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हिमालय पर ध्यान
हिमालय के एक दृश्य पर ध्यान कीजिए
- स्वामी ज्योतिर्मयानंद

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आपके सामने एक चित्र रखा गया है जिसमें हिमालय के ब्रह्मपुत्र घाटी का आकर्षक दृष्य है। चीड़ के लम्बे पेड़, हरे खेत, घुमावदार रास्ते, इनके साथ-साथ पर्वत से गिरती हुई शुद्ध जल वाली एक नदी और इन सबों से भी सुंदर इन के पीछे एक के बाद दूसरी हिमालय की बर्फिली चोटियाँ। ये पर्वत हरे जंगलों से ढ़के हुए हैं। जब आप पर्वत श्रृंखला से अपनी दृष्टि ऊपर उठाते हैं तो अनंत नीले आकाश में सफेद चाँदी की आभा लिए बादलों का समूह दृष्टिगोचर हो रहा है।

इस मनोहारी दृष्य को निहारते हुए अपने शरीर को सीधा और तनाव रहित रखें। आपकी आँखें जब इस दृष्य को देखते हुए थक जाए तो आँखे बंद कर इस सुंदरता को मन में निहारें। यदि किसी अंश को आप मानसिक रूप से नहीं देख पाते हैं, तो आँखें खोलकर उन्हें देख लीजिए और फिर आँख बंद कर मानसिक रूप से उसे देखने का प्रयास कीजिए।

कुछ देर के पश्चात पुन: इस चित्र को देखिए। परंतु इस बार यह अनुभव कीजिए कि आप चित्र में जो कुछ भी देख रहे हैं वह सब जीवंत और प्राणवान है। आप इस सजीव दृष्य के एक अंग बन गए हैं। वृक्ष अब मृत रेखाचित्र नहीं हैं वे पर्वत चोटियों से आ रही ताजी हवा में साँस ले रहे हैं और झूम रहे हैं। तेज हवा के झोकों से हरा-भरा जंगल नृत्य कर रहा है। नदी की कल-कल धारा एक सुमधुर संगीत का सृजन कर रही है।

और समस्त घाटी अबोध शिशु के समान इस मधुर संगीतमय लोरी में मानों आँखे बंद कर सो रही है। सरिता का अत्यंत शीतल और पवित्र जल छोटी-छोटी भँवरों का निर्माण कर पर्वत-चट्टानों के साथ अटखेलियाँ कर रहा है। आप मीठे जल का स्वाद ले रहे हैं। उसकी स्फूर्तिदायी शीतलता का अनुभव कर रहे हैं।

शक्ति की इस उड़ान का आप आनंद ले रहे हैं। अब आप पर्वत पर चढ़ना आरंभ करते हैं। आपको अब घाटी का विस्तृत क्षेत्र दिखाई पड़ रहा है। इस प्रकार आप इस हिमालय के दृष्य के साथ एकाकार हो चुके हैं। आँख बंदकर प्रकृति के साथ इस एकात्मता का अनुभव करते रहें।

साभार : धारणा और ध्यान
सौजन्य : इंटरनेशनल योग सोसायटी, लाल बाग लोनी, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)
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