बोली का क्षेत्र सीमित होता है। कालांतर में यह विकसित होते-होते एक समृद्ध भाषा बन गई। भाषा के रूप में इसका क्षेत्र विस्तृत होता गया। हमारी हिन्दी भाषा में प्रचुर साहित्य उपलब्ध है। सभी विधाओं में साहित्य लिखा हुआ है। जैसे कहानी, कविता, नाटक, उपन्यास आदि।
इन विधाओं के लेखकों को महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। एक और मजेदार बात यह है कि हिन्दी भाषा में अन्य भाषाओं के भी शब्द हैं। जैसे फारसी, अरबी आदि। कुछ शब्द तो बिलकुल वैसे ही प्रयोग में लाए जाते हैं तो कुछ सरलीकृत करके व्यवहार में लाते हैं। पर अब वे अलग प्रतीत ही नहीं होते, इतने घुल-मिल गए हैं।
हिन्दी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्रभाषा है। इसे बोलने वालों का प्रतिशत 65 से भी अधिक है। हमारी हिन्दी भाषा की एक विशेषता यह भी है कि हमारे देश में रहने वाले भारतीय लोग किसी भी प्रांत के रहने वाले हो उनकी कोई भी भाषा मातृभाषा हो, वे हिन्दी समझते हैं और किसी न किसी रूप में व्यवहार में लाते हैं।
हर भाषा का एक वैज्ञानिक रूप होता है। उसी प्रकार हिन्दी भाषा का भी विज्ञान है और इस भाषा को विज्ञान की दृष्टि से ब्रजभाषा, अवधी, बैसवाडी तथा बुंदेली हिन्दी की बोलियों के रूप में स्वीकार है। राजस्थानी, भोजपुरी, मगही तथा मैथिली व्यवहार की दृष्टि से उसकी बोलियाँ मानी जाती हैं।
किसी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम तथा संघर्ष करना पड़ता है। हमारी हिन्दी भाषा भी कड़े संघर्षों के बाद वर्तमान स्थिति तक पहुँची है। हिन्दी को कभी राज्याश्रय प्राप्त नहीं हुआ है। हम हमारे देश के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि इस काल में संस्कृत भारत की राष्ट्रभाषा थी। हिमालय से कन्याकुमारी तथा असम से लेकर सौराष्ट्र तक संपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक विचार विनिमय तथा चर्चाएँ संस्कृत भाषा द्वारा होती थीं।
आद्य गुरु शंकराचार्य ने अपने दार्शनिक सिद्धांतों का विवेचन इसी भाषा के माध्यम से किया था। इसके बाद धीरे-धीरे संस्कृत का महत्व क्षीण हुआ। शासकों, फौजी, व्यापारियों तथा धर्म प्रचारकों की भाषा हिन्दी बनी। समस्त उत्तर भारत में उस समय हिन्दी ही बोलचाल की भाषा थी।
हिन्दी भाषा के विकास में संतों, महात्माओं तथा उपदेशकों का योगदान भी कम नहीं आँका जा सकता है। क्योंकि ये आम जनता के अत्यंत निकट होते हैं। इनका जनता पर बहुत बड़ा प्रभाव होता है। उत्तर भारत के भक्तिकाल के प्रमुख भक्त कवि सूरदास, तुलसीदास तथा मीराबाई के भजन सामान्य जनता द्वारा बड़े शौक से गाए जाते हैं। इसकी सरलता के कारण ही ये कई लोगों को कंठस्थ हैं।
इसका प्रमुख कारण हिन्दी भाषा की सरलता, सुगमता तथा स्पष्टता है। संतों-महात्माओं द्वारा प्रवचन भी हिन्दी में ही दिए जाते हैं। क्योंकि अधिक से अधिक लोग इसे समझ पाते हैं। उदाहरण के रूप में दक्षिण-भारत के प्रमुख संत वल्लभाचार्य, विट्ठल रामानुज तथा रामानंद आदि ने हिन्दी का प्रयोग किया है।
उसी प्रकार महाराष्ट्र के संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर आदि, गुजरात प्रांत के नरसी मेहता, राजस्थान के दादू दयाल तथा पंजाब के गुरु नानक आदि संतों ने अपने धर्म तथा संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए एकमात्र सशक्त माध्यम हिन्दी को बनाया। हमारा फिल्म उद्योग तथा संगीत हिन्दी भाषा के आधार पर ही टिका हुआ है।
हिन्दी भाषा के साथ दिलचस्प बात यह है कि यह जहाँ पर बोली जाती है वहाँ का स्थानीय प्रभाव उस भाषा पर दृष्टिगोचर होता है। जैसे हम इंदौर वाले मालवी मिश्रित हिन्दी अर्थात सीधी-सादी बिना लाग लपेट वाली हिन्दी बोलते हैं। मुंबई के लोग बम्बईया हिन्दी बोलते हैं। इस तरह उनकी टोन बदल जाती है।
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