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Written By ND

आत्मशुद्धि कराता है शनि

भारतीय ज्योतिषशास्त्र
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भारतीय ज्योतिषशास्त्र में शनि का स्थान काफी महत्वपूर्ण है। शनि को ज्योतिष में क्रूरतम ग्रह की संज्ञा मिली है। उसकी चाल भी दूसरों से अलग है और इसकी साढ़ेसाती और ढैय्या के डर से सभी काँपते हैं। ऐसी स्थिति में शनि को लेकर कई भ्राँतियाँ भी हैं।

कुण्डली में शनि की स्थिति और उसके प्रभावों पर चर्चा के लिए अखिल भारतीय आर्यभट्ट ज्योतिष अनुसंधान परिषद, जबलपुर ने संगोष्ठी का आयोजन किया। इस आयोजन के दौरान 'शनि का मानव जीवन में प्रभाव' शनि के स्वरूप, उसके व्यवहार और गुणों के साथ कुण्डली में उसकी स्थिति के हिसाब से मिलनेवाले फलों की विवेचना की गई।

इस दौरान सबने प्रिडिक्शन के दौरान मिले अनुभव बाँटे और शनि के फलाफल की चर्चा की। कार्यक्रम में कहा गया कि शनि की साढ़ेसाती से लोग काफी भय खाते हैं और माना जाता है कि इसके दौरान जातक को काफी कष्ट उठाना पड़ता है, लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। साढ़ेसाती के दौरान आत्मा की शुद्धि होती है।

यह भी बताया गया कि शनिवार को शनि का दान करने के साथ-साथ माँस और शराब जैसी अभक्ष्य वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। इस संगोष्ठी में कई ज्योतिष विद्वानों ने हिस्सा लिया।
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