हनुमानजी को खाना चाहता था सम्पाती, कई किलोमीटर देखकर माता सीता का हाल बताया

राम के काल में सम्पाती और जटायु नाम के दो गरूड़ थे। ये दोनों ही देव पक्षी अरुण के पुत्र थे। दरअसल, प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। द्वारा जब सीता का हरण कर ले जाया जा रहा था तब जटायु ने ही रावण का मार्ग रोका था। रावण से जटायु का युद्ध हुआ और जटायु घायल होकर बाद में मृत्यु को प्राप्त हुआ। जटायु ने ही प्रभु श्रीराम को बताया था कि किसने हरण क्या और किस दिशा में वह गया है। जटायु को श्रीराम की राह में शहीद होने वाला पहला सैनिक माना जाता है।

जटायु का भाई था सम्पाती। सम्पाती बड़ा था और जटायु छोटा। ये दोनों विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे और संपूर्ण दंडकारण्य क्षेत्र विचरण करते रहते थे। जटायु से राजा दशरथ का परिचय पंचवटी (नासिक) में हुआ था। तभी से वे दोनों मित्र थे। वनवास के समय जब भगवान श्रीराम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे, तब पहली बार जटायु से उनका परिचय हुआ।

सम्पाती से हनुमान का सामना : में यह कथा मिलती है कि जामवंत, अंगद, हनुमान आदि जब सीता माता को ढूंढ़ने जा रहे थे तब मार्ग में उन्हें बिना पंख का विशालकाय पक्षी सम्पाती नजर आया। यह बहुत ही विशाल और शक्तिशाली था। कई दिनों से इसने खाना नहीं खाया थाल जब इसने हनुमान, अंगद और जामवंत को देखा तो वह उन्हें खाने के लिए लपका। लेकिन जामवंत ने उस पक्षी को तुरंत ही रामव्यथा सुनाई और अंगद आदि ने उन्हें उनके भाई जटायु की मृत्यु का समाचार दिया। यह समाचार सुनकर सम्पाती दुखी हो गया।

सम्पाती ने तब उन्हें बताया कि हां मैंने भी रावण को सीता माता को ले जाते हुए देखा था। दरअसल, जटायु के बाद रास्ते में सम्पाती के पुत्र सुपार्श्व ने सीता को ले जा रहे रावण को रोका था और उससे युद्ध के लिए तैयार हो गया। किंतु रावण उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा और इस तरह वहां से बचकर निकल आया।

हुआ यूं था कि पंख जल जाने के कारण संपाती उड़ने में असमर्थ था, इसलिए सुपार्श्व उनके लिए भोजन जुटाता था। एक शाम सुपार्श्व बिना भोजन लिए अपने पिता के पास पहुंचा तो भूखे संपाती ने मांस न लाने का कारण पूछा तो सुपार्श्व ने बतलाया- 'कोई काला राक्षस सुंदर नारी को लिए चला जा रहा था। वह स्त्री 'हा राम, हा लक्ष्मण!' कहकर विलाप कर रही थी। यह देखने में मैं इतना उलझ गया कि मांस लाने का ध्यान नहीं रहा।'

अर्थात सम्पाती ने तब अंगद को रावण द्वारा सीताहरण की पुष्टि की। सम्पाती रावण से इसलिये नहीं लड़ सका क्योंकि वह बहुत कमजोर हो चला था क्योंकि सूर्य के ताप से उनके पंख जल गए थे। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया था।


सम्पाती ने दिव्य वानरों अंगद और हनुमान के दर्शन करके खुद में चेतना शक्ति का अनुभव किया और अंतत: उन्होंने अंगद के निवेदन पर अपनी दूरदृष्टि से कई किलोमीटर दूर समुद्र के पार देखकर बताया कि सीता माता अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं। सम्पाती ने ही वानरों को लंकापुरी जाने के लिए प्रेरित और उत्साहित किया था। इस प्रकार रामकथा में सम्पाती ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अमर हो गए।

संदर्भ :
*वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड,सर्ग 56-58, 59 तथा 61, 62, 63
*महाभारत, वनपर्व (282-46-57)

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