ईंट के भट्टों से इंटरनेट के आकाश तक

कोमल हाथों से पहचान गढ़ते मजदूर बच्चे

स्मृति आदित्य| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (19:03 IST)
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मासूम खिलखिलाहट बनी रहे
बाल सजग टीम
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वॉल से ब्लॉग तक 'बाल सजग'
दीवारों पर अपने भावों की शब्द-आकृतियाँ रचते हुए इन नन्हे कलमकारों ने कभी सोचा नहीं था कि उनके हाथों में एक दिन शहरी बच्चों की तरह वह माऊस और की-बोर्ड होगा और उनकी रचनाएँ इंटरनेट के जरिए देश के अखबारों तक पहुँच जाएगी। 13 वर्षीय अशोक और 12 वर्षीय को उनकी रूचि के आधार पर 'बाल-सजग' वॉल मैग्जीन के क्रमश: संपादक और उप-संपादक बनाया गया।

'अपना घर' के संचालक ने ब्लॉग के बारे में सुना तो धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी बढ़ी कि आखिर यह क्या है? इंटरनेट पर जाकर उन्होंने पाया कि बच्चों के लिए लिखने वाले तो बहुत हैं और बच्चों जैसा लिखने वाले भी कम नहीं। बस कमी है तो इस बात की कि बच्चे खुद अपने लिए नहीं लिख रहे हैं।

एक-दो ब्लॉग वैसे मिले भी तो जाहिर है कि उस बचपन के जो सुख, सुविधा और संसाधनों से संपन्न है। महेश बाल-सजग पत्रिका के सहयोगी तो थे ही। उन्होंने पहले स्वयं सारी चीजें सीखी, समझी और जानी फिर 'अपना घर' के 12 बच्चों से बातचीत कर उनके मन टटोले। बच्चों के लिए यह किसी अजूबे से कम नहीं था।

छोटी उम्र में बड़ी जिम्मेदारी
13 वर्षीय संपादक कहते हैं, शुरू में तो डर लगा था कि कंप्यूटर का अखबार कैसा होता है। हम कैसे करेंगे सब, कहीं गलत बटन दब गया तो ?हमने तो कभी कंप्यूटर देखा भी नहीं था। पर अब सब आ गया है।

और कदम बढ़ ही गए
संकोच और झिझक का दौर खत्म हुआ तो आईआईटी के कुछ प्रोफेसर जुड़े। कुछ सहयोग राशि जुटाई। एक कंप्यूटर और एक लैपटॉप आया। महेश पांडेय ने जानकारी एकत्र की कि कैसे ब्लॉग बनेगा और कैसे एग्रीगेटर में उसे रजिस्टर किया जाए। बच्चों को पूरी ट्रेनिंग दी।

इंटरनेट क्या होता है से लेकर इंटरनेट के इस्तेमाल तक, टाइपिंग, कन्वर्वर्टर और अपलोडिंग-पोस्टिंग तक। महेश को इस काम में पूरे 6 महीने लगे। ब्लॉग का नाम वॉल मैग्जीन के आधार पर ही रखा गया 'बाल सजग'। एडिटर अशोक कुमार और सब एडिटर ज्ञान का काम तय हुआ कि वे वॉल मैग्जीन से रचनाओं का शनिवार को चयन करेंगे और रविवार को उन्हें संशोधित कर पोस्ट करेंगे।

बाल संपादक अशोक कुमार
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बाल संपादक अशोक कुमार ने हमें बताया 'हमारे स्कूल का समय 10 बजे से 4.30 तक है। हम हर रोज एक घंटा अपने ब्लॉग को देते हैं। रात के 9 बजे से 10 बजे तक अगर कभी एक दिन नहीं दे पाते हैं तो दूसरे दिन सुबह सात से आठ बैठते हैं।

हमें खूब सारे ई-मेल आते हैं उनका जवाब भी देते हैं। अभी तक तो हम हमारी पत्रिका बाल सजग में लगी कविता और कहानी उठाते हैं उनको ठीक- ठाक करते हैं और फिर पोस्ट करते हैं। हम 12 बच्चे हैं और सब टाइप भी कर लेते हैं। अब हम सोच रहे हैं कि ब्लॉग में कुछ इंटरव्यू भी लेकर डालें और कुछ न्यूज टाइप की चीजें भी।

