शायद आप जल्द ही क्रिकेट की सफेद की जगह गुलाबी गेंद से मैच होता देख सकेंगे। इंग्लैंड के लॉर्ड्स में पहली बार गुलाबी गेंद से मैच खेला गया। सोमवार को हुए 50 ओवरों के इस मैच में एमसीसी इलेवन ने स्कॉटलैंड को हरा दिया।
ऐसा माना जा रहा है कि इस प्रयोग के सफल हो जाने पर 2009 से ट्वेंटी-20 और वनडे मैच गुलाबी गेंद से ही खेले जाने लगेंगे। दरअसल, सफेद गेंद मैदान की हरी घास पर कुछ ही ओवरों में गंदी हो जाती है।
इसके बाद फ्लड लाइट की रोशनी में क्षेत्ररक्षकों और बल्लेबाजों को इसे देखना काफी मुश्किल हो जाता है। ये सफेद गेंद जमीन की रगड़ और बल्ले की मार से जल्द ही घिस भी जाती है, जिसकी वजह से 50 ओवरों के मैच में इसे 35 ओवरों बाद ही बदलना पड़ता है।
वन-डे मैचों के रोमांच की वजह से इसके विकल्प की काफ़ी समय से जरूरत महसूस की जाती रही है और लगता है कि गुलाबी गेंद इसका विकल्प हो सकती है।
गुलाबी गेंद : इससे पहले भी गुलाबी रंग की गेंद का प्रयोग किया जा चुका है। इसी साल जनवरी में ब्रिस्बेन में क्वींसलैंड और वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए महिला क्रिकेट मैच में इसका इस्तेमाल किया गया था। यह प्रयोग काफी कामयाब भी रहा था।
सोमवार को लॉर्ड्स में हुए मैच के लिए दो अलग-अलग तरह की गुलाबी गेंदों का इस्तेमाल किया गया। स्कॉटलैंड की पारी के दौरान 'कूकाबूरा' गेंद का इस्तेमाल किया गया जबकि एमसीसी इलेवन की इनिंग के दौरान 'ड्यूक' गेंद इस्तेमाल की गई। इस मैच में किए गए प्रयोग के बाद 'कूकाबूरा' गेंद ने ज़्यादा बेहतर परिणाम निकले।
इस प्रयोग से जुड़े इंग्लैंड के पूर्व बल्लेबाज जॉन स्टीफेंसन का कहना था कि प्रयोग के तौर पर इन गर्मियों में इसी गुलाबी गेंद का इस्तेमाल किया जाएगा। उनका कहना था कि इन गर्मियों के बाद में कोई नतीजा निकलेगा। उसे मैं इस साल के अंत तक इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड के सामने पेश करूँगा।
सोमवार को हुए इस मैच में सफेद गेंद को ही गुलाबी डाई से रंग कर इस्तेमाल किया गया था। स्टीफेंसन का कहना था कि 50 ओवरों के बाद भी ये गेंद साफ नजर आ रही थी। सिर्फ गुलाबी रंग की डाई ही कुछ धुंधली पड़ी थी। क्षेत्ररक्षण के दौरान बाउंड्री पर इस गुलाबी गेंद को पकड़ना आसान था।
दरअसल, आसमान और स्टेडियम की सफेद कुर्सियों में गेंद का रंग मिल जाता है, जिससे बल्लेबाजों को इसे खेलने और क्षेत्ररक्षकों को इसे पकड़ने में मुश्किल होती है।
सफेद गेंद का इतिहास : अब से 30 साल पहले ऑस्ट्रेलिया में कैरी पैकर वर्ल्ड सिरीज़ के दौरान सबसे पहले सफेद गेंदों का इस्तेमाल किया गया था और तभी से क्रिकेट की गेंद से प्रयोग किए जाते रहे हैं।
इंग्लैंड में 1989 में नारंगी रंग की गेंद इस्तेमाल की गई थी, लेकिन दिन-रात के मैचों में ये टीवी पर ठीक से दिखाई नहीं देती थी। स्टीफेंसन मानते हैं कि नारंगी रंग की गेंद की तरह ही गुलाबी गेंद का टीवी पर परीक्षण होना अभी बाकी है।
टीवी कैमरे पर कामयाब होने के बाद ही अंतरराष्ट्रीय मैचों में इस गुलाबी गेंद से खेलने को मंजूरी मिल पाएगी। लॉर्ड्स पर स्कॉटलैंड और एमसीसी इलेवन को देखने पहुँचे दर्शकों का कहना था कि दिन की रोशनी में तो ये गुलाबी गेंद साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन स्टीफेंसन दावे से कहते हैं कि गुलाबी गेंद पूरे 50 ओवर तक चलेगी।
अगर लॉर्ड्स में गुलाबी गेंद से हुए इस मैच के परिणाम की बात करें तो पहले बल्लेबाज़ी करते हुए स्कॉटलैंड ने सात विकेट के नुकसान पर 253 रन बनाए, जबकि एमसीसी इलेवन की टीम ने आठ गेंदें रहते चार विकेट से ये मैच जीत लिया।
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