गांधी नाम का मोहरा

Author उमेश चतुर्वेदी|
भारतीय परिदृश्य में गांधी हर मर्ज की दवा हैं...हर राजनीतिक कदम को वाजिब ठहराने का पैमाना हैं...गांधी विचार से हकीकत की राजनीति चाहे जितनी भी दूर हो, हर राजनीतिक दल खुद को गांधी की बनाई राजनीतिक राह पर चलने का दावा करता है...आजादी के सत्तर साल में लगातार गांधी के सपनों के मुताबिक देश को बनाने, समाज को परिमार्जित करने और हर गरीब को सशक्त करने का दावा होता रहा...लेकिन देश में अब भी कई जगह सुराख हैं।
गांधी ने खुद को बढ़ावा नहीं दिया...लेकिन गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले तमाम दलों ने परिवारवाद से आगे बढ़कर अपने सत्ता तंत्र को घरेलू तंत्र में बदल लिया..इन्हीं दलों को जब किसी ताकतवर राजनीतिक परंपरा या दल को चुनौती देनी पड़ी, उन्हें गांधी परिवार में ही मोहरा नजर आया...
भारतीय परिवेश में गांधी का नाम ऐसी ऊंचाई पर पहुंच चुका है, जहां से सिर्फ अंधेरे दिनों में ऐसी नैतिक आभा की ही उम्मीद की जाती है, जो अंधेरी खोह में फंसे देश और समाज को नई राह दिखा सके और अंधेरे से बाहर ला सके। जिस नाम का ऐसा नैतिक प्रभा मंडल हो, उसके परिवार के लोगों के लिए मोहरा विशेषण का प्रयोग कतई उचित नहीं..लेकिन ऐसा ही हो रहा है..

गांधी परिवार के पहले व्यक्ति नहीं हैं गोपालकृष्ण गांधी, जिन्हें विपक्ष ने अपना चुनावी मोहरा बनाया है...जिनके जरिए सत्ता पक्ष को नैतिक शिकस्त दी जा सके...अतीत में भी विपक्ष ने सत्ता पक्ष को नैतिक रूप से हराने के लिए गांधी परिवार के ही एक और सदस्य को मोहरा बनाया था...
28 साल पहले यानी 1989 के आम चुनावों में भी गांधीजी के पोते राजमोहन गांधी को विपक्ष ने इसी तरह उम्मीदवार बनाया था...बोफोर्स सौदे में दलाली के आरोपों के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह की अगुआई वाले जनता दल ने अमेठी संसदीय सीट से राजमोहन गांधी को अपना उम्मीदवार बनाया था...उम्मीदवार बनने से पहले राजमोहन गांधी चेन्नई में द हिन्दू अखबार के संपादक थे...पत्रकारिता और लेखन में उनकी तब प्रतिष्ठा थी..प्रतिष्ठा तो अब भी है..तब उनका राजनीति से वास्ता अखबारी टिप्पणियों तक ही सीमित था..लेकिन 1989 में उन्हें विपक्षी जनता दल ने कलम की दुनिया से राजनीति की रपटीली दुनिया में उतार दिया...
वह चुनाव अपने अनूठे नारों के लिए याद किया जाता है...तब वीपी सिंह के नारा लगता था- राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है। ऐसी ही लच्छेदार भाषा राजमोहन गांधी के लिए भी इस्तेमाल की गई...जनता दल ने कहा, अमेठी की जनता तय करेगी, असली गांधी कौन...बेशक वीपी सिंह उस चुनाव में राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस को हराकर देश की तकदीर तो बन गए, लेकिन राजमोहन गांधी चुनावी मैदान में राजीव गांधी के सामने खेत रहे..
सरकंडा, गन्ना और गेहूं की खेती वाली अमेठी की ऊबड़-खाबड़ धरती पर घूमना चेन्नई के मरीना बीच पर टहलने से ज्यादा कठिन रहा...राजमोहन गांधी ने अपने पहले ही सियासी अनुभव से सीख ले ली...और राजनीति की दुनिया से बाहर हुए तो फिर दोबारा रुख नहीं किया.. अमेठी की जनता ने अपने भारी समर्थन के जरिए तत्कालीन विपक्ष के ही शब्दों में राजीव गांधी को असली गांधी साबित कर दिया...हालांकि अब भी यह सवाल अनुत्तरित है कि क्या वोट किसी को जैविक रूप से असली और किसी को नकली साबित कर सकता है..?
गोपालकृष्ण गांधी विनम्र हैं..राजमोहन गांधी के भाई हैं..बस अंतर इतना है कि वे राजमोहन की तरह पत्रकार नहीं हैं, बल्कि सिविल सेवा के अधिकारी रहे हैं..रिटायर होने के बाद राजदूत और पश्चिम बंगाल के गवर्नर रहे हैं..पढ़ाकू भी हैं और राजमोहन की तरह चेन्नई में ही रहते हैं..

दोनों के चुनाव लड़ने में समानता यही है कि दोनों के लिए हार अवश्यंभावी है...राजमोहन भी जानते थे कि प्रधानमंत्री के सामने जीत आसान नहीं..भले ही उनके पास गांधी का असली टाइटल हो और प्रधानमंत्री के पास वह टाइटल ओढ़ी या दी हुई है...गोपालकृष्ण गांधी को भी पता है कि संख्या बल में उनकी हार तय है, भले ही उनके भी पास गांधी का असली नाम है...
दोनों की चुनावी लड़ाई का मकसद एक है या था...सत्ता पक्ष को नैतिक रूप से हराना..उन्हें इसके लिए ताकत मिलती है गांधी के ही असली नाम से.. लेकिन सवाल यह है कि क्या गांधी के नाम के सहारे किसी की चुनावी हार या जीत तय करना सही है...सवाल यह भी है कि क्या गांधी के परिजनों को क्या मोहरा बनना चाहिए...सवाल यह भी है कि क्या लोकतंत्र में नैतिक हार से सत्ताओं पर दबाव बढ़ता है?

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