इन काँपते हाथों को बस थाम लो!

इस बार वृद्धग्राम ब्लॉग की चर्चा

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एक राजकुमार बुढ़ापा देखकर जंगल की ओर निकल पड़ता है और जीवन में दुःखों को समझने की कोशिश में को अर्जित कर लेता है। उसके दर्शन की रोशनी दुनिया में चारों तरफ फैल कर पसरे अंधेरे को दूर करती है। करोड़ों लोग इस रोशनी में अपने जख्मों को सहलाते हुए दुःख के रेशों की बनावट-बुनावट को समझते हैं। इस दर्शन से जो करूणा के थरथराते हाथ निकलते हैं वे दुःख से ढहते और ध्वस्त होते मनुष्य का हाथ थाम लेते हैं।

ब्लॉग की दुनिया में एक ब्लॉग ऐसा है जो बुढ़ापे को समर्पित है। यहाँ भी बुढ़ापे को समझने की सहानुभूतिपूर्ण कोशिशें हैं। बिना किसी लफ्फाजी के, बिना किसी दयनीयता के लेकिन एक छोटे से दावे के साथ की यह बूढ़े लोगों का पहला ब्लॉग है। ब्लॉग का नाम है और हैं हरमिंजर सिंह।

उनमें विनम्रता है, वे दूसरे सहयोग लेने की लिए भी तत्पर दिखाई देते हैं इसीलिए वे अपने इस ब्लॉग पर लिखते हैं कि स्व. मुंशी निर्मल सिंह जी, ये वे हैं जिनकी प्रेरणा से हमने यह ब्लॉग तैयार किया है। इनका आशीर्वाद सदा हमारे ऊपर रहे। वृद्धों के इस पहले ब्लॉग पर आप भी हमारा सहयोग करें। इस नेक कार्य के लिए हम गुजारिश करते हैं कि आप अपने बड़े-बूढ़ों, बुजुर्गों से संबंधित उनके सुख-दुख हमसे बाँटें। हम आपके आभारी रहेंगे। यह ब्लॉग उन लोगों को समर्पित है जो हमारे अपने हैं, लेकिन अब वे बूढ़े हो चुके हैं। उनका बुढ़ापा जीवन की उस सच्चाई को दर्शा रहा है जो कभी झुठलाई नहीं जा सकती। यह एक प्रयास भर है।

इस प्रयास में सिंह एक बहुत ही मार्मिक पोस्ट चिपकाते हैं- अब यादों का सहारा है। इसमें वे बूढ़ी काकी का जिक्र करते हैं। वह (काकी) कहती है- यादों को समेटने का वक्त आ गया है। बुढ़ापा चाहता है कि जिंदगी थमने से पहले यादों को फिर जीवित कर लो। शायद कुछ पल का सुकून मिल जाए। शायद कुछ पल पुराना जीवन जीकर थोड़ा हैरान खुद को किया जाए। कितना अच्छा हो, कितना मजेदार हो, कितना शानदार हो वह वक्त। मैं यादों की पोटली समय-समय पर खोलती रहती हूँ ताकि उन्हें बिखेर कर फिर से समेट सकूँ। यह वाकई जीवन को नए रंग से भर देता है। यहाँ बूढ़ी काकी को पढ़कर आप 'प्रेमचंद की बूढ़ी काकी' को याद कर सकते हैं।

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आप यहाँ बूढ़ी काकी की बातों के जरिये बूढ़ों, बुढ़ापे के बारे में कई मार्मिक बातें पढ़ सकते हैं। जैसे यही की बुढ़ापा भी सुंदर होता है। इसमें काकी कहती हैं कि- मैंने काकी के सफेद बालों की ओर देखा। काकी ने कहा की काफी समय से ये ऐसे ही हैं। उनकी सफेदी उम्र का बखान कर रही थी। काकी का चेहरा भी उनके साथ अनोखा नहीं लग रहा था। असल में बुढ़ापा भी सुन्दर लगता है, फर्क सिर्फ नजरिए का होता है। इस पर काकी कहती है- यह हम सुनते आए हैं कि सुन्दरता देखने वालों की आँखों में होती है...। और जिसके आँखें न हों, वह.....?

तो यह ब्लॉग आपको वह आँख देता है जिसके जरिए आप बुढ़ापे को देख-जान सकें। वह नजरिया देता है, जिसके जरिए आप इसे समझ सकें। यह आपको वे थरथराते हाथ देने की कोशिश करता है कि जिसके जरिए आप थके-माँदे, हँसते-खिलखिलाते को थाम सकें। यह ब्लॉग आपको वह दिल देने कोशिश करता है जिसके जरिए आप उनके साथ कुछ पल बिताने का धैर्य और सहानुभूति हासिल कर सकें। और अंततः यह आपको वह विवेक भी देता है कि आप बिना दया के, बिना वृथा भावुकता के बुढ़ापे को संवेदनशील ढंग से महसूस कर सकें क्योंकि कभी न कभी वह आपके जीवन में दस्तक देने जरूर आएगा।

इस बुढ़ापे को समझने के लिए इस पते पर दस्तक दें- और इस ब्लॉगर को बधाई दें कि जब सारी दुनिया युवा का गुणगान करते नहीं थकती यह एक थकती हुई दुनिया की, युवा की ऊर्जा के साथ बात करता है।

रवींद्र व्यास|
http://100year.blogspot.com

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