आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मैं एक शिक्षक हूं...


 
आज शिक्षक दिवस है लेकिन में चुप रहूंगा, क्योंकि मैं शिक्षक हूं। मैं उस संवर्ग की इकाई हूं, जो सत्य का विस्तार करती है, जो अपना खून जलाकर देश के को संवारती है। मैं उस चरित्र का हिस्सा हूं जिसके बारे में आचार्य चाणक्य ने कहा था- 'निर्माण और प्रलय उसकी गोद में पलते हैं।'
 
आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मेरे दायित्व बहुत विस्तृत हैं। समाज को मुझसे अनंत अपेक्षाएं हैं। भारत के विकास का वृक्ष मेरे सींचने से ही पल्लवित होगा। माता-पिता सिर्फ अस्तित्व देते हैं, उस अस्तित्व को चेतनामय एवं ऊर्जावान मैं ही बनाता हूं।
 
आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि मैं विखंडित हूं। मेरे अस्तित्व के इतने टुकड़े कर दिए गए हैं कि उसे समेटना मुश्किल हो रहा है। हर टुकड़ा एक-दूसरे से दूर जा रहा है। इतने विखंडन के बाद भी में ज्ञान का दीपक जलाने को तत्पर हूं।
 
आज मैं चुप रहूंगा, क्योंकि ज्ञान देने के अलावा मुझे बहुत सारे दायित्व सौंपे या थोपे गए हैं, उन्हें पूरा करना है।  
> मुझे रोटी बनानी है।
मुझे चुनाव करवाने हैं।
मुझे लोग गिनने हैं। 
मुझे जानवर गिनने हैं। 
मुझे स्कूल के कमरे-शौचालय बनवाने हैं। 
मुझे माननीयों के सम्मान में पुष्प बरसाने हैं। 
मुझे बच्चों के जाति प्रमाण-पत्र बनवाने हैं। 
मुझे उनके कपड़े सिलवाने हैं।
 
हां, इनसे समय मिलने के बाद मुझे उन्हें पढ़ाना भी है। जिन्न भी इन कामों को सुनकर पनाह मांग ले लेकिन मैं एक शिक्षक हूं, चुप रहूंगा।
 
 

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