बच्चों का खेल

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मो. आरिफ

नाम - मानिक अस्थाना, उम्र - लगभग पचास, पता - प्रेम नगर, दिल्ली। देखिए साहब बात यह है कि आज की दुनिया में सच सुनने का रिवाज नहीं है। सच सुनने को कोई तैयार नहीं। सच लिए घूमते रहिये, सूँघना तो दूर रहा आपकी तरफ कोई देखेगा भी नहीं। सच में झूठ की मिलावट कर दीजिए और देखिए मजा। थोड़ा नमक-मिर्च लगाकर बात करिये, सब सुनेंगे और आपकी तारीफ होगी। सचाई को सच तभी समझेंगे जब उसे कुछ बढ़ाकर पेश करिये या फिउसमें से मनचाही चीजें घटाकर।

खैर यह तो दूसरी बात हुई। वैसे यह दूसरी बात भी उसी बात से जुड़ी हुई है जिससे मैंने अपनी बात शुरू की थी। यानी सच की सचाई। देखिए जी, आज बदली छाई हुई है। ठंडी मंद बयार बह रही है, छत पर अकेला पड़ा हूँ और रेडियो पर विविध भारती से लताजी की आवाज में जाने क्यूँ लोग मोहब्बत किया करते हैं... दिल के बदले... वाला गाना बज रहा है।

किसी पढ़े-लिखे बंदे से जरा पूछिए कि भाई तुम्हारी नजर में दुनिया का सच क्या है तो वह बाल में उँगली फेरते हुए कहेगा कि सच तो यह है कि हम सभी को एक न एक दिन मरना है। कोई और कहेगा कि यह दुनिया फानी है, क्षण-भंगुर है। उसी बात को कोई और सज्जन घुमा फिराकर कहेंगे - सच तो यह है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है, अस्थायी है, टेम्पररी है - यहाँ तक कि हमारे दुख भी। आप वाह-वाह कर उठेंगे और सच का नया-पुराना नुस्खा लेकर अपने घर का रुख करेंगे।
अब जरा मेरी स्थिति पर गौर फरमाएँ। मेरे इलाके में आज कैसा मौसम है? बदली छाई है, ठंडी-ठंडी बयार बह रही है। मैं कहाँ हूँ? छत पर अकेले... फुर्सत से विविध भारती सुन रहा हूँ - जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं... दिल के बदले दर्दे-दिल लिया करते हैं। ऐसे में कोई मुझसे पूछे, अच्छा बताइए आपकी नजर में दुनिया का सच क्या है।

आप सोच रहे होंगे मैं तपाक से कहूँगा - प्रेम, मोहब्बत, इश्क...। जी नहीं, मैं भी बात को घुमाना जानता हूँ। मैं कहूँगा दुनिया में एक नहीं, दो सच हैं और वह हैं औरत और मर्द। शुद्ध हिन्दी में कहेंगे दुनिया में दो शाश्वत सत्य हैं - स्त्री और पुरुष। आपका मुँह खुला का खुला रह गया न! इतना बोरिंग जवाब, घिसा-पिटा सा।
अगर मैं कहता प्रेमी-प्रेमिका या आशिक-माशूक तो यह जवाब थोड़ा फिल्मी तो लगता लेकिन स्त्री-पुरुष से बेहतर होता, विशेषकर मेरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कि मैं कहाँ हूँ, क्या कर रहा हूँ और मेरी तरफ मौसम कैसा है।

भाइयों, यह दुनिया एक भूलभुलैया है दोनों इसी में चक्कर काटते रहते हैं। लेकिन हम भूलते कुछ नहीं। भूल जाने का भ्रम पालते रहते हैं या उसका नाटक करते रहते हैं। मैं जरा दिमाग पर जोर देता हूँ तो एक-एक करके वे सारी लड़कियाँ-स्त्रियाँ याद आने लगती हैं जो मुझे मिलीं और अच्छी लगीं। आपको ताज्जुब होगा कि जब मैं बहुत छोटा था - सात या आठ साल का। और दो या तीन में पढ़ता था तो शर्मिला नाम की एक हमउम्र लड़की मुझे बहुत अच्छी लगती थी।
उसकी मम्मी भी मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। हालाँकि उन्होंने कभी मुझसे बात नहीं की। वह शर्मिला को टिफिन खिलाकर चली जाती थी। उन दोनों की शक्ल मुझे अभी तक हू-ब-हू याद है। अगर मैं बताने लगूँ कि शर्मिला और उसकी मम्मी के बाद कब कब कौन मुझे अच्छा लगा और किसने-किसने मुझे आकर्षित किया - कहाँ-कहाँ मेरी भावनाएँ अटकीं तो आप हँसेंगे। मेरा मजाक उड़ाएँगे।
दरअसल आप सच का मजाक उड़ाएँगे। लेकिन कई लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें मेरा यह कुबूलनामा पढ़कर हिम्मत बँधेगी और वे अपना कलेजा टटोलने लगेंगे। उनके सामने भानुमती का पिटारा खुलने लगेगा। मैं गलियों, सड़कों या बाजार में घूम रहा होता हूँ तो कभी-कभी महिलाओं को दूसरी ही नजर से देखता हूँ। वह ऐसे कि अरे ये कितना हँसते-बोलते मस्ती करते, या फिर किसी बात पर चिंता-मग्न फिक्र करते हुए अकेले या सहेलियों के साथ या फिर पति बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ चली जा रही हैं। लेकिन जब कमसिन थीं तो किसी से प्रेम करती थीं... प्रेम-पत्र लिखती थीं... उसके लिए रोती-गाती थीं। उसी के साथ जीवन-भर साथ रहने के सपने देखती थीं।

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