ऑपरेशन ब्लूस्टार का नेतृत्व करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बरार (उस समय मेजर जनरल) का कहना है कि जब वो 25 साल पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें इस बात का अफसोस होता कि सेना को अपने देश वासियों पर गोलियाँ चलानी पड़ी, लेकिन जो हालात थे उसमें कुछ भी गलत नहीं हुआ।
वो कहते हैं कि फौजी हिंदू, मुसलमान या सिख नहीं होते बल्कि देश के रक्षक होते हैं। उन्हें वर्दी की लाज रखनी होती है। पेश है उनसे विस्तृत बातचीत के अंश।
*जनरल बराड़ आपने अपनी किताब में जिक्र किया है कि इस ऑपरेशन के बारे में आपको पता नहीं था। आप मनीला जाने वाले थे। फिर कैसे पता चला कि इस ऑपरेशन का नेतृत्व आपको करना है और इसके लिए अमृतसर पहुँचना है। उस समय आप कहाँ थे।
- मैं मेरठ में था और 90 इनफैंट्री डिविजन को कमांड कर रहा था। तीस मई की शाम फोन आया कि मुझे एक जून को चंडीमंदिर एक मीटिंग के लिए पहुँचना है जबकि उसी शाम हमारा कार्यक्रम फिलीपींस की राजधानी मनीला जाने का था। टिकटें बूक हो चुकी थीं। लेकिन इस कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा...
मैं सड़क मार्ग से दिल्ली पहुँचा और फिर जहाज से चंडीगढ़ गया। सीधा वेस्टर्न कमांड पहुँचा। जब वहाँ पहुँचा तो मुझे बताया गया है कि हमें अमृतसर जल्दी से जल्दी जाना है। मुझे ब्रीफींग के दौरान बताया गया कि हालात बहुत खराब हैं।
जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने पूरे स्वर्ण मंदर पर कब्जा कर लिया है और पंजाब में कानून व्यवस्था चरमरा गई है। पुलिस और राज्य मशीनरी काम नहीं कर रही है। इन हालात को जल्दी से जल्दी ठीक करने हैं, नहीं तो पंजाब भारत के हाथ से निकल जाएगा।
इस ब्रीफींग के बाद मैं अमृतसर पहुँचा। उस समय मुझे कुछ भी पता नहीं था कि स्वर्ण मंदिर में क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है। इसी स्थिति में मैंने अपनी रणनीति की शुरुआत की।
*आपको ब्रीफ में ऑपरेशन के क्या उद्देश दिए गए थे?
मुझे बताया गया था कि हालात इतने खराब हो गए हैं कि अगले दो-चार दिन में खालिस्तान की घोषणा हो जाएगी। जिसके बाद पंजाब पुलिस खालिस्तान में मिल जाएगी। फिर दिल्ली और हरियाणा में जो सिख हैं वो फौरन पंजाब की ओर बढ़ेंगे और हिंदू पंजाब से बाहर निकलेंगे। 1947 की तरह दंगे हो सकता है। पाकिस्तान भी सीमा पार कर सकता है, यानी पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने की घटना भारत में दोहराई जा सकती है।
ऐसे में सेना के लिए बहुत कठिन काम था। दंगे, खालिस्तान की संभावित घोषणा और पाकिस्तानी सेना का सीमा के अंदर प्रवेश को रोकना।
हालाँकि इन सब हालात को देखते हुए उस समय की प्रधानमंत्री ने कोशिश की कि किसी तरह का समझौता हो जाए, लेकिन जब कोई समझौता नहीं हो पाया तो उन्होंने फैसला किया कि अब कार्रवाई की जाए और स्वर्ण मंदिर को भिंडरांवाले के हाथ से निकाला जाए।
बहुत नाजुक मामला था लेकिन मुझे ब्रीफ दी गई थी कि ऑपरेशन में कम से कम लोग हताहत होने चाहिए। स्वर्ण मंदिर का भी कम से कम नुकसान हो।
*ये बताएँ कि पाँच जून का ही दिन क्यों चुना गया। इसके बारे में पहले से तय था या यह निर्णय आपने लिया।
ऐसी कोई बात नहीं थी। योजना बनाने और सेना को पहुँचने में दिन लग जाता है। सैनिकों को मेरठ, जालंधर और दिल्ली से आना था, फिर उन्हें तैनात करना था। ये पता लगाना था कि आतंकवादी कहाँ-कहाँ पर हैं। उनके पास क्या हथियार हैं। योजना बनाने में वक्त तो लगता है।
*क्या आपको कुछ खुफीया जानकारी मिल पा रही थी कि मंदिर परिसर में किस तरह की तैयारी थी। कुछ अंदाजा था?
