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‘अंग्रेजी नहीं आती’ का बहाना नहीं चलेगा

Last Updated: सोमवार, 20 जुलाई 2015 (14:24 IST)
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे हिंदीभाषी राज्यों में 40 प्रतिशत से अधिक स्कूल ऐसे हैं, जहां हिंदी माध्यम से पढ़ाई होती है। इन स्कूलों से निकले जब प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला लेते हैं तो करियर की राह में अंग्रेजी आड़े आ जाती है। हालाँकि विशेषज्ञ हिंदी माध्यम के छात्रों की इस परेशानी को समझते हैं, लेकिन साथ ही वे यह भी मानते हैं कि तकनीकी ज्ञान के लिए भाषा कोई बाधा नहीं है।
 
भाषा सीखना कठिन नहीं : सुपर 30 के संस्थापक आनंद कुमार भी कहते हैं, 'जो छात्र अपने विषय में सफल है वह अंग्रेजी भी सीख सकता है, विषय में सफलता आत्मविश्वास बढ़ाती है और फिर भाषा सीखना इतना कठिन नहीं रह जाता।'
 
गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज उज्जैन में कंप्यूटर सांइस ब्रांच के डायरेक्टर डॉक्टर उमेश कुमार सिंह अंग्रेजी भाषा को छात्रों के दयनीय प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार नहीं मानते।
 
खुद हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़े डॉक्टर सिंह कहते हैं, 'भाषा कहीं भी बाधा नहीं बन सकती। हिंदी माध्यम वाले छात्रों को अंग्रेजी को भी अपने विषयों के साथ मजबूत बनाना होगा, वे अंग्रेजी न आने का बहाना नहीं बना सकते, नहीं आती है तो सीखो, आप विषय भी तो सीखते ही हो।'

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रटें नहीं, समझें : इंदौर में इंजीनियरिंग की कोचिंग चलाने वाले अंकुर वर्मा इस विषय में कहते हैं, हिंदी माध्यम वाले छात्र स्कूल परीक्षा के दौरान ही अंग्रेजी से बचने की राह ढूंढते हैं। रटने लगते हैं, जबकि उन्हें भाषा को समझने पर ध्यान देना चाहिए।
 
स्किल डेवलपमेंट में लगी संस्था इंडो-जर्मन टूल रूम (एमएसएमई) के जनरल मैनेजर प्रमोद जोशी का कहना है, 'तकनीकी शिक्षा के लिए भाषा कोई रुकावट नहीं है, बल्कि तकनीकी ज्ञान महत्वपूर्ण है. इंडस्ट्री को तकनीकी ज्ञान चाहिए और अंग्रेजी का जो स्तर इंडस्ट्री चाहती है, वह पढ़ाई के दौरान हासिल किया जा सकता है। इंडस्ट्री भाषा के बजाय स्किल देखती है।'
 
बीई करने वाले बहुत से स्टूडेंट बेरोजगार क्यों रह जाते हैं, इस सवाल पर जोशी कहते हैं, 'अगर सिर्फ डिग्री ली है और स्किल नहीं है तो नौकरी मिलना मुश्किल है, लेकिन स्किल है तो नौकरी जरूर मिलेगी।'
 
बिना अंग्रेजी के आगे बढ़ना मुश्किल : हिंदी माध्यम से पढ़कर डॉक्टर बने जबलपुर के मुकीम बनारसी कहते हैं, 'अंग्रेजी की तैयारी किसी मेनस्ट्रीम सब्जेक्ट की तरह ही करनी होती थी, शुरुआत में अंग्रेजी निबंध रटकर काम चल जाता था, लेकिन मेडिकल में इसे पूरी तरह सीखना जरूरी हो गया है। शुरुआत में बहुत परेशानी आई, फिर धीरे-धीरे बात बन गई।”
 
विषय पर पकड़ है और कुछ नया सीखने की चाह है तो इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि छात्र हिंदी माध्यम से है या किसी अन्य माध्यम से, मगर यह भी उतना ही सच है कि वर्तमान समय में बिना अंग्रेजी के आगे बढ़ना भी मुश्किल है।

 
(हिन्दीभाषी छात्रों की मदद के मकसद से ये बीबीसी हिन्दी और वेबदुनिया डॉट कॉम की संयुक्त  पेशकश है। आने वाले दिनों में करियर से जुड़ी ज़रूरी जानकारियाँ हम आप तक पहुंचाएंगे।)

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