सियासी बाज़ी पलटने वाले पांच फ़्लोर टेस्ट

parliament of india
Last Updated: शनिवार, 19 मई 2018 (08:43 IST)
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी शनिवार शाम 4 बजे तक सदन में बहुमत साबित करें।
कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। राज्यपाल वजूभाई वाला ने सबसे अधिक सीटों पर जीत हासिल करने वाली पार्टी यानी भाजपा को सरकार बनाने के न्योता दिया।

लेकिन कांग्रेस और जेडीएस ने इसका विरोध किया क्योंकि उनका दावा है कि दोनों दल मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में हैं। भारतीय राजनीति में यह दिलचस्प मौका पहली बार नहीं आया है। राजनीति का इतिहास इससे भरा पड़ा हैं।

1979: शपथ के 15 दिनों में ही गिर गई चरण सिंह की सरकार
देश में आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज़ होती देख प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी।

चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। चरण सिंह उस सरकार मे गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री बनें।

पार्टी में अंदरूनी कलह के चलते मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई, जिसक बाद कांग्रेस और सीपीआई की मदद से चरण सिंह ने 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का वक्त दिया। लेकिन एक दिन पहले यानी 19 अगस्त को ही इंदिरा गांधी ने अपना समर्थन वापस ले लिया और का सामना किए बिना उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया।
1989: बिहार में रथ यात्रा रुकी, उधर दिल्ली की सरकार गिरी
दूसरी कहानी है 1989 की। एक साल पहले यानी 1988 में जय प्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 अक्तूबर को जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) का विलय हुआ और नई पार्टी जनता दल का गठन हुआ।

वीपी सिंह को जनता दल का अध्यक्ष चुना गया। इनकी अगुवाई में कई क्षेत्रीय दल एक झंडे के नीचे आए और नेशनल फ्रंट का गठन हुआ। 1989 में चुनाव हुए। नेशनल फ्रंट को अच्छी सफलता मिली पर इतनी नहीं कि वो सरकार बना सके। नेशनल फ्रंट ने भाजपा और वाम पार्टियों का बाहर से समर्थन पाकर सरकार बना ली। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने।

एक साल हुए ही थे कि भाजपा ने रथ यात्रा की शुरुआत की। रथ कई राज्यों से होते हुए बिहार पहुंचा। बिहार में जनता दल की सरकार थी और लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे। उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के रथ की गति पर लगाम लगा दी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। फिर क्या था, भाजपा ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई।

1990: राजीव गांधी की जासूसी पर गिर गई सरकार
भारतीय राजनीति के इतिहास का अगला पन्ना पलटते हैं और साल 1990 की बात करते हैं। वीपी सिंह के इस्तीफ़े के बाद जनता दल के नेता चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ दी और समाजवादी जनता पार्टी का गठन किया। चुनाव हुए और उनकी पार्टी ने 64 सीटों पर जीत हासिल की। के फ्लोर टेस्ट में कांग्रेस ने उन्हें मदद की और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए।


तकरीबन सात महीने बाद कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। 02 मार्च 1991 को हरियाणा पुलिस के सिपाही प्रेम सिंह और राज सिंह राजीव गांधी के निपास 10 जनपथ के बाहर जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए। दोनों सादे कपड़ों में थे और गिरफ्तारी के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि वो कुछ सूचना जुटाने वहां भेजे गए थे।

मामले को लेकर राजनीतिक भूचाल आ गया और कांग्रेस ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। इसके बाद संसद में फ्लोर टेस्ट की नौबत आई। फ्लोर टेस्ट होना ही था कि इससे पहले चंद्रशेखर ने सबको चौंकाते हुए 6 मार्च 1991 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
1992: जब मायावती ने कुर्सी की चाहत में खुद का फ्लोर टेस्ट करवा लिया
यह फ्लोर टेस्ट की दिलचस्प कहानी है उत्तर प्रदेश की। साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी का गठन किया। एक साल बाद उत्तर प्रदेश में विवादित ढांचा ध्वस्त कर दिया गया। राज्य की सत्तारूढ़ कल्याण सिंह की सरकार को इस घटना के बाद बर्ख़ास्त कर दिया गया था।

इसके बाद चुनाव होने थे। समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी का गठबंधन हुआ। इन दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई, हालांकि गठबंधन की यह सरकार अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।

बसपा ने अपना समर्थन वापिस ले लिया, उत्तर प्रदेश विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ और भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं और समाजवादी पार्टी खुद को ठगा हुआ महसूस कर सत्ता से बाहर हो गई।

1999: जब एक वोट से वाजपेयी की सरकार गिर गई थी
साल 1998 में लोकसभा चुनाव हुए थे। चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था लेकिन अन्नाद्रमुक की मदद से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने केंद्र में सरकार बनाई।

13 महीने बाद अन्नाद्रमुक ने अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार अल्पमत में आ गई। विपक्ष की मांग पर राष्ट्रपति ने सरकार को अपना बहुमत साबित करने को कहा। संसद में फ्लोर टेस्ट हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिर गई। किसी को ऐसा होने की उम्मीद नहीं थी।

जिस एक वोट से सरकार गिरी वह वोट था ओडिशा के मुख्यमंत्री गिरधर गमांग का। गमांग उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री थे और सांसद भी। वो इस फ्लोर टेस्ट में अपना वोट डालने विशेष रूप से दिल्ली आए थे।

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