भगवान सूर्यदेव की 10 विशेष बातें

1. जब ब्रह्माजी जब उत्पन्न हुए, तब उनके मुंह से ॐ महाशब्द उच्चरित हुआ। यह ओंकार परब्रह्म है और यही का शरीर है।
2. ब्रह्माजी के चारों मुखों से चार वेद आविर्भूत हुए और ओंकार के तेज से मिल कर जो स्वरूप उत्पन्न हुआ वही सूर्यदेव हैं।
3. यह सूर्यस्वरूप सृष्टि में सबसे पहले प्रकट हुआ इसलिए इसका नाम पड़ा।
4. सूर्यदेव का एक नाम सविता भी है। जिसका अर्थ होता है सृष्टि करने वाला। इन्हीं से जगत उत्पन्न हुआ है। यही सनातन परमात्मा हैं।

5. सर्वप्रमुख देवता हैं।

6. इनकी दो भुजाएं हैं। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं; उनके दोनों हाथों में कमल सुशोभित हैं।
7. इनका वर्ण लाल है। सात घोड़ों वाले इनके रथ में एक ही चक्र है, जो संवत्सर कहलाता है।

8. इस रथ में बारह अरे हैं जो बारह महीनों के प्रतीक हैं, ऋतुरूप छ: नेमियां और चौमासे को इंगित करती तीन नाभियां हैं। चक्र, शक्ति, पाश और अंकुश इनके मुख्य अस्त्र हैं।

9. एक बार दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर उनके सारे अधिकार छीन लिए। तब देवमाता अदिति ने इस विपत्ति से मुक्ति पाने के लिए भगवान सूर्य की उपासना की, जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने अदिति के गर्भ से अवतार लिया और दैत्यों को पराजित कर सनातन वेदमार्ग की स्थापना की। इसलिए भी इन्हें आदित्य कहा जाता है।
10. भगवान सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा छ: वर्ष की होती है। इनकी प्रसन्नता के लिए इन्हें नित्य देना चाहिए। इनका सामान्य मंत्र है-ॐ घृणिं सूर्याय नम:' इसका एक निश्चित संख्या में रोज जप करना चाहिए।

Widgets Magazine
वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :