मुख पृष्ठ » धर्म-संसार » व्रत-त्योहार » गणेशोत्सव » चतुर्थी तिथि की श्रेष्ठता
 
Ganesh
WDWD
शिवपुराण की कथा है- श्वेतकल्प में जब भगवान शंकर के अमोघ त्रिशलू से पार्वतीनंदन दण्डपाणि का मस्तक कट गया, तब पुत्रवत्सला जगज्जननी शिवा अत्यंत दुःखी हुईं। उन्होंने बहुत सी शक्तियों को उत्पन्न किया और उन्हें प्रलय मचाने की आज्ञा दे दी। उन परम तेजस्विनी शक्तियों ने सर्वत्र संहार करना प्रारंभ किया। प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। देवगण हाहाकार करने लगे। तब समस्त भयनाशिनी जगदम्बा को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने उत्तर दिशा से हाथी का सिर लाकर शिवा पुत्र के धड़ से जोड़ दिया। महेश्वर के तेज से पार्वती का प्रिय पुत्र जीवित हो गया।

अपने पुत्र गजमुख को जीवित देखकर त्रैलोक्यजननी शिवा अत्यंत प्रसन्न हुईं। उस समय दयामयी पार्वती को प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवताओं ने वहीं गणेश को 'सर्वाध्यक्ष' घोषित कर दिया। उसी समय अत्यंत प्रसन्न देवाधिदेव महादेव ने अपने वीर पुत्र गजानन को अनेक वर प्रदान करते हुए कहा- 'विघ्नाश के कार्य में तेरा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा। तू सबका पूज्य है, अतः अब मेरे सम्पूर्ण गणों का अध्यक्ष हो जा।'

तदनन्तर परम प्रसन्न भक्तवत्सल आशुतोष ने गणपति को पुनः वर प्रदान करते हुए कहा-'गणेश्वर! तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्रमा का शुभोदय होने पर उत्पन्न हुआ है। जिस समय गिरिजा के सुंदर चित्त से तेरा रूप प्रकट हुआ, उस समय रात्रि का प्रथम प्रहर बीत रहा था, इसलिए उसी दिन से आरंभ करके उसी तिथि में प्रसन्नता के साथ (प्रतिमास) तेरा उत्तम व्रत करना चाहिए। वह व्रत परम शोभन तथा संपूर्ण सिद्धियों का प्रदाता होगा।

फिर व्रत की विधि बतलाते हुए सर्वसुहृद प्रभु पार्वतीवल्लभ ने गणेश चतुर्थी के दिन अत्यंत श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गजमुख को प्रसन्न करने के लिए किए गए व्रत, उपवास एवं पूजन के माहात्म्य का गान किया और कहा- 'जो लोग नाना प्रकार के उपचारों से भक्तिपूर्वक तेरी पूजा करेंगे, उनके विघ्नों का सदा के लिए नाश हो जाएगा और उनकी कार्यसिद्धि होती रहेगी। सभी वर्ण के लोगों को, विशेषकर स्त्रियों को यह पूजा अवश्य करनी चाहिए तथा अभ्युदय की कामना करने वाले राजाओं के लिए भी यह व्रत अवश्य कर्तव्य है। व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, उसे निश्चय ही वह वस्तु प्राप्त हो जाती है, अतः जिसे किसी वस्तु की अभिलाषा हो, उसे अवश्य तेरी सेवा करनी चाहिए।'

'गणेशपुराण' में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न काल में भी आदिदेव गणेश के पूजन की तीव्र लालसा से शिवप्रिया लेखनाद्रि के एक रमणीय स्थान पर गणेश का ध्यान करते हुए उनके एकाक्षरी मंत्र का जप करने लगीं। इस प्रकार बारह वर्ष तक कठोर तप करने पर गुण वल्लभ गणेश संतुष्ट हुए और पार्वती के सम्मुख प्रकट होकर उन्होंने उनके पुत्र के रूप में अवतरित होने का वचन दिया।

भाद्र शुक्ल चतुर्थी का मध्याह्न काल था। उस दिन चन्द्र वार, स्वाति नक्षत्र एवं सिंह लग्न का योग था। पाँच शुभ ग्रह एकत्र थे। जगज्जननी शिवा ने गणेशजी की षोडशोपचार से पूजा की और उसी समय उनके सम्मुख अमित महिमामय, कुन्दधवल, षड्भुज, त्रिनयन भगवान गुणेश पुत्र रूप में प्रकट हो गए।

भक्तसुखदायक परमप्रभु गुणेश की प्राकट्य तिथि होने के कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी दयाधाम गुणेश की वरदा तिथि प्रख्यात हुई। उस दिन मध्याह्न काल में भगवान गणेश की मृन्मयी मूर्ति की श्रद्धा-भक्तिपूर्ण पूजा एवं मंगलमूर्ति प्रभु के स्मरण, चिंतन एवं नाम-जप का अमित माहात्म्य है। वह पुण्यमय तिथि अत्यंत फलप्रदायिनी कही गई है। चतुर्मुख ब्रह्मा ने अपने मुखारविन्द से कहा है कि 'इस चतुर्थी व्रत का निरूपण एवं माहात्म्य गान शक्य नहीं।'

'मुद्गल पुराण' में भी आता है कि परम पराक्रमी लोभासुर से त्रस्त होकर देवताओं ने परम प्रभु गजानन से उसके विनाश की प्रार्थना की। दयाधाम गजमुख उस महान असुर के विनाश के लिए परम पावनी चतुर्थी को मध्याह्न काल में अवतरित हुए, इस कारण उक्त तिथि उन्हें अत्यंत प्रीति प्रदायिनी हुई।