावा 4 राज्यों में भाजपा के समर्थन से सरकार चल रही है। अब नगालैंड के भी इसमें जुड़ने से यह आंकड़ा भी 5 तक पहुंच गया है। पूर्वोत्तर में अब अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की सरकारें हैं। त्रिपुरा भी अब इनमें शामिल हो गया है, वहीं आंध्रप्रदेश, बिहार, जम्मू और कश्मीर व सिक्किम इन 4 राज्यों में भाजपा के समर्थन से राज्य सरकारें चल रही हैं। नगालैंड के इसमें जुड़ जाने से यह संख्या भी 5 तक पहुंच गई है।
तो क्या कांग्रेस का अस्तित्व खतरे में?

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के केंद्रीय सत्ता से दूर होने के बाद एक-एक कर कई राज्य उसके हाथ से फिसल गए। इसकी बानगी देखनी हो तो एक बार पिछले 4 साल में हुए राज्यों के चुनावों पर एक नजर दौड़ाएं। इन 4 सालों में कांग्रेस 2016 में पुडुचेरी और 2017 में पंजाब सिर्फ इन 2 राज्यों में चुनाव जीत पाई है जबकि बिहार में साल 2015 में चुनाव के समय जीत दर्ज करने वाले महागठबंधन का भी वह हिस्सा थी, लेकिन बाद में यह गठबंधन भी टूट गया।
कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी भले ही राज्य में सरकार न बना पाई हो लेकिन दक्षिण में घुसपैठ के लिए जमीन तो उसने बना ही ली है। दूसरी ओर अब कर्नाटक फॉर्मूले के सहारे विपक्षी दल बीजेपी को घेरने में जुट गए हैं। गोवा, बिहार के बाद अब मणिपुर और मेघालय में भी बीजेपी को उसके ही तरीके से मात देने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। इन सभी राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन सत्ता बीजेपी के हाथ में है।
कुल मिलाकर कर्नाटक एपिसोड के बावजूद स्थितियां अभी भी भाजपा के पक्ष में हैं। हाल के कुछ सर्वे बताते हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदीजी ही जनता की पहली पसंद हैं। एक बात जरूर है कि इस साल के अंत में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव भाजपा की 2019 में जीत की राह को मुश्किल बना सकते हैं। इन राज्यों में फिलहाल भाजपा की सरकारें हैं, लेकिन एंटी इंकम्बेंसी के चलते संकेत उज्ज्वल नहीं हैं। राजस्थान तो पूरी तरह हाथ से जाता दिखाई दे रहा है। भाजपा को सचेत होकर यह राह आसान बनानी होगी।

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