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मिलिए ख्यात शायर राहत इंदौरी से
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प्रश्न : आपने फिल्मों की तरफ कैसे रुख किया?
उत्तर : मुझे फिल्मों से कोई विशेष लगाव नहीं रहा। गुलशन कुमार कोई फिल्म बना रहे थे 'शबनम' और मेरी एक शायरी की दो पंक्तियाँ उनकी फिल्म की थीम पर एकदम फिट बैठ रही थीं। उनके कई दफा संदेश भेजने पर मैं मुंबई गया। उन्होंने एक ही हफ्ते में मेरे 14 गाने अनुराधा की आवाज में रिकॉर्ड कर 'आशियाना' नामक एलबम तैयार किया था। वहीं मेरी मुलाकात अनु मलिक से भी हुई और आज भी उनसे जुड़ा हुआ हूँ परंतु मैं वहाँ अपनी शर्तों पर काम करता हूँ। और सच कहूँ तो मैंने फिल्मों में काम मिलने के लिए कभी स्ट्रगल नहीं किया। महेश भट्ट के साथ भी काफी फिल्में की हैं। मेरी उनके साथ पहली फिल्म 'सर' थी।

प्रश्न : आपने किस-किस फिल्मों के लिए गाने लिखे?
उत्तर : मेरी करीब 33 फिल्में रिलीज हुई हैं, जिसमें से दस फिल्में ऐसी हैं जो गोल्डन जुबली हुईं। 'इश्क', 'मुन्नाभाई एमबीबीएस', 'खुद्दार', 'मैं ‍खिलाड़ी तू अनाड़ी', 'मिशन कश्मीर' और 'मर्डर' ये सभी फिल्में लोगों ने पसंद की। मुन्नाभाई के तो सभी गाने बहुत हिट हुए थे।

प्रश्न : आपने शायरी में इतना नाम कमाया है तो क्या आप ये विरासत अपने बच्चों को सौंपेंगे?
उत्तर: देखिए! ये राजनीति नहीं कि मैं सीएम हूँ तो अपने बेटे को ये सीट देकर जाऊँ। ये कला मुझे खुदा की देन है। ये देखा गया है कि जैसे-जैसे विज्ञान तरक्की करता है साहित्य पिछड़ता जाता है। में बहुत जिम्मेदारी से यह बात कह रहा हूँ कि साहित्य की ये आखिरी बहार है क्योंकि ये देखने में आया है जो बच्चे साहित्य में एमए कर भी लेते हैं तो उन्हें नौकरी मिलना कठिन है।

शायरी में पैसे की पैदावार होने वाला जमाना अब खत्म होने वाला है। अब फिल्मों में भी शायरी की कोई हैसियत नहीं रही। इसलिए मैं यह बिलकुल नहीं चाहता कि अपनी आने वाली नस्लों को उस ओर धकेल दिया जाए, जहाँ का सफर अंधरकारमय हो।

प्रश्न : बावजूद इसके आप नए जमाने के शायरों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर : मैंने तो कहा ही है कि ये आखिरी बहार है और इसे संभालने वाले जो लोग हैं उनका यह फर्ज वो निभा रहे हैं। वे चाहते हैं कि जो शायरी की आखिरी पंक्ति भी उनकी कलम से निकले वो सेहतमंद हो। समाज के लिए संदेश देने वाली हो।

प्रश्न : आपके मनपसंद शायर कौन हैं?
उत्तर : पढ़ा तो सभी को है, परंतु दो चार जंक्शन आते हैं, जहाँ रुकना होता है। पहला जंक्शन जो है वह गालिब हैं। जहाँ बहुत रुककर आगे की ओर बढ़ना पड़ता है। फिर करीब सौ साल बाद एक और जंक्शन आता है फिराक गोरखपुरी के रूप में। शायरी के क्षेत्र में दो बड़े शायर होने में एक सदी यानी करीब सौ बरस का अंतराल आ जाता है। उसके बाद हमारा दौर आया जिसमें कई महान शायर हुए। मैं भी साँस ले रहा हूँ। बड़ी शायरी के लिए एक सदी का अंतर होना चाहिए तब हम बता सकते हैं कि कालिदास से लेकर महादेवी वर्मा तक या निराला तक कितने जंक्शन हैं।

प्रश्न : नए जमाने के शायरों में कोई ऐसे शायर हैं, जिनके काम की आप सराहना करना चाहेंगे?
उत्तर : इस दौर में काफी अच्छे लोग हैं, जैसे- कराची के अहमद मुश्ताक, लाहौर के जफर इकबाल, जुबे रिज्मी इत्यादि लोगों के बगैर हम इस दौर की बात नहीं कर सकते।

प्रश्न : वेबदुनिया के पाठकों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर : तेज रफ्तार दुनिया के साथ आप भी बड़ी तेजी से सफर कर रहे हैं। मुझे बाहरी मुल्क में जाकर पता चलता है कि हमारी हर जानकारी इंटरनेट के जरिए दुनिया के कोने-कोने तक पहुँच चुकी है। मेरी दिली ख्वाहिश है कि आपकी वेब‍दुनिया समाज की खूब खिदमत करे।
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