कमलेश्वर : बड़ा लेखक, बड़ा इंसान

उमेश चतुर्वेदी|
उदारीकरण की बयार का सबसे बड़ा हमला संस्कृति पर हुआ है..भारतीय समाज में तमाम ऊंच-नीच के बावजूद आत्मीयता की एक अजस्र धारा सदियों से बहती रही है...यह अजस्रता भारतीय संस्कृति की मूल रही है..उदारीकरण की बयार ने सबसे ज्यादा भारतीय आत्माओं की बीच शनै:-शनै: लेकिन अहर्निश बहती रही इस धारा को एक हद तक कमजोर जरूर किया है..खासकर महानगरों में इसका ज्यादा असर देखा जा रहा है..यह बात और है कि पांच हजार साल पुरानी संस्कृति की अहम कड़ी रहे गांवों में अब भी बची हुई है..इसलिए आज भी कोई गांव वाला महानगर या शहर की सीमाएं लांघ कर उसकी परिधि में अतिक्रमण करता है तो उसकी सहजता उसे कहीं ना कहीं रोक सभ्यता के नए उपादानों के सामने हथियार डालने के लिए मजबूर कर देती है।
 
गंवई गंध जो गंवई समाज में गुलाब की तरह आत्मा को गमकाती रहती है, सभ्यता के अहम केंद्र शहरों में आकर अपनी आंतरिक परिधि में ही सिमटे रहने में अपने अस्तित्व को देखने लगता है..यह बात और है कि महानगरीय सभ्यता की परिधि गंवई गंध वाले गुलाब को एक सीमा के बाद अतिक्रमित करने लगती है और महानगरीय पहचान में अपना विकास और अपना अस्तित्व ढूंढने लगती है...लेकिन संक्रमण की यह प्रक्रिया बेहद त्रासद होती है और कई बार वह गंवई आत्मा और पैरों में चक्की की मानिंद लिपट जाती है..और आगे बढ़ पाना मुश्किल लगता है..अगर गंवई आत्मा का टकराव अचानक से किसी बड़ी हस्ती से होता है तो उसके सामने कातर बने रहने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होता।
 
1993 में अपनी भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी..लेकिन जिस बड़ी हस्ती से असल सामना हुआ तो लगा कि जैसे आत्मा पर छायी गंवई गंध की चक्की कहीं पीछे रह गई और सामने वाले की गंभीर आवाजों में कहीं सम्मोहित सी खोई रह गई।
 
भारतीय जनसंचार संस्थान में 1993 में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान हमारे श्रद्धेय गुरुदेव डॉक्टर रामजी लाल जांगिड़ की प्रेरणा से कक्षा के बीच एक स्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हो गई थी..हिंदी के नामचीन अखबारों में छपने और छपाने की, पत्रकार के तौर पर खुद को अभिव्यक्त करने की और उस अभिव्यक्ति के जरिए खुद को दुनिया के सामने पत्रकार के तौर पर दिखाने की..
 
उन्हीं दिनों विचार आया कि क्यों न और पत्रकारिता के रिश्ते पर जाने-माने उन साहित्यकारों और फिल्मकारों से बातचीत की जाए, जिनकी रचनाओं पर फिल्में बन चुकी हैं या फिर जिन्होंने साहित्यिक रचनाओं पर फिल्मों का निर्माण या निर्देशन किया हो। दोनों ही विधाओं की निष्णात हस्तियों के बीच ऐसी हस्ती थे, जिन्होंने पत्रकारिता के साथ ही फिल्म, टेलीविजन और साहित्यिक रचनाओं की दुनिया में समान अधिकार के साथ सफल विचरण किया था। 
 
