पिछले तीन दशक में राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के बेरोजगारों के लिए खाड़ी देश एक पारंपरिक गंतव्य बन गए थे। लेकिन पिछले एक साल की वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण ये शेखावटी क्षेत्र के लोगों का ये पारंपरिक रास्ता जैसे संकरा हो गया है। खाड़ी देशों में गए अनेक लोग नौकरियों से हाथ धोकर लौटकर आए हैं। ट्रेवल एजेंट्स के अनुसार लौटने वालों की संख्या हजारों में है, हालाँकि इस बारे में आधिकारिक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
पिछले 30 साल में शेखावटी क्षेत्र के सीकर, झुनझुनू और चुरू जिलों से दुबई, दोहा और कतर जाने वाले लोगों का तांता लगा रहता था। कई ऐसे बड़े गाँव भी हैं जहाँ से सैंकड़ों लोग खाड़ी देशों में गए हुए थे।
'लौटने वालों की संख्या बढ़ी' इस क्षेत्र में अनेक ट्रेवल एजेंसियाँ ही नौकरियाँ दिलाने के साथ-साथ हवाई उड़ान का टिकट दिलाने तक का काम करते हैं। अधिकतर का कहना है कि अब तो खाड़ी देशों के लिए यहाँ से भर्ती का काम पहले के मुकाबले में 25 से 40 प्रतिशत गिरा है। राजधानी जयपुर से प्रतिदिन चार उड़ानें खाड़ी देशों को जाती हैं। अब इनमें जाने वालों की संख्या घट रही है और लौटने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है।
शेखावाटी क्षेत्र के सबसे बड़े शहर सीकर में ट्रेवल एजेंट असरार अहमद इस संकट की खासी डरावनी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं, 'हमारे कारोबार में कोई 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। जयपुर से रोज चार उड़ानों में 600 लोग खाड़ी देशों को जाते थे। अब ये संख्या आधी से भी कम रह गई है। आर्थिक मंदी से दुबई खासा प्रभावित लगता है क्योंकि सीकर के कोई तीन लाख लोग वहाँ हैं, जिनमें से हमारे अनुमान के मुताबिक हज़ारों लोग वापस आ चुके हैं। हो सकता है मंदी की मार कुछ और साल झेलनी पड़े।।'
सीकर के सलाहुद्दीन पाँच दिन पहले दुबई से लोटे हैं। वे 14 साल से दुबई में थे लेकिन उनकी कंपनी ने मंदी का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए। एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में हेड फोरमैन रहे सलाहुद्दीन ने बताया, 'मैं जिस कंपनी में काम करता था उसमें 17 हजार लोग काम करते थे। अब मुश्किल से 1500 लोग रह गए हैं।'
उनका कहना है, 'कंपनियाँ तो काम करने को तैयार हैं लेकिन उन्हें फिलहाल कोई संस्था वितीय सहायता देने को तैयार नहीं है। सारे निर्माण कार्य ठप्प हो गए हैं। मैं अपनी कंपनी के संपर्क में हूँ, वो कहते हैं कि जब काम होगा बुला लेंगे...पर कब तक इंतजार करें।'
'कर्ज भी चुकाना है' खाड़ी देशों से उल्टे पाँव लौटे अनेक लोगों के कंधो पर कर्ज का बोझ है और साथ ही जिम्मेदारियाँ भी हैं। शेखावाटी के कूदन गाँव से अनेक हुनरमंद लोग खाड़ी देशों को जाते हैं।
कूदन के जगदीश मेहरिया कहते हैं, 'हमारे गाँव से दुबई में हर समय काम करने वाले लोगों की संख्या कम से कम सौ तक होती थी। अब गाँव के महज 15-20 लोग वहाँ काम कर रहे हैं।' कूदन गाँव के पंचायत भवन में हमें ऐसे एक दर्जन लोग मिले जो दुबई से वापस आकर अपनी दुख भरी दास्ताँ बयान कर रहे थे।
कूदन के सोहनलाल कोई दो माह पहले ही दुबई से लोटे हैं। निर्माण क्षेत्र की एक कंपनी में मजदूरी करने वाले सोहनलाल बोले, 'जब पगार ही नहीं मिल रही तो वहाँ रहने से क्या फायदा? एक लाख रुपए का कर्ज लेकर दुबई गया था। वेतन में कटौती के बाद वहाँ हर महीने 2000 रुपए बच रहे थे लेकिन इतना ही ब्याज लग रहा था। तो मैं वापस लौट आया। अब कर्ज सर पर है और इसे अदा करने में ही दस साल लग जाएँगे। मेरे साथ पंजाब, आँध्रप्रदेश और केरल के भी लोग थे, ज्यादातर लोग वापस लौट रहे थे...मेरे घर में बीस लोग हैं...जिंदगी और मुश्किल हो गई है।'
कूदन के पास के ही एक गाँव के लालचंद भी कर्ज लेकर दुबई गए थे और खली हाथ लौट आए। वे कहते हैं, 'बहुत उम्मीदों के साथ दुबई गया था। पर वहाँ काम ही नहीं था। अब चिंता कर्ज चुकाने की है। मेरे सर पर अब 60 हजार रुपए का ऋण है।'
कूदन के शीशपाल कोई डेढ़ साल दुबई में रहे। मंदी की मार ने शीशपाल को दुबई से वापस आने पर मजबूर कर दिया। नेमीचंद, धर्मेंद्र...सबकी ये ही कहानी है...ये सब दुबई रिटर्न्ड हैं।
मोहम्मद लियाकत भाटी जनवरी में कतर से भारत आए और फिर मंदी ने उनकी वापसी का मार्ग रोक दिया। वे कहते हैं, 'मैं जिस निर्माण कंपनी में काम करता था उसमें कोई 20 हजार लोग काम करते थे। अब 4000 रह गए हैं। कंपनी को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। दुबई और कतर में हालात काफी खराब हैं। पश्चिमी देशों की कंपनियाँ ही नहीं, शेख लोगों की अपनी कंपनियाँ भी मुश्किल में हैं...जो लोग छह-छह माह के काम पर गए थे, उन्हें महज दो माह में ही वापस लौटना पड़ा..।'
ज्ञानचंद बहरीन में थे। कुछ ही दिन पहले लौटे हैं। ज्ञानचंद बताते हैं, 'बहरीन में बहुत काम खोजा, पर काम नहीं मिला। मेरे 60 हजार रुपए खर्च हो गए। अब ऋण चुकाने की चिंता है।'
शेखावाटी क्षेत्र में लगभग 100 ऐसी एजेंसियाँ हैं जो खाड़ी जाने वाले लोगों की टिकट बुकिंग से लेकर नौकरियाँ दिलाने का काम करती हैं। अकबर ट्रेवल्स के मोहम्मद सलीम कुरैशी बताते हैं, 'हमनें तो अनुभव किया है कि इस कारोबार में 40 फीसद तक कमी आई है। प्रभाव तो दुनिया भर में है और उड़ान कंपनियाँ भी बची नहीं हैं। वहाँ जाने वालों की संख्या आधी रह गई है। हर साल शेखावाटी से कोई तीन लाख लोग खाड़ी देशों को जाते थे। अब ये संख्या खासी घट गई है।'
असरार अहमद कहते हैं खाड़ी देशों में नौकरी के लिए भर्ती का काम अब महज दस फीसद रह गया है। जयपुर की एक ट्रेवल कंपनी के इदरीस कहते हैं कि दुबई जाने वालों की संख्या आधी से भी कम रह गई है।