नहीं पहले से कोई जानकरी नहीं थी। जब वहाँ पहुँचा तो स्थिति से परिचित हुआ। पुलिस वाले नजर नहीं आ रहे थे। बहुत ही कम संख्या में थे। हम लोगों ने तैयारी शुरू की और एक सिख अफसर को सादे कपड़े में श्रद्धालु के रुप में अंदर भेजा और वो जो देख सकते थे उसकी जानकारी दी। साथ ही स्वर्ण मंदिर के बाहर के मकानों की छतों से दूरबीन की मदद से स्थिति का आंकलन किया।
*क्या आपने ऑपरेशन के पहले सैनिकों को प्रेरित करने और मिशन के बारे में बताने के लिए बात की।
देखिए हम लोग पाँच जून की रात को अंदर गए है। इसलिए पाँच की सुबह मैंने सैनिकों को ऑपरेशन के बारे में बताया। उससे पहले नहीं बताया गया, क्योंकि अगर इसकी खबर बाहर चली जाती तो ये ऑपरेशन अपने अंजाम को नहीं पहुँच सकता था। पूरे पंजाब में ये बात फैल जाती की सेना अंदर जाने वाली है। इसलिए जितनी देर से जानकारी दे सकते थे दी।
पाँच जून की सुबह साढ़े चार बजे हर एक बटालियन के पास जाकर करीब आधे घंटे तक उनके जवानों से बात की। उन्हें बताया कि हालात कितने खराब हो गए हैं। हमें अंदर जाना ही है और ये नहीं सोचना चाहिए कि हम किसी पवित्र स्थल पर जाकर उसको बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि हम उसकी सफाई करने जा रहे हैं।
हमें ये नहीं सोचना है कि हम सिख, हिंदू, मुसलमान, ईसाई या पारसी हैं, बल्कि हमकों इस देश के बचाव के लिए कार्रवाई करनी है।
उनको समझाया कि पंजाब अलग हो सकता है और इसे देश का विभाजन हो सकता है। मैंने कहा कि जब हमने एक बार वर्दी पहन ली है और कसम खा ली है तो देश की रक्षा करनी है। हमें जो हुक्म मिला है हमें उसका पालन करना है।
मैंने पूछा कि यदि कोई जवान सोचता है कि उसे अंदर नहीं जाना है तो वो कह दें, उसे इस कार्रवाई में शामिल नहीं किया जाएगा और उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं होगा।
किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन चौथे बटालियन में एक सिख खड़ा हुआ। मैंने उनसे कहा कि अगर आपको अंदर नहीं जाना तो आप भाग लेने से मुक्त हैं और आपके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी।
लेकिन उस सिख अधिकारी ने कहा है कि 'आप मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं सबसे पहली टुकड़ी में अंदर जाना चाहता हूँ। आप मुझे सबसे पहले भेजें ताकि मैं भिंडरांवाले से निपट लूँ। मैंने निर्देश दिया कि उनकी पलटन सबसे आगे और पहले जाएगी और ऐसा ही हुआ।
उस शुरुआती हमले में मशीनगन की फायरिंग से उसकी दोनों टांगे टूट गई। खून बह रहा था फिर भी वो रेंगते हुए आगे बढ़ता रहा। बाहर एंबुलेंस खड़ी थी और उसे जबर्दस्ती पकड़ कर वापस लाया गया। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें अशोक चक्र दिया गया। वे राष्ट्रपति भवन व्हील चैयर से आए और उन्होंने सम्मान ग्रहण किया।
*ऑपरेशन कितने बजे शुरू हुआ। कब सेना की पहली टुकड़ी भेजी गई।
