कौन करेगा देश पर राज?
किसकी बनेगी अगली सरकार
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लाल किताब में पहले भाव को 'राज सिंहासन' एवं सातवें भाव को 'विवाह का घर' कहा गया है। जब भारत आजाद हुआ था तो इन दोनों भावों पर राहु और केतु का कब्जा था। अर्थात यदि सिंहासन है तो पत्नी सुख नहीं और यदि पत्नी सुख है तो सिंहासन नहीं। ज्योतिषियों की आम धारणा ऐसी ही है।
क्या इसका यह मतलब है कि अविवाहित, विधुर, विधवा या पूर्णत: बूढ़े हो चुके लोग ही देश पर राज कर सकते हैं? गलती से कोई विवाहित व्यक्ति भारत के सिंहासन पर विराजमान हो भी जाता है तो इसकी सजा प्रजा को भुगतना होगी। ऐसा माना जाता है, लेकिन यह अभी शोध का विषय है। हम जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर इसमें कितनी सच्चाई है।
आप देखें वर्तमान में मायावती, जयललिता, नरेंद्र मोदी को राज करने का मौका क्यों मिला? पूर्व में अटलबिहारी वाजपेयी, एपीजे अब्दुल कलाम और तमाम ऐसे नाम जिनके जीवन को जानकर शायद हैरत हो। इन सभी ने अन्य विवाहितों की अपेक्षा मजबूती से राज किया और सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में रखें। यदि इस बात में सच्चाई है तो आने वाले निकट भविष्य में नरेंद्र मोदी को भाजपा का अध्यक्ष और मायावती को भारत का प्रधानमंत्री बनने से शायद ही कोई रोक पाए।
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नेहरू के बाद अच्छी तरह से बूढ़े हो चुके गुलजारीलाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे, कुछ माह के लिए। उनके बाद लालबहादुर शास्त्री दो वर्ष के लिए प्रधानमंत्री रहे जिनके काल में पाकिस्तान से युद्ध लड़ा गया। ताशकंद में उनके देहांत के बाद फिर से गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला।
नेहरु के बाद देश में इंदिरा गाँधी ही शक्ति बनकर उभरी जबकि फिरोज गाँधी नहीं रहे। इंदिरा गाँधी के बाद मोरारजी देसाई और उनके बाद चरनसिंह। चरनसिंह के बाद फिर प्रचंड बहुमत से इंदिरा गाँधी सत्ता में आ गईं। दमदार तरीके से नेहरू और फिर इंदिरा के राज करने के पीछे कहीं उनके विधुर और विधवा होने का कारण ही तो नहीं?
इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी प्रचंड बहुमत से सत्ता में तब आए जब सोनिया गाँधी उनके राजनीति में जाने का विरोध करती थीं। राजीव गाँधी राजनीतिक व्यस्तता के चलते अपनी पत्नी से दूर ही रहते थे लेकिन सोनिया गाँधी के मित्र ओटावियो क्वात्रोच्ची के कारण राजीव गाँधी बोफोर्स तोप घोटाले में फँस गए जिसके कारण कांग्रेस की हार हुई और राजीव गाँधी को सत्ता से हटना पड़ा। अर्थात पत्नी के कारण सत्ता गई!
फिर वीपी सिंह बहुत थोड़े समय के लिए आए, लेकिन आरक्षण की आग से देश को जलाकर चले गए। इसके बाद चंद्रशेखर कब आए और चले गए, पता ही नहीं चला। चंद्रशेखर के बाद पीवी नरसिंहाराव ने जरूर सत्ता संभाली, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्रित्व के चलते देश में अराजकता का माहौल रहा और अयोध्या के विवादित ढाँचे के ध्वंस को सभी ने देखा।
नरसिंहाराव के बाद अटलबिहारी वाजपेयी की किस्मत चमकी और वे कुछ समय के लिए आकर कह गए कि मैं पूरे पाँच साल के लिए आऊँगा। फिर देवेगौड़ा और गुजराल ने जैसे-तैसे डेढ़-दो साल गुजारे, तब पुन: आए अटलबिहारी वाजपेयी ने सत्ता संभालते ही पोखरण में तीन विस्फोट करके बता दिया ही मुझ में है दम।
अटलबिहारी वाजपेयी के पाँच साल के कार्यकाल के बाद मनमोहनसिंह पूरी तरह से सोनिया द्वारा प्रायोजित प्रधामंत्री सिद्ध हुए अर्थात सत्ता की बागडोर तो सोनिया के हाथ में ही थी तभी तो पाँच वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा किया।
अब यदि इस सबका आकलन करें तो उक्त सभी को सत्ता सुख के दौरान पत्नी सुख कभी नहीं मिला और यदि मिला तो जनता त्रस्त रही।
जिन्नाह की बात हम कर ही चुके हैं। बेनजीर भुट्टो के प्रधानमंत्रित्वकाल में उनके पति विवादों के चलते उनसे दूर ही रहे, अंतत: उन्हें जेल हो गई। नवाज और मुशर्रफ के काल में आतंकवाद को बढ़ावा मिला और अब आसिफ अली जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी तक आते-आते देश तबाही के रास्ते पर हैं।
बांग्लादेश में मुजीब-उर-रहमान, अबु सदाब मोहम्मद सैयद, अजीज-उर-रहमान, खालिदा जिया और शेख हसीना का ही कार्यकाल ज्यादा रहा है। खालिदा भी प्रधानमंत्री तब बनीं जब उनके शौहर जिया-उर-रहमान का निधन हो चुका था। शेख हसीना भी प्रधानमंत्री रहीं लेकिन मुजीब-उर-रहमान के निधन के बाद।
अंतत: हम भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के जीवन का अवलोकन करें तो निश्चित ही यह तथ्य उभरकर आएगा कि उक्त देशों में अविवाहितों, विधवाओं, विधुरों या उन बूढ़े लोगों का राज रहा जिनके जीवन से पत्नी या पति सुख जाता रहा। यदि सुख बरकरार रहा तो फिर राज्य में अशांति फैलती गई।
वर्तमान में लोकसभा चुनाव के संदर्भ में भावी प्रधानमंत्री के बारे में विचार करें तो राहुल गाँधी, मायावती, नरेंद्र मोदी, अविवाहित हैं। सोनिया गाँधी विधवा हैं। चूँकि यह देखा गया है कि अविवाहित, विधवा या विधुरों ने राजकाज अपनी मनमर्जी और मजबूती से किया है तो क्या यह मान लें कि लालकृष्ण आडवाणी की दाल नहीं गलने वाली है? या हो सकता है कि सोनिया द्वारा हाँके जाने वाले मनमोहनसिंह जी एक बार फिर प्रधानमंत्री बन बैठे?