हमारे एक साथी आशीष ने अपना अलग ब्लॉग बनाया है। उसका नाम रखा है 'डेंजर स्कूल'। क्योंकि कभी-कभी स्कूल में टीचर बिना बात के हमारी पिटाई कर देते हैं और हमको समझ में नहीं आता इसलिए इसका नाम डेंजर स्कूल रख दिया। इसमें यह सारे किस्से हैं कि टीचर को कैसे चिढ़ाते हैं और सारी मस्ती जो हम स्कूल में करते हैं सब आशीष ने डेंजर स्कूल ब्लॉग में डाली है।

नन्ही सोच : गहरी समझ
बाल सजग ग्रुप के सबसे छोटे सदस्य हैं पाँचवी क्लास के चंदन। उनके माता पिता जिस समाज से हैं वहाँ स्त्री-पुरुष दोनों शराब पीते हैं। दिवाली की छुट्टियों में चंदन ने घर जाकर देखा कि दिवाली वाले दिन दोनों ने खूब शराब पी। चंदन ने माँ को रोका और सच में माँ के हाथ रूक गए। चंदन ने घर से लौटकर एक रिपोर्ट बनाई और उसमें लिखा मैंने इस बार एक अच्छा काम किया अपनी माँ को शराब पीने से रोका और वो मान गई।

मैंने पटाखे भी नहीं छुड़ाए, खूब मन था तब भी नहीं। क्योंकि इन पटाखों को हम जैसे छोटे-छोटे बच्चे बनाते हैं और पटाखे बनाते हुए वे मर भी जाते हैं। हम पटाखे नहीं छुड़ाएँगे तो उन बच्चों को बनाना भी नहीं पड़ेगा।

यह दर्द मासूम चंदन तक इसलिए पहुँच पाया क्योंकि उसने ईंट के भट्टों की तपन को नजदीक से देखा है। हथेली के छालों को बिना मरहम के फूटते हुए सहा है। दिवाली के शोर में खुशियों में डूबे क्या कभी हम बुद्धिजीवी उतना दूर तक कभी सोच पाए हैं? जबकि हर वर्ष पटाखों की नगरी शिवाकाशी के जलते आँकड़े अखबारों में हमारे सामने होते हैं।

संचालक महेश पांडेय
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संचालक महेश पांडेय खुश हैं
महेश पांडेय ने हमसे विस्तृत चर्चा की। वे अब खुद ब्लॉग को उतना समय नहीं दे पाते हैं। उनके अनुसार,'सारा काम बच्चे ही देखते हैं। मुझे खुशी है कि इन बच्चों के बहाने परिवर्तन की धीमी मगर सुखद बयार चल पड़ी है। वे बंधुआ मजदूर जो पहले बच्चों के स्कूल से नाराज थे अब इंटरनेट जैसी चीजों तक उनके पहुँचने से आश्चर्य और खुशी से स्तब्ध है।

वे माँ-बाप, जो बच्चों को स्कूल भेजने के नाम पर कतराते थे अब आगे बढ़कर उन्हें पढ़ाना चाह रहे हैं। बाल सजग अब 12 से 20 बच्चों का ग्रुप बन गया है। मैं तो एक माध्यम हूँ, सबके सहयोग और बच्चों की लगन से यह संभव हुआ है। ‍विजयाजी, आईआईटी के प्रोफेसर,स्टूडेंट्स, आशा ट्रस्ट और दयालु लोगों की मदद से यह सब अच्छे से चल रहा है।

बाल दिवस और बाल सजग
बाल दिवस के अवसर पर यह आकर्षक ब्लॉग हमें एक मीठी मुस्कान देता है कि वे बच्चे जो कल तक तपती ईंट-भट्टियों में अपने बचपन को स्वाहा होते देख रहे थे आज इतने सजग हो गए हैं कि अपनी सोच को सार्थक दिशा दे पा रहे हैं। बाल सजग की टीम को सलाम। बाल-दिवस पर हर यह ब्लॉग हर बच्चे की प्रेरणा बनेगा, हम यह चाह रहे हैं, यही आप भी सोच रहे हैं।

आपकलिब्लॉलिंक :
http://balsajag.blogspot.com/
http://dangerschool.blogspot.com/
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