महानगरीय सभ्यता के युवा शायद सहमत न हों मगर वास्तविकता यह है कि उनकी 'मित्रता' की अवधारणा और वास्तविक 'मित्रता' की अवधारणा में बुनियादी फर्क है। सायबर कैफे से उपजी यह पीढ़ी इंटरनेट पर चैटिंग, डिस्को, बार और फाइव स्टार होटलों की देर रात खत्म होनेवाली पार्टियों में साथ-साथ उठने-बैठने, घूमने और साथ-साथ 'वीक-एंड' मनाने भर को ही 'दोस्ती' समझती है। इसीलिए इन्हें स्वयं पता नहीं होता कि ये सफर कब, कहाँ और कैसे यूँ ही छोटी-सी बात पर खत्म हो जाएगा दुआ क्या थी जहन में ये तो याद नहीं
बस दो हथेलियाँ थीं, जुड़ी आपस में.... |