ये मिसाल हैं मानवता की, एकता की...
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वाजुद्दीन महरौली के ही रहने वाले हैं और उस वक्त वार्ड नंबर आठ की उस गली में मौजूद थे, जिसमें शनिवार की दोपहर बम विस्फोट हुआ। यहीं पटरी पर दुकान लगाते हैं प्रेमपाल श्रीवास्तव। उस वक्त बेटा खाना लेकर आया था और वो खाना खाने जा रहे थे।
तभी जोर के एक धमाके ने रोज की रफ्तार से चल रहे इस इलाके को हिलाकर रख दिया। हाथों से रोटी छूट गई। कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ। आगे गली में धुआँ ही धुआँ भरा हुआ था। प्रेमपाल और वाजुद्दीन को भी और लोगों की तरह यह समझते देर न लगी कि उनके इलाके में किसी ने विस्फोट करके माहौल बिगाड़ने की कोशिश की है।
दोनों ने एक दूसरे को देखा और तुरंत एक सहमति के साथ घटनास्थल की ओर लपके। लोग वहाँ से भाग रहे थे पर इन्होंने तय किया कि घायलों को वहाँ से निकाला जाए।
दर्दनाक था सब कुछ : प्रेमपाल बताते हैं कि इलाके में रोज की तैनाती के मुताबिक दो पुलिस वाले मौजूद थे। उन्होंने थाने को खबर दी इन धमाकों की। पर पुलिस और राहत आने में कुछ समय तो लगना ही था सो हम खुद ही वहाँ से लोगों को निकालने लगे।
वाजुद्दीन बताते हैं कि हम लोगों ने घायलों को वहाँ से निकाला, जो गाड़ियाँ थीं उन्हीं में लोगों को डाला गया और अस्पताल की ओर लपके। अधिकतर एंबुलेंस तो लोगों को यहाँ से निकाल लेने के बाद पहुँचीं।
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जिस इलाके में यह घटना हुई वहाँ ज्यादातर परिवार निम्न मध्यमवर्गीय हैं। मिली हुई आबादी है यानी हिंदुओं और मुसलमानों की लगभग बराबर तादाद है और घर से मिले हुए हैं।
ऐसे में कोई भी ऐसा हमला माहौल बिगाड़ने का काम कर सकता था। पर अच्छी बात यह है कि वाजुद्दीन और प्रेमपाल जैसे लोगों ने इलाके में एकता की मिसाल भी कायम रखी और मानवता की भी। पर दिलों में इनके भी चोट तो लगी ही है। घटना से कामकाज बंद हो गया। ये रोज कमाकर जीने वाले लोग हैं। जान पहचान के लोग भी घायल हुए हैं, उन्हें नुकसान हुआ हैं।
अब सवाल के घेरे में प्रशासन है। दिल्ली की पुलिस और खुफिया तंत्र हैं। प्रेमपाल इस सवाल को उठाते हैं- यह सब क्या हो रहा है। क्या अब हम अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं रहे। प्रेमपाल और वाजुद्दीन को प्रशासन से इस सवाल के जवाब का इंतजार रहेगा।
