इंसान भावनाओं का पुतला है। तरह-तरह के उद्वेग, प्रतिक्रियाएँ, संवेग और संवेदनाएँ हमारे भीतर होती हैं। भीतर की ये हलचलें कई बार अभिव्यक्ति चाहती हैं। दबाने पर ये ज्वालामुखी भी बन सकती हैं और गलत समय पर गलत जगह फूटकर नुकसान भी पहुँचा सकती हैं। इसीलिए मानव समाज ने ऐसी परंपराएँ भी विकसित की हैं, जो भावनाओं को अभिव्यक्त करने का मौका देती हैं, उद्वेगों को खुलकर प्रकट ...