माँ एक अनुभूति, एक विश्वास, एक रिश्ता नितांत अपना सा। गर्भ में अबोली नाजुक आहट से लेकर नवागत के गुलाबी अवतरण तक, मासूम किलकारियों से लेकर कड़वे निर्मम बोलों तक, आँगन की फुदकन से लेकर नीड़ से सरसराते हुए उड़ जाने तक, माँ मातृत्व की कितनी परिभाषाएँ रचती है। स्नेह, त्याग, उदारता औदार्य और सहनशीलता के कितने प्रतिमान गढ़ती है? कौन देखता है? कौन गिनता है भला? और कैसे गिने? ऋण, आभार, कृतज्ञता जैसे शब्दों से परायों को नवाजा जाता है। माँ तो अपनी होती है, बहुत अपनी सी। हम स्वयं जिसका अंश हैं, उसका ऋण कैसे चुकाएँ... |