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नाम शबाना: फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर|

ए वेडनेस डे, बेबी, स्पेशल 26 जैसी फिल्म बनाने वाले फिल्मकार नीरज पांडे से शिकायत रहती है कि उनकी फिल्मों में महिला पात्र सशक्त नहीं रहते हैं, शायद इसी कारण उन्होंने नायिका प्रधान फिल्म 'नाम शबाना' बनाई है। यह फिल्म बेबी का एक किरदार है और बेबी के पहले की कहानी इसमें दिखाई गई है। 
 
बेबी में कुछ बेहतरीन किरदार थे और यह एक अच्छा विचार है कि उसमें से एक किरदार को लेकर फिल्म बनाई जाए। 'बेबी' में शबाना का किरदार सभी को याद होगा जो मिशन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 
 
'नाम शबाना' में दिखाया गया है कि शबाना किस तरह एजेंट बनीं और देश की सेवा में जुटीं। इस फिल्म का निर्देशन शिवम नायर ने किया है जबकि कहानी, स्क्रीनप्ले और संवाद नीरज पांडे के हैं।
 
नीरज ने फिल्म की कहानी को दो भागों में बांटा है। पहली हिस्सा शबाना की एजेंट बनने के पहले की कहानी है और दूसरी एजेंट बनने के बाद की। कहानी का पहला भाग जोरदार है। इसमें दिखाया गया है कि शबाना अपने शराबी पिता से परेशान होकर एंग्री यंग वूमैन बनती है। उसका गुस्सा तब और बढ़ जाता है जब वह अपने प्रेमी को खो देती है और बदला लेना चाहती हैं। 
 
शबाना पर एजेंसी द्वारा कड़ी नजर रखी जाती है और जब लगता है कि शबाना एजेंट बनने के लिए तैयार है तब उससे सम्पर्क किया जाता है। बदला लेने में उसकी मदद इस शर्त पर की जाती है कि वह एजेंट बन कर देश सेवा करेगी। 
 
इंटरवल के पहले का यह हिस्सा बेहद रोचक है। शबाना और उसके प्रेमी की कहानी को अच्छे से पेश किया गया है। बदला लेने की ठोस वजह शबाना के पास नजर आती है। सीक्रेंट एजेंट्स की एजेंसी का उसके पास कॉल आना, उसकी मदद करना, देश सेवा के लिए उसको जोड़ना ड्रामे में ट्विस्ट लाता है और दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखता है। 
 
इंटरवल के बाद कहानी का दूसरा भाग शुरू होता है। शबाना को एक मिशन सौंपा जाता है जिसमें उसे मिखाइल नामक एक अपराधी को मलेशिया में मार गिराना है। इस काम में अजय (अक्षय कुमार) उसकी मदद करता है। इस मिशन को जिस तरह से लिखा और प्रस्तुत किया गया है वो कमजोर लेखन और निर्देशन का उदाहरण है। 
 
नीरज पांडे ने शबाना को हीरो की तरह पेश करने के चक्कर में लॉजिक को साइड रखा है और सिनेमा के नाम पर छूट ली है जिसके कारण यह पूरा मिशन विश्वसनीय नहीं बन पाया है। विदेशी जमीं पर एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी को शबाना इतनी आसानी से मार गिराती है कि यकीन नहीं होता। 
इस पूरे मिशन में हड़बड़ी नजर आती है और निर्देशक भी इसे ठीक तरह से प्रस्तुत नहीं कर पाए। लिहाजा इंटरवल के पहले खूब उम्मीद जगानी वाली 'नाम शबाना' इंटरवल के बाद अपेक्षाओं से नीचे आ जाती है। 
 
शिवम नायर का निर्देशन फिल्म के दूसरे हाफ में गड़बड़ा गया। वे जल्दबाजी में नजर आए और मिखाइल को पकड़ने वाली बात ठीक से फिल्मा नहीं पाए। इस मिशन में रोमांच नदारद है। 
 
अलबत्ता कुछ शॉट्स उन्होंने अच्छे फिल्माए हैं, जैसे- जब शबाना को भीड़ में एक व्यक्ति की हत्या करने के लिए कहा जाता है। इस फिल्म में गाने भी बाधा बनते हैं। 'रोजाना' को छोड़ सारे गीत फिल्म में रूकावट डालते हैं। नीरज पांडे की स्क्रिप्ट कई सवाल खड़े करती है, खासतौर पर कहानी का दूसरा हिस्सा। 
 
तापसी पन्नू का अभिनय फिल्म दर फिल्म निखरता जा रहा है। शबाना के रूप में वे प्रभावित करती हैं। किरदार के मुताबिक गुस्सा उनके चेहरे पर नजर आता है। एक्शन सीन उन्होंने अच्छे से निभाए हैं। इमोशनल सीन में भी उनका अभिनय देखने लायक है। 
 
स्क्रिप्ट का पूरा साथ न मिलने के बावजूद वे अपने अभिनय से बांध कर रखती हैं। अक्षय कुमार को देखना अच्छा लगता है। उनकी एंट्री जोरदार है। हालांकि उनके कुछ सीन बेवजह रखे गए हैं। डैनी, अनुपम खेर के लिए ठीक से जगह नहीं बनाई और सिर्फ 'बेबी' की या‍द दिलाने के लिए इन्हें रखा गया है। 
 
मनोज बाजपेयी के साथ स्क्रिप्ट न्याय नहीं करती। पृथ्वीराज सुकुमारन के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था। ताहिर शब्बीर अभिनय में कच्चे नजर आए। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी बढ़िया है। बैकग्राउंड म्युजिक फिल्म के मूड के अनुरूप है।  
 
फिल्म का हासिल तापसी पन्नू का अभिनय और पहला हाफ है। 
 
बैनर : फ्राइडे फिल्मवर्क्स, रिलायंस एंटरटेनमेंट, केप ऑफ गुड फिल्म्स 
निर्माता : अरुणा भाटिया, शीतल भाटिया
निर्देशक : शिवम नायर 
संगीत : मीत ब्रदर्स, रोचक कोहली
कलाकार : तापसी पन्नू, अक्षय कुमार, अनुपम खेर, मनोज बाजपेयी, डैनी, पृथ्वीराज सुकुमारन, मधुरिमा तुली, एली अबराम 
रिलीज डेट : 31 मार्च 2017   
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 28 मिनट 12 सेकंड
रेटिंग : 2.5/5 
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