जाहिर है कि दिल्ली में रहते वक्त उनसे बात करना लाजमी ही था। सवाल यह था कि तब आज की तरह मोबाइल फोन की कौन कहे, पारंपरिक फोन भी ज्यादा नहीं थे। फिर नंबर तलाशना भी गांव से सीधे महानगर आए मुझ जैसे विद्यार्थी के लिए बड़ा मुश्किल काम था। गंवई घरघुस्सूपन भारत के महत्वपूर्ण संस्थान में आने के बाद भी अपने अंदर से निकल नहीं पाया था। 1993 में जबर्दस्त शीतलहर पड़ रही थी। शायद दिसंबर का महीना था..कमलेश्वर का फोन कहीं से तलाशा गया। फोन मिल गया तो दो दिन लग गए उन्हें फोन करने के लिए हिम्मत ही जुटाने में।   
आखिर हिम्मत क्यों नहीं हो रही थी, इसकी भी अपनी एक कहानी है। दरअसल नई कहानी के इस हीरो के बारे में एमए की पढ़ाई के दौरान काफी पढ़ चुका था। सारिका में प्रकाशित उनकी कहानी जहरबाद का असर तब तक खुद पर तारी था। इससे भी कहीं ज्यादा पाठ्यक्रम में उनका कहानी संग्रह राजा निरबंसिया पढ़ चुका था। जिसका ड्राइवर बाबू अब भी कहीं ना कहीं आत्मा के कोने में बैठा हुआ है और अचानक अनुकूल मौका पाकर चिकोटी काटकर चिंहुकने के लिए मजबूर कर देता है..लेकिन उन्हें लेकर एक स्टार जैसी छवि बनी थी, संडेमेल हिंदी में धारावाहिक तौर पर प्रकाशित उनकी आत्मकथा आधार शिलाएं को पढ़कर। आधारशिलाएं के जरिए उन्होंने अपने फिल्मी दुनिया के संघर्ष से लेकर पत्रकारिता की नौकरी से विदाई के दर्द को बखूबी उकेरा था।
 
बहरहाल इस माहौल में दिसंबर 1993 की ठिठुरती सुबह कमलेश्वर को एक टेलीफोन बूथ से फोन लगाया। फोन डायल करते वक्त दिल में धुकधुकी बनी हुई थी..यह स्टार लेखक ना जाने कैसा सलूक करे..क्या पता बात करने से ही मना कर दे या फिर यह भी हो सकता है कि इंटरव्यू देने से ही साफ इनकार कर दे..जितनी देर तक फोन की घंटी बजती रही और अपनी धड़कन बढ़ती रही..अचानक फोन की घंटी उठी और उधर से धीर-गंभीर आवाज आई हलो...तब अपने राम को फोन करने का शऊर भी नहीं था..शायद अब भी नहीं है..इसलिए खासकर अनजान लोगों से अगर वे कहीं बड़े पद पर हों तो फोन करने में हिचक होती है..क्या पता मना कर दें..उसके बाद बुरा लगने की कल्पना से मन पहले ही कसैला हो जाता है...लेकिन यह क्या ..कमलेश्वर ने ऐसा कुछ नहीं किया..अलबत्ता ऐसे कुछ अनुभव उस दौर के दो-तीन बड़े लेखकों को फोन करने के बाद हो चुके थे..एक लेखिका ने तो घर बुलाकर इंटरव्यू तक नहीं दिया था..उल्टे मेरे ज्ञान की परीक्षा ही लेनी शुरू कर दी थी..यह बात और है कि उनके पास जाने से पहले अपने राम उनकी छह सात कहानियां और दो उपन्यास शिद्दत से पढ़ चुके थे। 
होता यह है कि अक्सर हम अपने अंदर अपने साथ हुए बुरे अनुभवों को ही समाहित किए रहते हैं और इसी आशंका में आगे बढ़ते रहते हैं कि कहीं एक बार फिर वैसा ही अनुभव ना हो। लेकिन कमलेश्वर के साथ ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सबसे पहले पूछा कि आप कहां से बोल रहे हैं..जब बताया गया कि जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय के नजदीक से तो उनका स्वर कुछ ज्यादा ही मुलायम हो गया...इसलिए नहीं कि हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र थे, बल्कि इसलिए कि वे उन दिनों दिल्ली-हरियाणा सीमा पर हरियाणा के जिस सूरजकुंड इलाके में रह रहे थे, वहां से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय आना-जाना बेहद कठिन था। वह भी जाड़े के दिनों में। आना-जाना तो कठिन आज भी है..लेकिन यह बात और है कि सहूलियत तब की तुलना में कुछ ज्यादा बढ़ गई है।
 