- हम ऑपरेशन शाम को सात बजे शुरू करना चाहते थे। इसलिए हमने पाँच बजे से ही लाउडस्पीकर से यह एलान करना शुरू कर दिया कि जो लोग निकलना चाहते हैं वो बाहर निकल जाए। क्योंकि हम चाहते थे कि जो मासूम लोग हैं उन्हें कोई नुकसान न पहुँचे। लेकिन कोई नहीं आया, फिर हमने सात बजे एलान किया लेकिन कोई नहीं आया। तब हमने ऑपरेशन का समय बढ़ाकर आठ बजे कर दिया। फिर नौ बजे भी एलान किया। उस समय आठ से दस बुजुर्ग लोग बाहर निकले। उनका कहना था कि दूसरे लोग आना चाहते हैं लेकिन आने नहीं दिया जा रहा है।
तब हम लोगों ने सोचा कि अगर और इंतजार किया तो रात निकल जाएगी और जब दिन चढ़ेगा तो यह बात पंजाब के कोने-कोने में पहुँच जाएगी। तब लाखों सिख अपनी बंदूकें और तलवारें लेकर यहाँ चले आएँगे। सुबह तक ऑपरेशन खत्म नहीं हुआ तो सेना के लिए मुश्किल पैदा हो जाएगी। इसलिए साढ़े नौ बजे के करीब ऑपरेशन की शुरुआत हुई।
*किस समय आपको लगा कि चीजे योजनाबद्ध नहीं चल रही हैं और सेना को मुश्किल का समाना करना पड़ रहा है।
- पहले 45 मिनट में उनकी ताकत, हथियार और योजना के बारे में पता लग गया कि उनकी तैयारी काफी अच्छी है। ऐसे में ये ऑपरेशन इतना आसान नहीं होगा।
हम लोगों की कोशिश थी कि कमांडो अकाल तख्त की ओर जाएँ। इसके लिए सन ग्रेनेड फेंके गए। जिससे आदमी मरता नहीं है, लेकिन आँखों में आँसू आ जाते हैं ताकि उतनी ही देर में कमांडो अंदर चले जाएँ। लेकिन हर दरवाजे और खिड़की पर सैंडबैग लगे हुए थे, इसलिए इसका कोई असर ही नहीं पड़ रहा था। बल्कि ये सनग्रेनेड हमारे ही जवानों के ऊपर आ रहे थे। फिर जरूरत के हिसाब से समय-समय पर रणनीति में बदलाव किया जाता रहा।
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*क्या तीन मीनारों को उड़ाने का फैसला आपका था? उसके पीछे क्या रणनीति थी।
- ऐसा इसलिए किया गया कि उन मीनारों पर सैंडबैग लगाकर आतंकवादी मशीनगन के साथ बैठे थे। जब तक उसको नहीं उड़ाया जाता जवानों का अंदर जाना मुमकिन नहीं था, क्योंकि उन मीनारों से सीधे फायरिंग हो रही थी।
*क्या पैराटूपर्स को भी वहाँ गिराया गया था और आप कितनी दूरी पर थे। किस तरह की खबरें आ रही थी शुरू में आपने लेफ्टिनेंट कर्नल इसरार खान को भेजा था। उनकी तरफ से आप को क्या फीडबैक मिला।
- नहीं पैराटूपर को नहीं गिराया गया था। मैं परिसर से पचास गज की दूरी पर था। इसरार खान ने बताया कि अंदर से काफी गोलीबारी हो रही है। मशीनगन और ग्रेनेड फेंके जा रहे हैं।
हम लोग अकाल तख्त की पहली मंजिल पर जाना चाहते थे लेकिन इसरार का कहना था कि पहले परिक्रमा को साफ किया जाए फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाए।
*शुरु में आपकी योजना थी कि चरमपंथियों के बाहरी सुरक्षा कवच को कमजोर किया जाए और फिर भिंडरांवाले को हथियार डालने पर मजबूर किया जा सके। वो रणनीति क्यों सफल नहीं हो पाई।
- हमारे पास समय बहुत कम था इसलिए हम उनके बाहरी सुरक्षा को हटा नहीं सके और हमें चारों ओर से जाना पड़ा। एक जगह से कामयाबी नहीं मिली तो दूसरी जगह से मिल जाए और जो भी विकल्प थे तमाम का इस्तेमाल किया जाए।
*टैंकों को भेजने का निर्णय कब लिया गया। क्या ये आपकी योजना में पहले ही से था?
