कैंटीन का पानी, चिंटू, गुलाबो और ज्ञान की बातें
- स्वाति शैवाल
कॉलेज की पार्किंग में लगे दुपहियों पर बैठे बीबीए द्वितीय वर्ष के चार दोस्त, शोभित पटेल, सनी काबरा, श्रेया गौतम तथा सुरभि माहेश्वरी बातचीत में व्यस्त हैं। मैं भी चुपके से इसका हिस्सा बन जाती हूँ। और हमारी बातें समाज में आए परिवर्तनों तक पहुँच जाती हैं। सभी का मानना है कि पिछले 20-22 सालों में समाज का रवैया काफी बदला है और यह बदलाव दिखाई देने लगा है।
लड़कियों के लिए बनाए गए दायरे अब विस्तृत हो रहे हैं। 'नो बाऊंडेशंस एट ऑल।' ये सभी दोस्त इस बदलाव से खुश हैं। हालाँकि इनका ये भी मानना है कि पूरी तरह विकसित मानसिकता का होने के लिए अभी भी समाज को काफी प्रयत्न करने हैं। खासतौर पर अरैन्ज्ड मैरिज और लव मैरिज के बीच खिंची खाई अब भी दिमागी रूप से पाटी नहीं जा सकी है। यहाँ अब भी कई संकीर्णताएँ मौजूद हैं।
मैं इन दोस्तों की बातों का मंथन करते हुए आगे बढ़ती हूँ। आगे पियुष खोसला, जय कमल, अनिल खिल्लारी, गिरीराज साहू तथा अरुण माहेश्वरी खड़े बतिया रहे हैं, ठीक कैंटीन के सामने। मेरे वहाँ जाने और बातचीत शुरू करने पर इस समूह में अर्णिमा जैन, श्रृति बासरकर, हिमानी कर्णिक तथा रुचिरा बुरहानपुरकर भी शामिल हो जाती हैं। 'कैंटीन में क्या सबसे अच्छा मिलता है?' पूछने पर समवेत स्वर में उत्तर मिलता है-'पानी' और एक जोरदार ठहाके में मैं भी शामिल हो जाती हूँ। इस ग्रुप में कुछ लोग राजगढ़ (ब्यावरा) तथा देवास जैसी जगहों से भी हैं, जो होस्टल में रहते हैं।
पता चलता है कि कैंटीन वाले भईया ने फिलहाल काफी सारी आवाजों के उठने के बाद अब मंचूरियन भी बनाना शुरू कर दिया है। वैसे कैंटीन वाले भईया कुछ अच्छा बनाएँ न बनाएँ, चिंता किसको है। क्योंकि इस इलाके में खाने-पीने के खासे और अच्छे "ठिए" हैं। सो मन को न भाए कैंटीन का खाना, तो आसान है बाहर जाकर पेट-पूजा करना। मौज-मस्ती के इन दिनों में बीसीए तृतीय वर्ष के ये सभी स्टूडेंट्स, फिलहाल जॉब मार्केट में चल रहे हालात से बहुत खुश तो नहीं लेकिन उनका विश्वास है कि कुछ महीनों में हालात अच्छे हो जाएँगे।
मैं अब कैंटीन का रुख करती हूँ और पहली ही टेबल पर ग्रुप बनाकर पराठे-सब्जी का लुत्फ उठा रहे एमबीए के विद्यार्थी, अमिता सिंह, शोभित गुप्ता, आज़ाद जैन, प्रियंका विश्वकर्मा तथा अर्शी जैन मुझे अपने साथ शामिल होने का अवसर देते हैं। अब फिर एक बार बात चल पड़ी है देश और समाज के विकास की।
शोभित और अमिता दोनों का ही मानना है कि असल सामाजिक विकृतियाँ तथा रुढ़ियाँ साक्षरता से ही दूर होंगी और यह साक्षरता सिर्फ अक्षर ज्ञान से नहीं आँकी जानी चाहिए। ये सभी मानते हैं कि देश में पिछले सालों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। जरूरत अब सिर्फ मानसिक रूप से परिपक्व होने की है।
