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न्यायप्रिय मेंढ़क
बहुत दिनों पहले वाराणसी में नदी के किनारे एक नीला मेंढक रहता था। मेंढक साधु स्वभाव का था। अतः नदी के सभी जीव उसका आदर करते थे और आपसी झगड़ों का फैसला उसी से कराते थे। एक दिन जब नदी में जल बढ़ा हुआ था तो उसमें कहीं से एक साँप आ गया। नदी में मछलियों की अधिकता देखकर वह वहीं रह गया और घात लगाकर मछलियों को खाने लगा। मछलियों का परिवार नदी में फैला रहता था, इसलिए बहुत दिनों तक तो उन्हें अपने विनाश का पता ही न लगा, पर धीरे-धीरे जब काफी मछलियाँ लापता हो गई तो छोटी मछलियों ने सोचा कि जरूर बड़ी मछलियाँ चुपचाप छोटी को खा रही हैं, तभी उनकी संख्या कम होती जा रही है। इस तरह मछलियों में द्वेष की भावना बढ़ने लगी, वे नदी में भयवश एक-दूसरे से दूर-दूर रहने लगीं। साँप के लिए यह स्थिति और लाभकर रही। उसने और तेजी में मछलियों को खाना शुरू कर दिया और मछलियों के लापता होने से छोटी मछलियों की चिंता और बढ़ गई। इस बढ़ते झगड़े की पंचायत लेकर छोटी और बड़ी मछलियों के बुजुर्ग नीले मेंढक के पास गए। मेंढक ने दोनों पक्षों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं और कहा, 'यदि तुम दोनों ही निर्दोष हो तो एक-दूसरे से इतनी दूर-दूर क्यों रहते हो? एक साथ रहो, एक साथ भोजन की खोज में निकलो, जो कुछ मिले उसे बाँटकर खाओ। ऐसा करने पर यदि तुममें से कोई दोषी होगा तो वह या तो अपना दोष छोड़ देगा अथवा उसने यदि ऐसा किया तो उसका पता सबको लगा जाएगा। मछलियों ने मेंढक की बात मान ली। दूसरे दिन वे चारे की खोज में एक साथ निकलीं। परिणामस्वरूप साँप को उस दिन भूखा रहना पड़ा, पर साँप भी कम चालाक नहीं था। अगले ही दिन वह मछलियों के पीछे लग गया। उसने पीछे से हमला कर दो मछलियों को पकड़ लिया, पर मछलियों ने उसे देख लिया। साँप के डर से सभी मछलियाँ भागने लगीं। कभी ये नीचे डुबकी लगातीं, कभी ऊपर आ जातीं। अब उनको अपने वास्तविक शत्रु का पता लग चुका था। अब मछलियों ने अपनी रक्षा की तैयारी शुरू कर दी। कुछ बड़ी मछलियाँ दूर-दूर रहकर पहरा देतीं। साँप भी अब चिढ़-चिढ़कर उन पर आक्रमण करता था, पर मछलियों की दृढ़ मोर्चोबंदी के कारण बहुत कम मछलियाँ ही उसकी पकड़ में आ पाती थीं। एक दिन मछुए ने नदी में जाल फैलाया। बहुत सी मछलियाँ उसमें फँस गईं।
साँप भी मछलियों के पीछे-पीछे आ रहा था। वह भी जाल में जा घुसा। मछलियाँ जाल में छटपटाने लगीं। तभी साँप ने एक छोटी मछली पर मुँह मारा। अपने बच्चे को इस तरह मौत के मुँह में जाते देख उसकी माँ ने साँप की पूछ पर जोरों से काट लिया। साँप पीड़ा से कराहकर पीछे मुड़ा तो उसके मुँह से मछली निकल गई। छोटी मछली ने जब साँप को अपनी माँ की ओर मुड़ते देखा तो उसने भी साँप को काटा। पीड़ा से साँप उसकी ओर मुड़ा तब तक उसकी माँ फिर साँप पर टूट पड़ी। दूसरी मछलियों ने यह देखा तो उनका भी साहस बढ़ गया। अब तक मछलियों ने साँप को वह अजेय जंतु मान रखा था, जिसके सामने से भागने में ही कुशल थीं, किंतु एक माँ और बच्चे के साथ उसकी लड़ाई देखकर सभी मछलियाँ साँप पर टूट पड़ीं। इससे साँप का पूरा शरीर लहूलुहान हो गया। उसने भागने में ही अपनी खैर समझी, पर सामने जाल तना था।उसने तेजी से एक स्थान पर जाल को काटना शुरू कर दिया और उसमें एक बड़ा छेदकर भाग निकला। मछलियाँ भी उसे छेद से निकलकर उसका पीछा करने लगीं। घायल साँप भागा-भागा नीले मेंढक के पास पहुँचा। उसने कहा मेंढकजी, न्याय कीजिए। यह सही है कि मैं इन मछलियों को खाता रहा हूँ, पर जाल काटकर मैंने इनकी रक्षा भी की है। फिर भी वे मेरे ऊपर आक्रमण कर रही हैं।' नीला मेंढक कुछ देर तक सोचता रहा फिर बोला, 'जाल तुमने मछलियों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी रक्षा के लिए काटा है। उसके साथ मछलियों की भी रक्षा हो गई। यदि यह देखकर मछलियाँ तुम्हें अपना हितचिंतक मानने लगेंगी तो इनके ऊपर होने वाले अत्याचार का कभी भी अंत नहीं होगा। आज मछलियों को अपनी एकता की शक्ति का पता लग गया है। मैं तुम्हारे पक्ष में न्याय करने का अपराध कभी नहीं कर सकता। तुम्हें यह स्थान छोड़कर जाना होगा।' अंततः साँप को वह स्थान छोड़कर जाना पड़ा और सभी मछलियाँ फिर प्रेमपूर्वक रहने लगीं।