- नहीं! बिल्कुल योजना में नहीं था। ये निर्णय बाद में लिया गया जब हम लोगों को लगा कि जवान अकाल तख्त के करीब नहीं पहुँच पा रहे हैं तो उसके अंदर कैसे जा सकते हैं।
और देर होती तो सुबह हो जाने का डर था। अगर सुबह हो जाती तो लोगों के आने से सेना के लिए परेशानी बढ़ जाती। टैंकों का प्रयोग इसलिए किया गया कि उसके जिनोन या हैलोजन लाइट के जरिए कुछ समय के लिए आतंकवादियों को रोशनी से चौंधिया कर सेना प्रवेश कर सके, लेकिन ये लाइट फ्यूज हो गई, फिर दूसरा टैंक लाया गया। लेकिन कामयाबी नहीं मिली, जबकि सुबह भी हो रही थी।
अकाल तख्त की ओर से बुरी तरह से फायरिंग हो रही था। तब जाकर ये आदेश दिया गया है कि टैंक के जरिए अकाल तख्त के ऊपर वाले हिस्से पर फायरिंग की जाए। ताकि जब ऊपर से कुछ पत्थर वगैरह गिरेंगे तो लोग डर जाएँ।
हमें ऑपरेशन पूरा होने का आभास तब हुआ जब लोग सफेद झंडे के साथ बाहर निकले। तब पता चला कि भिंडरांवाले की मौत हो गई है। इसके बाद सिख लड़ाकों का मनोबल गिर गया। फिर वो लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। कई ने भागने की कोशिश की। कई लोगों ने सरोवर के अंदर छलाँग मारी और वे भी फायरिंग की चपेट में आ गए।
*ऐसी भी बात कही जाती है कि टैंक भेजने से पहले ऐपीसी (सैनिकों को ले जाने वाली बख्तरबंद गाड़ी) भेजने की कोशिश की गई थी जिसे रॉकेट लॉंचर से उड़ा दिया गया।
- जी ऐसी कोशिश की गई थी क्योंकि हम लोगों को नहीं मालूम था कि उनके पास रॉकेट लॉंचर भी है। ऐपीसी के जरिए कमांडो भेजने की कोशिश की गई थी।
*टैंक भेजने का निर्णय आप लोगों ने लिया या ये फैसला दिल्ली ने लिया।
- ये कहना मेरे लिए मुश्किल है, लेकिन हमें इसका हुक्म जनरल सबरजीत सिंह ढिल्लों ने दिया और कहा कि टैंक भेजा जाए। उन्होंने जरूर दिल्ली से अनुमति ली होगी।
*आपको यह कब अंदाजा हुआ कि भिंडरांवाले नहीं रहे और उनके सैन्य कमांडर जनरल सुभेग सिंह की मृत्यू हो गई। इस सिलसिले में पहला संकेत आपको कब मिला।
- जब कुछ लोग सफेद झंडा लेकर निकले और फिर फायरिंग भी बंद हो गई तो लगा कि कुछ हुआ है और फिर उनके मारे जाने की पुष्टि हुई।
*इस ऑपरेशन के बाद आप परिसर में कब घुसे और आपने क्या देखा।
- जब खबर आई की भिंडरांवाले मारे गए तो हम घुसे। छह जून को सुबह लगभग दस बजे।
*आपके अनुसार कितने लोग इस ऑपरेशन में मारे गए होंगे।
- पूरे आँकडे तो फिलहाल मेरे पास नहीं हैं लेकिन सेना के सौ जवान और तीन सौ सिख विद्रोही मारे गए थे।
*पच्चीस साल बाद आप इस ऑपरेशन को किस तरह देखते हैं। कोई पछतावा, कोई दूसरा तरीका अपनाया होता तो परिणाम बेहतर होते।
- ये तो मैंने कई दफा सोचा है कि कोई और तरीका हो सकता था या नहीं, लेकिन उस समय के जो हालात थे और जो समय की कमी थी उसको जेहन में रखते हुए कोई और तरीका नहीं हो सकता था।
*लेकिन जब हम 25 साल पहले को देखते हैं तो अफसोस होता है कि आखिर हमें ऐसा ऑपरेशन क्यों करना पड़ा? जब अपने लोगों पर हमला करना पड़ा? लेकिन ऐसे समय क्या किया जा सकता है जब अपने ही देश के लोग आतकंवादी बन जाएँ और पाकिस्तान से हाथ मिला लें।
मन में सिर्फ इस बात से शांति है कि हमने स्वर्ण मंदिर को गंदगी से साफ कर दिया।
*जनरल बरार आप खुद सिख है इसके बावजूद आपने इस ऑपरेशन का नेतृत्व किया। किसी समय पर आपको कुछ सोचने पर मजबूर होना पड़ा।
- देखिय मैं तो यह जानता हूँ कि जब एक बार वर्दी पहन ली और कसम खा ली है कि इस देश की रक्षा करेंगे और इस देश को टूटने नहीं देंगे तो फिर हम नहीं सोचते कि सिख हैं या हिंदू। मुझे अफसोस है कि इस घटना के बाद मेरे कई अपनों ने मुझसे रिश्ता तोड़ लिया।
मेरे मामा जो इंग्लैंड में रहते थे, उन्होंने मुझसे नाता तोड़ लिया और सारी उम्र बात नहीं की। जब वे मृत्यु के बहुत करीब थे तब ही उन्होंने मुझसे बात की। लेकिन ऐसा तो होता ही है, वे भी समझ गए होंगे की अपनी जिम्मेदारी निभाना मेरा मजबूरी थी।