तिल संकष्टी गणेश चतुर्थी : कैसे करें व्रत, पढ़ें कथा और मंत्र


प्रति वर्ष माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को तिल संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत मनाया जाता है। इस वर्ष तिल को है। इस दिन रात्रि के समय चन्द्र को अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं व्रत खोलती हैं।

संकट चतुर्थी के दिन महिलाएं सुख-सौभाग्य, संतान की समृद्धि और सर्वत्र कल्याण की इच्छा से प्रेरित होकर व्रत रखती हैं। पदम पुराण के अनुसार इस व्रत को स्वयं भगवान गणेश ने मां पार्वती को बताया था। वैसे तो हर महीने की कृष्ण पक्ष चतुर्थी 'गणेश चतुर्थी' कहलाती है। लेकिन माघ मास की चतुर्थी तिल संकटा चौथ कहलाती है।


पदम पुराण के अनुसार आज ही के दिन कार्तिकेय के साथ पृथ्वी की परिक्रमा लगाने की प्रतिस्पर्धा में उन्होंने पृथ्वी की बजाय भोलेनाथ और मां पार्वती की सात बार परिक्रमा की थी। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर देवों में प्रमुख मानते हुए उनको प्रथम पूजा का अधिकार दिया था।

तिल संकटा चौथ व्रत की विधि

भालचंद्र गणेश की पूजा संकट चौथ को की जाती है। प्रात:काल नित्य क्रम से निवृत होकर षोड्शोपचार विधि से गणेश जी की पूजा करें। निम्न श्लोक पढ़कर गणेश जी की वंदना करें।

मं‍त्र:
गजाननं भूत गणादि सेवितं,कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥

इसके बाद भालचंद्र गणेश का ध्यान करके पुष्प अर्पित करें। पूरे दिन मन ही मन श्री गणेश जी के नाम का जप करें । सुर्यास्त के बाद स्नान कर के स्वच्छ वस्त्र पहन लें । अब विधिपूर्वक गणेश जी का पूजन करें। एक कलश में जल भर कर रखें। धूप-दीप अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में तिल तथा गुड़ के बने हुए लड्डु, ईख, शकरकंद, गुड़ तथा घी अर्पित करें।

यह नैवेद्य रात्रि भर बांस के बने हुए डलिया(टोकरी) से ढंक यथावत् रख दिया जाता है। पुत्रवती स्त्रियां पुत्र की सुख समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस ढंके हुए नैवेद्य को पुत्र ही खोलता है तथा भाई बंधुओं में बांटता है। ऐसी मान्यता है कि इससे भाई-बंधुओं में आपसी प्रेम-भावना की वृद्धि होती है।

अलग-अलग राज्यों मे अलग-अलग प्रकार के तिल और गुड़ के लड्डु बनाए जाते हैं। तिल के लड्डु बनाने हेतु तिल को भूनकर,गुड़ की चाशनी में मिलाया जाता है,फिर तिलकूट का पहाड़ बनाया जाता है। तत्पश्चात् गणेश पूजा करके तिलकूट के पहाड़ को तोड़ा जाता है।

गणेश पूजन के बाद चंद्रमा को कलश से अर्घ्य अर्पित करें। धूप-दीप दिखाएं। चंद्र देव से अपने घर-परिवार की सुख और शांति के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद एकाग्रचित होकर कथा सुनें अथवा सुनाएं। सभी उपस्थित जनों में प्रसाद बांट दें।

तिल चौथ की कहानी

एक शहर में देवरानी-जेठानी रहती थी। जेठानी अमीर थी और देवरानी गरीब थी। देवरानी गणेश जी की भक्त थी। देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था और अक्सर बीमार रहता था। देवरानी, जेठानी के घर का सारा काम करती और बदले में जेठानी बचा हुआ खाना, पुराने कपड़े आदि उसको दे देती थी। इसी से देवरानी का परिवार चल रहा था।

माघ महीने में देवरानी ने तिल चौथ का व्रत किया। 5 आने का तिल व गुड़ लाकर तिलकुट्टा बनाया। पूजा करके तिल चौथ की कथा (तिल चौथ की कहानी) सुनी और तिलकुट्टा छींके में रख दिया और सोचा की चांद उगने पर पहले तिलकुट्टा और उसके बाद ही कुछ खाएगी।

कथा सुनकर वह जेठानी के यहां चली गई। खाना बनाकर जेठानी के बच्चों से खाना खाने को कहा तो बच्चे बोले मां ने व्रत किया हैं और मां भूखी हैं। जब मां खाना खायेगी हम भी तभी खाएंगे। जेठजी को खाना खाने को कहा तो जेठजी बोले 'मैं अकेला नही खाऊंगा, जब चांद निकलेगा तब सब खाएंगे तभी मैं भी खाऊंगा' जेठानी ने उसे कहा कि आज तो किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया तुम्हें कैसे दे दूं? तुम सुबह सवेरे ही बचा हुआ खाना ले जाना।

देवरानी के घर पर पति, बच्चे सब आस लगाए बैठे थे कि आज तो त्योहार हैं इसलिए कुछ पकवान आदि खाने को मिलेगा। परन्तु जब बच्चों को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो बच्चे रोने लगे। उसके पति को भी बहुत गुस्सा आया कहने लगा सारा दिन काम करके भी दो रोटी नहीं ला सकती तो काम क्यों करती हो ? पति ने गुस्से में आकर पत्नी को कपड़े धोने के धोवने से मारा। धोवना हाथ से छूट गया तो पाटे से मारा। वह बेचारी गणेश जी को याद करती हुई रोते-रोते पानी पीकर सो गई।

उस दिन गणेश जी देवरानी के सपने में आए और कहने लगे-- धोवने मारी, पाटे मारी सो रही है या जाग रही है... .

