जंगल से एकतरफा संवाद- भाग 1


Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (16:46 IST)
- के हिमालयी से लौटकर सचिन कुमार जैन
 
 
जब आस-पास शोर नहीं होता, तो डर क्यों लगता है? सन्नाटे और शांति में, चिंतन और शोर में थोड़ा नहीं, वरन् बुनियादी अंतर होता है। जिस तरह का शोर हमारे भीतर भरा हुआ है, वह हमें चेतना से दूर हटाता है। वह हमें शांति से डरने के लिए तैयार करता है। जो अहसास पैदा करता है वह भीतर बसी हिंसा की रचना होती है। शायद इसलिए क्योंकि तब हम केवल अपने साथ होते हैं। खुद को देखना और खुद से बात करना, खुद में झांकना डराता है। 
 
मैंने जो जंगल देखा, बिलकुल अनछुआ-सा था। नेपाल में हिमालय के रिश्तेदार पहाड़ों पर बसे यह जंगल इस बात का भी प्रमाण हैं कि जब उन्हें जीने दिया जाता है तो वे कितने विशाल, भव्य और आभावान हो सकते हैं। शुरू में उनकी सघनता से मेरा संघर्ष होता रहा। आखिरकार मैं उनके भीतर झांकने की कोशिश जो कर रहा था। जहां वो सूरज की रोशनी को प्रवेश नहीं करने दे रहे थे, मेरी नजरों को भला कैसे भीतर जाने देते। फिर भी मैं चुपके से उनमें प्रवेश कर गया। पूरा न जा सका। टुकड़ों-टुकड़ों में गया। 
 
हर दरख्त अपने आपमें एक पूरा जंगल, नहीं पूरा जीवन बना हुआ था। कोई पेड़ अकेला नहीं था। किसी पर छोटे पत्तों की बेलें चढ़ी हुई थीं, किसी पर बड़े पत्तों की बेलें। जिनकी बड़ी डगालें टूट गई थीं, वहां डगालें टूटने से गड्ढे़ बन गए थे। उनमें किन्ही दूसरी प्रजाति पेड़ भी उग आए थे। किसी पेड़ ने उन्हें यह कहकर रोका नहीं कि मेरे शरीर पर मत उगो। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि तुम्हारा रंग मुझ जैसा नहीं या तुम्हारी जाति कुछ और है। 
 
 
उनकी वरिष्ठता का अंदाजा मैंने उन पर चढ़ी काई की मोटी परत से लगाया। कुछ पर गहरी हरी काई की परत जम चुकी है। यह काई पेड़ का श्रृंगार करती है। घोंघे, इल्लियां और मकड़ी उन्हें गुदगुदाते रहते हैं। वे पत्ते भी खा लेते हैं। पेड़ नए पत्ते पैदा कर देता। अगर काई संक्रामक बीमारी का स्रोत है, तो जंगल खड़ा कैसे है? उसे तो सूख जाना चाहिए था। अक्सर मैंने देखा अधूरी खाकर छोड़ी गई पत्तियों को, जो छोड़ दी गईं थीं ठीक वैसे ही, जैसे हमारे बच्चे छोड़ देते हैं खाना। 
 
जंगल का मतलब केवल शेर, चीते या भालू जैसे जानवर तक सीमित नहीं हो सकता। यह तो जंगल के कुछ हिस्से हैं। घने जंगल की झाडियों में जंगली मुर्गों की अचानक हुई हलचल ने मुझे उतना ही चौंकाया था, जितना कोई और बड़ा जानवर चौंकाता। सैंकड़ों तरह के पंछी, कुकुरमुत्ते, मकड़ियां, इल्लियां, घोंघे, काई, घांस, मिट्टी, पत्थर, पेड़-पौधे, जमीन से बाहर निकल आई जड़ें, झींगुर, ऊंचाई और गहराई, टुकड़ों में धूप और कुछ टुकड़े छांव, नमी के साथ टहलती हवा, सन्नाटे के बीच तेज ध्वनियां और वहां रहने वाले इंसान, यह सब मिल कर जो दुनिया बनाते हैं, वही तो जंगल है। 
 
जब मैं वहां पंहुचा तो ऐसा लगा मानों अभी थोड़ी देर पहले ही कोई आया था और हर पत्ती को, हर तने को, घांस के हर तिनके को धो-पोंछ कर चमका कर गया है। कोई तो आता है यहां, जिन्होंने पत्थरों को सुन्दर से सुन्दर आकर दिए हैं। हर पत्थर का एक खास आकार, गोल, तिकोना, चतुष्कोण और पता नहीं कितने कोण... यकीन मानिए गोलाई भी एक प्रकार की नहीं होती। गोलाई लिया हर पत्थर दूसरे गोल पत्थर से भिन्न होता है। यहां मुझे पता चला कि हमें तो किताबों में कुछ ही आकारों के बारे में पढ़ाया गया है, यहां तो हजारों-लाखों प्रकार के आकर दिखाई देते हैं। हर पत्थर का एक खास आकार। जरूरी नहीं कि उसे कोई नाम दिया ही जाए।
 
 

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