मनुष्य के हाथ में अँगूठे का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसका महत्व स्वीकार कर ही गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य के हाथ का अँगूठा माँगकर अर्जुन का कंटक दूर किया था। अँगूठे का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से बताया गया है। चूँकि प्रत्येक कार्य का उद्गम स्थान मनुष्य का मस्तिष्क ही होता है, अतः केवल अँगूठे को ही देखकर मनुष्य के स्वभाव, उसकी प्रकृति तथा मनोवृत्तियों को समझा जा सकता है।
अंगूठे के मुख्यतः तीन भाग होते हैं:- 1. कर्ध्व भाग 2. मध्य भाग 3. अधोभाग
यदि अँगूठा अपने प्रथम जोड़ पर सरलता से पीछे की तरफ मुड़ जाए तो उस व्यक्ति को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि वह व्यक्ति न धन की परवाह करता है और न समय की। ऐसे अँगूठे वाले व्यक्ति हर प्रकार की परिस्थितियों और लोगों के अनुसार स्वयं को बना लेते हैं। ये व्यक्ति अच्छे व्यक्ति के साथ अच्छे और बुरे व्यक्ति के साथ बुरे बन जाते हैं।
अँगूठा सीधा होने के साथ-साथ यदि छोटा और मोटा होता है तो ऐसे व्यक्ति अपने अपमान का बदला अवश्य लेते हैं। सख्त व लंबा अँगूठा फौज के अफसरों के हाथ में देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति सत्यवान, कर्त्तव्यपरायण व वफादार होते हैं।
नरम व लचीला अँगूठा पीछे की ओर झुकने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति सबसे प्रेम करने वाले होते हैं परंतु जिससे नाराज हो जाएँ उससे जीवनभर नहीं बोलते हैं। ऐसे व्यक्ति दिल के कमजोर व बात-बात पर आँसू बहाते हैं। ऐसे व्यक्ति कोई बात छिपाकर नहीं रखते। इनका जीवन एक खुली किताब की तरह रहता है। ये भावुक, दयालु व नम्र स्वभाव के होते हैं। इस प्रकार के अँगूठे के साथ यदि मस्तिष्क रेखा मंगल पर जाती हो तो कठोर होते हैं। यदि मस्तिष्क रेखा चन्द्रमा पर जाती हो तो भावुक, महा-मानव व एकांतप्रिय होते हैं। जीवन के नियमों व सिद्धांतों का पालन निश्चित रूप से करते हैं।
यदि व्यक्ति का अँगूठा प्रथम जोड़ से बेलोच या दृढ़ हो अर्थात् पीछे की तरफ न झुके, ऐसे लोग अधिक व्यावहारिक होते हैं। उनकी इच्छाशक्ति प्रबल होती है और हर कदम सावधानी से उठाते हैं। ये अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए हठधर्मी बन जाते हैं और विरोधी को कुचल डालते हैं।
यदि पहला पोर ढलवाँ, नोकदार अथवा आगे जाकर पतला हो जाए तो ऐसा व्यक्ति अत्यन्त खतरनाक तथा अव्वल नम्बर का स्वार्थी होता है। वह अपने दबाव में अपने मित्रों से अनुचित लाभ उठाने में नहीं चूकता है। यदि अँगूठे का पहला पोर यानी नाखून वाला हिस्सा बहुत छोटा हो तथा अँगूठे का तीसरा पोर शुक्र का क्षेत्र यानी जहाँ अँगूठा हाथ से जुड़ा होता है, वहाँ बहुत उभरा हुआ है तो वह व्यक्ति काम-वासना के वशीभूत होता है। यदि इस प्रकार का हाथ किसी स्त्री का हो तो शीघ्र ही परपुरुष के फंदे में आ जाती है।
पहला पोर मोटा और भारी तथा नाखून चपटा हो तो ऐसे व्यक्ति को बहुत क्रोध आता है। यदि अँगूठे का आगे का हिस्सा बिलकुल गदा की तरह हो तो वह क्रोध आने पर सब कुछ भूल जाता है। उचित-अनुचित का विचार नहीं करता है। ऐसे व्यक्ति क्रोध के आवेश में किसी की हत्या कर सकते हैं।
अँगूठे का दूसरा पोर यानी नाखून वाले पोर से नीचे वाला पोर बहुत लम्बा हो तो जातक किसी पर विश्वास नहीं करता है। वह सुनेगा सभी की, परन्तु करेगा मन की। यदि दूसरा पोर बड़ा हो तो व्यक्ति की तर्क करने की शक्ति अच्छी होती है। यदि पोर की लम्बाई कम हो तो जातक में तर्कशक्ति कम होती है। यदि यह पोर अत्यन्त छोटा हो तो जातक में बुद्धि की कमी होती है। ऐसे आदमी काम पहले करते हैं और सोचते बाद में हैं।
टोपाकार अँगूठा प्रत्येक कार्य में विघ्न उपस्थित करता है। कभी-कभी अँगूठे के अंतिम पोर पर एक गाँठ का रूप ले लेता है। ऐसे व्यक्ति अकसर दो विवाह करते हैं। ऐसे व्यक्ति शक्की विचारों वाले व आलोचना करने वाले होते हैं। क्रोध में आत्महत्या तक करते हैं। अत्याधिक क्रोधी स्वभाव से पारिवारिक जीवन तनावपूर्ण रहता है। यदि हाथ गुलाबी, मस्तिष्क रेखा छोटी, अँगुलियाँ पतली हों तो ऐसे व्यक्ति व्यवहार कुशल, आगे-पीछे का ख्याल रखने वाले व पारिवारिक जीवन सुखमय व्यतीत करते हैं। (क्रमश:)