वह बोली-'कुछ सो रही हूं, कुछ जाग रही हूं...

गणेश जी बोले- भूख लगी हैं, कुछ खाने को दे'

देवरानी बोली 'क्या दूं , मेरे घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं हैं.. जेठानी बचा खुचा खाना देती थी आज वह भी नहीं मिला। पूजा का बचा हुआ तिल कुट्टा छींके में पड़ा हैं वही खा लो।
तिलकुट्टा खाने के बाद गणेश जी बोले- 'धोवने मारी, पाटे मारी निमटाई लगी है, कहां निमटे...
वह बोली, यह पड़ा घर, जहां इच्छा हो वहां निमट लो...
फिर गणेश जी बच्चे की तरह बोले अब कहां पोंछू
नींद में मग्न अब देवरानी को बहुत गुस्सा आया कि कब से तंग किए जा रहे हैं, सो बोली,' मेरे सर पर पोंछो और कहा पोछोंगे...


सुबह जब देवरानी उठी तो यह देखकर हैरान रह गई कि पूरा घर हीरे-मोती से जगमगा रहा है, सिर पर जहां विनायक जी पोंछनी कर गए थे वहां हीरे के टीके व बिंदी जगमगा रहे थे।

उस दिन देवरानी, जेठानी के यहां काम करने नहीं गई। बड़ी देर तक राह देखने के बाद जेठानी ने बच्चों को देवरानी को बुलाने भेजा। जेठानी ने सोचा कल खाना नहीं दिया इसीलिए शायद देवरानी बुरा मान गई है। बच्चे बुलाने गए और बोले चाची चलो मां ने बुलाया है सारा काम पड़ा है। देवरानी ने जवाब दिया अब उसकी जरूरत नहीं है। घर में सब भरपूर है गणेश जी के आशीष से...

बच्चो ने घर जाकर मां को बताया कि चाची का तो पूरा घर हीरे मोतियों से जगमगा रहा है। जेठानी दौड़ती हुई देवरानी के पास आई और पूछा कि यह सब हुआ कैसे?
देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला।

घर लौटकर जेठानी अपने पति से कहा कि आप मुझे धोवने और पाटे से मारो। उसका पति बोला कि भलीमानस मैंने कभी तुम पर हाथ भी नहीं उठाया। मैं तुम्हे धोवने और पाटे से कैसे मार सकता हूँ। वह नहीं मानी और जिद करने लगी। मजबूरन पति को उसे मारना पड़ा।

उसने ढ़ेर सारा घी डालकर चूरमा बनाया और छीकें में रखकर और सो गई। रात को चौथ विनायक जी सपने में आए कहने लगे, भूख लगी है, क्या खाऊं...

जेठानी ने कहा, हे गणेश जी महाराज, मेरी देवरानी के यहां तो आपने सूखा तिलकुट्टा खाया था, मैने तो झरते घी का चूरमा बनाकर आपके लिए छींके में रखा हैं, फल और मेवे भी रखे हैं जो चाहें खा लीजिए...

बालस्वरूप गणेश जी बोले अब निपटे कहां...


जेठानी बोली, उसके यहां
तो टूटी फूटी झोपड़ी थी मेरे यहां तो कंचन के महल हैं जहां चाहो निपटो...


फिर गणेश जी ने पूछा, अब पोंछू कहां...

जेठानी बोली, मेरे ललाट पर बड़ी सी बिंदी लगाकर पोंछ लो...

धन की भूखी जेठानी सुबह बहुत जल्दी उठ गई। सोचा घर हीरे-जवाहरात से भर चूका होगा पर देखा तो पूरे घर में गन्दगी फैली हुई थी। तेज बदबू आ रही थी। उसके सिर पर भी बहुत सी गंदगी लगी हुई थी। उसने कहा 'हे गणेश जी महाराज, यह आपने क्या किया...

मुझसे रूठे और देवरानी पर टूटे। जेठानी ने घर और की सफाई करने की बहुत ही कोशिश करी परन्तु गंदगी और ज्यादा फैलती गई। जेठानी के पति को मालूम चला तो वह भी बहुत गुस्सा हुआ और बोला तेरे पास इतना सब कुछ था फिर भी तेरा मन नहीं भरा।

परेशान होकर चौथ के गणेशजी से मदद की विनती करने लगी। गणेश जी ने कहा, देवरानी से जलन के कारण तूने जो किया था यह उसी का फल है। अब तू अपने धन में से आधा उसे दे देगी तभी यह सब साफ होगा...

उसने आधा धन बांट दिया किन्तु मोहरों की एक हांडी चूल्हे के नीचे गाढ़ रखी थी। उसने सोचा किसी को पता नहीं चलेगा और उसने उस धन को नहीं बांटा । उसने कहा 'हे श्री गणेश जी, अब तो अपना यह बिखराव समेटो, वे बोले, पहले चूल्हे के नीचे गाढ़ी हुई मोहरों की हांडी सहित ताक में रखी दो सुई के भी दो हिस्से कर कर। इस प्रकार ‍ग जानन ने बाल स्वरूप में आकर सुई जैसी छोटी चीज का भी बंटवारा किया और अपनी माया समेटी।

हे गणेश जी महाराज, जैसी आपने देवरानी पर कृपा की वैसी सब पर करना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले व हुंकारा भरने वाले सब पर कृपा करना।
किन्तु जेठानी को जैसी सजा दी वैसी किसी को मत देना।

बोलो गणेश जी महाराज की जय !!!

चौथ माता की जय !!!

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