अवसरों में पहले से काफी बढ़ोत्तरी हुई है, दिमागी रूप से कुछ हद तक बेड़ियाँ कटी हैं लेकिन ये सबकुछ कुछ प्रतिशत ही है। अब भी हमें बहुत सारी समस्याओं के बारे में जमीनी काम की जरूरत है। अब बातचीत में पल्लवी राहलकर भी शामिल हो जाती हैं। गंभीर मुद्दों के बीच अचानक हम मुड़ जाते हैं कुछ मजेदार बातों की ओर। इन लोगों ने अपने सीनियर्स को मजाक में चंगू-मंगू और छोटा पेप्सी कोला जैसे खिताबी नाम भी दे डाले हैं। वहीं एक शिक्षिका महोदया को भी 'गुलाबो' नाम से नवाजा गया है। ये इनकी क्रिएटिविटी का महज एक नमूना है।
वैसे क्रिएटिविटी के मामले में पहले मिले विद्यार्थी भी कम नहीं थे। वहाँ भी मुझे अध्यापकों को दिए गए 'चिंटू' और 'गोलू-मोलू' जैसे नामों के बारे में पता चला था।... खैर... अगर ये सब न हो तो शायद सिर्फ किताबों में लिखी इबारतें जिंदगी को भी काला-सफेद ही बना डालें। असली रंग तो इन्हीं छोटी-छोटी शरारतों से बिखरते हैं।
बात बिलकुल सही है कि पुरानी जींस और कॉलेज के कैंटीन की चाय का मुकाबला न तो ब्राँडेड कपड़े कर सकते हैं, न ही पाँच सितारा होटल की कॉफी। इसलिए कॉलेज के दिनों को हर कोई बार-बार स्मृतियों में गोते लगाकर जीना चाहता है।
और आने के लिए वापस मुड़ते समय, गाड़ी को किक लगाते-लगाते अचानक उत्साह से भरी एक युवती की आवाज़ मेरे कानों में टकराती है-'यार मेरा भी टेंशन तू ले लिया कर...और थोड़ी देर पहले तक एक्ज़ाम्स का टेंशन लेकर चल रही उस युवती की मित्र खिलखिला कर हँस पड़ती है।' काश..! जिंदगी के सारे टेंशनों का इस तरह हँसी के साथ 'ट्रांसफर' हो सके, तो क्या बात है...?
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NDलड़कियों के लिए बनाए गए दायरे अब विस्तृत हो रहे हैं। 'नो बाऊंडेशंस एट ऑल।' ये सभी दोस्त इस बदलाव से खुश हैं। हालाँकि इनका ये भी मानना है कि पूरी तरह विकसित मानसिकता का होने के लिए अभी भी समाज को काफी प्रयत्न करने हैं। खासतौर पर अरैन्ज्ड मैरिज और लव मैरिज के बीच खिंची खाई अब भी दिमागी रूप से पाटी नहीं जा सकी है। यहाँ अब भी कई संकीर्णताएँ मौजूद हैं।
मैं इन दोस्तों की बातों का मंथन करते हुए आगे बढ़ती हूँ। आगे पियुष खोसला, जय कमल, अनिल खिल्लारी, गिरीराज साहू तथा अरुण माहेश्वरी खड़े बतिया रहे हैं, ठीक कैंटीन के सामने। मेरे वहाँ जाने और बातचीत शुरू करने पर इस समूह में अर्णिमा जैन, श्रृति बासरकर, हिमानी कर्णिक तथा रुचिरा बुरहानपुरकर भी शामिल हो जाती हैं। 'कैंटीन में क्या सबसे अच्छा मिलता है?' पूछने पर समवेत स्वर में उत्तर मिलता है-'पानी' और एक जोरदार ठहाके में मैं भी शामिल हो जाती हूँ। इस ग्रुप में कुछ लोग राजगढ़ (ब्यावरा) तथा देवास जैसी जगहों से भी हैं, जो होस्टल में रहते हैं।
पता चलता है कि कैंटीन वाले भईया ने फिलहाल काफी सारी आवाजों के उठने के बाद अब मंचूरियन भी बनाना शुरू कर दिया है। वैसे कैंटीन वाले भईया कुछ अच्छा बनाएँ न बनाएँ, चिंता किसको है। क्योंकि इस इलाके में खाने-पीने के खासे और अच्छे "ठिए" हैं। सो मन को न भाए कैंटीन का खाना, तो आसान है बाहर जाकर पेट-पूजा करना। मौज-मस्ती के इन दिनों में बीसीए तृतीय वर्ष के ये सभी स्टूडेंट्स, फिलहाल जॉब मार्केट में चल रहे हालात से बहुत खुश तो नहीं लेकिन उनका विश्वास है कि कुछ महीनों में हालात अच्छे हो जाएँगे।
मैं अब कैंटीन का रुख करती हूँ और पहली ही टेबल पर ग्रुप बनाकर पराठे-सब्जी का लुत्फ उठा रहे एमबीए के विद्यार्थी, अमिता सिंह, शोभित गुप्ता, आज़ाद जैन, प्रियंका विश्वकर्मा तथा अर्शी जैन मुझे अपने साथ शामिल होने का अवसर देते हैं। अब फिर एक बार बात चल पड़ी है देश और समाज के विकास की।
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NDअवसरों में पहले से काफी बढ़ोत्तरी हुई है, दिमागी रूप से कुछ हद तक बेड़ियाँ कटी हैं लेकिन ये सबकुछ कुछ प्रतिशत ही है। अब भी हमें बहुत सारी समस्याओं के बारे में जमीनी काम की जरूरत है। अब बातचीत में पल्लवी राहलकर भी शामिल हो जाती हैं। गंभीर मुद्दों के बीच अचानक हम मुड़ जाते हैं कुछ मजेदार बातों की ओर। इन लोगों ने अपने सीनियर्स को मजाक में चंगू-मंगू और छोटा पेप्सी कोला जैसे खिताबी नाम भी दे डाले हैं। वहीं एक शिक्षिका महोदया को भी 'गुलाबो' नाम से नवाजा गया है। ये इनकी क्रिएटिविटी का महज एक नमूना है।
वैसे क्रिएटिविटी के मामले में पहले मिले विद्यार्थी भी कम नहीं थे। वहाँ भी मुझे अध्यापकों को दिए गए 'चिंटू' और 'गोलू-मोलू' जैसे नामों के बारे में पता चला था।... खैर... अगर ये सब न हो तो शायद सिर्फ किताबों में लिखी इबारतें जिंदगी को भी काला-सफेद ही बना डालें। असली रंग तो इन्हीं छोटी-छोटी शरारतों से बिखरते हैं।
बात बिलकुल सही है कि पुरानी जींस और कॉलेज के कैंटीन की चाय का मुकाबला न तो ब्राँडेड कपड़े कर सकते हैं, न ही पाँच सितारा होटल की कॉफी। इसलिए कॉलेज के दिनों को हर कोई बार-बार स्मृतियों में गोते लगाकर जीना चाहता है।
और आने के लिए वापस मुड़ते समय, गाड़ी को किक लगाते-लगाते अचानक उत्साह से भरी एक युवती की आवाज़ मेरे कानों में टकराती है-'यार मेरा भी टेंशन तू ले लिया कर...और थोड़ी देर पहले तक एक्ज़ाम्स का टेंशन लेकर चल रही उस युवती की मित्र खिलखिला कर हँस पड़ती है।' काश..! जिंदगी के सारे टेंशनों का इस तरह हँसी के साथ 'ट्रांसफर' हो सके, तो क्या बात है...?