बातचीत का मकसद जानने के बाद छूटते ही उनका जवाब था, मेरा घर तो वहां से काफी दूर है..ऐसा करते हैं कि आप अपना नंबर दीजिए। मैं खुद उस नंबर पर फोन करूंगा और आप पूछ लीजिएगा। मैं आपके सारे सवालों के जवाब फोन पर ही दे दूंगा। 
 
उन दिनों अपनी जेब भी कुछ ज्यादा ही खाली रहती थी। लेकिन एक स्टार लेखक से मिलने का लालच और उस लेखक से, जिसने इतनी सहजता से फोन उठाकर वक्त देने की सदाशयता दिखाई हो, हम कैसे जाने देते। मैं फोन पर ही उनसे जिद कर बैठा..नहीं सर आपसे तो मिलना ही है। सामने सवाल पूछकर और उसका जवाब पाकर अच्छा लगेगा। कमलेश्वर जी मान गए और सर्दी की अगली ठिठुरती सुबह मैं अपने नीरज के साथ उनके घर था।
 
इस बीच उत्साह में उनसे पूछे जाने के लिए सवालों की लड़ी दो-तीन बार तैयार की गई। कुछ काट-छांट के बाद सवालों की तोप लेकर हम उनके घर पहुंचे तो वे तैयार ही बैठे थे। सबसे पहला काम उन्होंने यह किया कि कमरे को गर्म करने के लिए हीटर जलाया। फिर चाय-काफी के लिए पूछा और चाय के साथ नाश्ता कराते हुए सवालों का जवाब दिया। तब वे किसी डाक्युमेंटरी पर काम कर रहे थे। वक्त तो आधे घंटे का तय हुआ था। लेकिन उन्होंने पूरे दो घंटे तक बात की और बाकायदा खाना खाने की जिद भी की। हालांकि हमने उनसे विदा ले ली। 
 
कमलेश्वर से यह पहली मुलाकात आज भी स्मृतियों के कोने में कहीं ना कहीं आज भी टंकी हुई है। कहते हैं न कि पहला अनुभव ही सबसे असरकारी होता है। लेकिन उनके साथ हर अनुभव पिछले की तुलना में कहीं ज्यादा असरदार रहा। यह बात और है कि उनसे बाद में कई और इंटरव्यू करने का मौका मिला। लेकिन अगली बार सिर्फ उनसे पूछता कि भाई साहब कल आ जाऊं और वे फोन के दूसरे छोर पर मुस्कराते हुए हां-हूं भी नहीं कर पाते थे। दिल्ली में आमतौर पर लोग अपने घर आने वाले लोगों के साथ तभी गर्मजोशी से मिलते हैं, जब आगंतुक कहीं ज्यादा घनिष्ठ हो, लेकिन कमलेश्वर इसके अपवाद थे। शायद इलाहाबाद में गुजारे संघर्ष के दिनों का असर था या कुछ और..घर आने वाला छोटा हो या बड़ा, उसके साथ वे बराबरी का व्यवहार करते। सबको एक जैसी सीट मिलती और सबको चाय-नाश्ता जरूर मिलता।
 
इस दौरान उनकी पत्नी गायत्री कमलेश्वर भी तत्पर रहतीं। कमलेश्वर खिलाने के शौकीन थे। लेकिन मधुमेह और हृदय रोग के चलते उन्हें खाने-पीने में परहेज करना पड़ता था। इसका उन्हें मलाल भी रहता था। एक बार दीवाली के वक्त उनके पास मशहूर फिल्मकार सईं परांजपे के पति मिठाई का डिब्बा लेकर पहुंचे। उन्होंने हम सबसे उनका परिचय कराया और मुस्कराते हुए कह बैठे- जब खाने का मन करता था, तब मिठाई और पैसे नहीं थे और अब मिठाई और खाना तो है..लेकिन स्वास्थ्य इसकी इजाजत नहीं देता। मुस्कराहट के साथ कही गई इस बात के पीछे उनका अतीत का दर्द कहीं गहरे तक छुपा हुआ था और उस वक्त इस दर्द को उनके ड्राइंग रूम में बैठे हर शख्स ने महसूस किया था।
 
1997 में जब दैनिक भास्कर की नौकरी लगी, तब कमलेश्वर उसके प्रधान संपादक के तौर पर दिल्ली में तैनात थे। हालांकि नाम सिर्फ राजस्थान संस्करणों में ही प्रधान संपादक के तौर पर जाता था। तब वे दफ्तर कम ही आते थे। लेकिन हर शनिवार की शाम उनके घर हमारी संपादकीय बैठक होती थी। उन बैठकों में जाने से हमारे कुछ साथी कतराते भी थे। उनका तर्क होता था कि कमलेश्वर को खुद दफ्तर आना चाहिए। कुछ लोग उन तक ये बातें पहुंचाते भी थे। लेकिन विरोधियों से कभी उन्हें शिकायत करते नहीं देखा गया। अलबत्ता वे उसे गहरी निगाह से जरूर देखते थे। एक बार उन्होंने सिर्फ मुझे घर बुलाया। उनके घर के लिए बस से उतरकर लंबा पैदल या रिक्शा से जाना पड़ता था।
 
उस दिन संयोग ऐसा हुआ कि तेज धूप में रिक्शा वाले ही नहीं मिले। किसी तरह उनके घर पैदल ही पहुंचा तो वे घर पर नहीं मिले। तब उनके घर बिहार का एक लड़का काम करता था। घर में वह अकेला था। वह कमलेश्वर या गायत्री जी के ना रहने पर दरवाजा नहीं खोलता था। चाहे कितना ही पहचाना हुआ चेहरा क्यों ना हो। शायद कमलेश्वर जी ने ही सुरक्षा के लिहाज से उसे ताकीद की थी। घर पर शनिवार को होने वाली बैठकों में आते-जाते और चाय-पानी कराने के बावजूद उसने दरवाजा नहीं खोला और जालीदार दरवाजे के अंदर से ही टरका दिया।
 
थोड़ी खीझ और हताशा के साथ मैं लौट पड़ा। तेज धूप में बस स्टैंड से कुछ कदम दूर ही था कि अचानक पीछे से आवाज आई...नाम लेकर कमलेश्वर ने पुकारा था। वे अपनी बैंगनी रंग की मारुति जेन कार चलाते हुए नजदीक से ही आ रहे थे..मुझे देखकर उन्हें याद आ गया कि मुझे वक्त दिया गया था। उन्होंने गाड़ी में बैठाया और एसी तेज किया। फिर पूछा-अभी आ रहे हो। मैं थोड़ा कुढ़ा हुआ था। लेकिन संयत रहते हुए मैंने जवाब दिया- नहीं आपके घर से लौट रहा हूं..। मेरा जवाब सुनते ही हंसने लगे। उनकी प्रतिक्रिया थी- तब तो उसने (नौकर ने) दरवाजा भी नहीं खोला होगा। चाय-पानी तो दूर की बात है।
 
बहरहाल, वे घर ले गए और देर तक ठंडे एसी की छांव में बैठने और पानी पीने के बाद भी चेहरे की लालिमा कम नहीं हुई तो वे चिंतित हो गए। फौरन डॉक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार हो गए। उनका मानना था कि मुझे हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत है। तब उम्र कम होने के चलते मैंने इससे नकार दिया और मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं हुआ। यह बात और है कि अब जाकर हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत सामने आ गई है। 
 
कमलेश्वर किसी को दुखी नहीं देख सकते थे। भास्कर में कई मर्तबा लोगों को हटाने या ट्रांसफर करने की नौबत आती रही तो वे उससे मना करते रहे। शायद 1999 या 2000 की बात है। हिंदी के मशहूर कथाकार रमेश बतरा की मौत हो गई थी। उनकी असामयिक मौत से वे काफी विचलित थे। आखिरी दिनों में बतरा की माली हालत ठीक नहीं थी। उनकी पत्नी भी उनसे अलग रहने लगी थीं। 
कमलेश्वर जी ने आज के दौर के एक बेहद छपने वाले पत्रकार और कुछ दूसरे लोगों को उनकी पत्नी के पास भेजा और बतरा के अंतिम संस्कार में शामिल करने के लिए बेटे को भेजने के लिए मनाया। इतना ही नहीं, आखिरी रस्म का सारा खर्च उठाया। एक और किस्सा याद आ रहा है। हिंदी के एक लेखक उन दिनों बेरोजगार हो गए थे। वे कमलेश्वर जी के पास नौकरी मांगने पहुंचे। कमलेश्वर जी तब उन्हें भास्कर में नौकरी तो नहीं दे पाए। अलबत्ता अपने घर उन्हें नौकरी जरूर दे दी। नाश्ता, चाय और खाने के साथ सैलरी भी और नौकरी थी, उनके लेखों का संग्रह निकालने की। उन लेखक महोदय की यह नौकरी करीब छह महीने चली।
 
कमलेश्वर किसी का दुख नहीं देख पाते थे और उसे भरसक आर्थिक मदद भी करते थे। उनका आखिरी और चर्चित उपन्यास रहा 'कितने पाकिस्तान', जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। इसे काफी शोध के बाद उन्होंने लिखा था। इस शोध में आज के एक बेहद चर्चित पत्रकार और एक टीवी चैनल के प्रमुख ने मदद की थी। कमलेश्वर ने इसके लिए उन लोगों को आर्थिक मेहनताना दिया था। यह बात और है कि उन्होंने दोनों में से किसी को भी नाम नहीं दिया। इसका मलाल एक सज्जन को आज भी रहता है।
 
कमलेश्वर जी लेखकों को महत्व देने में पीछे नहीं रहते थे। चाहे लेखक उनके विरोधी विचारधारा का ही क्यों न हो। शायद उन्होंने भी लंबे वक्त तक लेखन के सहारे जीविका जुटाई थी। इसलिए वे लेखकों के साथ अन्याय नहीं होने देना चाहते थे। 1999 का एक किस्सा याद आता है। तब प्रसार भारती की मौजूदा चेयरमैन मृणाल पांडे, दैनिक हिंदुस्तान और एनडीटीवी छोड़ चुकी थीं, जबकि वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र जनसत्ता से रिटायर हो गए थे। उन दिनों कमलेश्वर ने दोनों से दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट के लिए कुछ कवर स्टोरियां लिखवाई थीं। उनमें से मृणाल जी की एक कवर स्टोरी किसी और अखबार में प्रकाशित हो गई थी। इसकी स्टाफ के एक सदस्य ने शिकायत की तो कमलेश्वर जी उस सदस्य से पूछा कि आप एक लेख के लिए लेखक को कितना भुगतान करते हैं। तब वह रकम कुछ सौ होती थी। उन्होंने सिगरेट का छल्ला बनाते हुए जवाब दिया- जब आप एक लेख के लिए लेखक को पांच हजार देने लगें तब जाकर ऐसी शिकायत कीजिएगा। 
 
एक बार कार्यालय के काम के लिए एक अनुभव प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ी। तब उसे एक सरकारी दफ्तर में उसी दिन शाम तक का वक्त था। कमलेश्वर जी को फोन किया गया। उन्होंने घर बुलाया। लेकिन यह क्या उनका टाइपिस्ट उस दिन आया ही नहीं था। लगा कि आज प्रमाण पत्र जमा नहीं हो पाएगा। लेकिन डनहिल सिगरेट का छल्ला बनाते हुए कमलेश्वर ने इसका भी हल निकाल लिया। उन्होंने तत्काल लेटर हेड निकाला और अपने मोतियों जैसे अक्षर उस पर टांक दिए और नीचे अपना हस्ताक्षर कर दिया। उसकी फोटो कॉपी जब संबंधित दफ्तर में जमा की गई तो जांच अफसर उन अक्षरों को देर तक देखते रह गया था। 
 
ऐसा नहीं कि कमलेश्वर के व्यक्तित्व में सिर्फ अच्छाइयां ही थीं। उन्होंने अपनी कमियों को अपने संस्मरण 'आग का दरिया' में जाहिर भी किया है। लेकिन उनमें सबसे बड़ा गुण यह था कि वे नकचढ़े नहीं थे। संघर्षशील व्यक्ति की मदद के लिए वे हमेशा आगे रहते थे और आगे बढ़कर काम करते थे। यही वजह है कि जब उन्हें आखिरी विदाई देने के लिए दिल्ली के लोदी रोड श्मशान घाट पर लाया गया तो वहां तिल रखने की जगह नहीं थी। देश के नामी लेखक, पत्रकार और फिल्मकार ही नहीं, राजनेता भी उन्हें विदा देने पहुंचे थे। (लेखक टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार हैं)

वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :